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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

४३२ नाट्यशास्त्र :
वृषभ, खर तथा उँट के चित्रपट भी इस कार्य में लिये जाएँ यह भी या फिर
नट के पदों में ही ऐसा अनुकूलगमन रखा जाए जिससे यह मालूम होने लगे
कि जैसे कोई रथ चल रहा है।
६१-६२. यही बात विमान में बैठे हुए पात्र की गति में भी समझना
चाहिए। रथ में चढ़ने की दशा में गात्र को ऊपर ले जाये और इसके
विपरीत उतरने की दशा में उसे नीचे ले जाकर अवरोहण करे।
६२-६५. अब विमान के प्रसंगवश आकाशगति को भी बतलाते हैं—
'अधोऽलोकनेन' इत्यादि से। यहाँ चक्करदार घुमाव में गति को रखे परन्तु
यहाँ आकाशीकीचारी तथा मण्डलों की बार-बार आवृत्ति भी रखी जाती है।
ऋजु = सरल एवं ललित जंघाओं के द्वारा और आयत अर्थात् चरणों को ऊपर
ले जाकर गिराते हुए तथा कुटिल गति से घुमा कर। इसमें उत्क्षेपण के
समय उन्नत और पात के समय नत रखा जाए। भ्रश्यतः—गिरने वाले
की, जो कि अनजाने में नीचे आ रहा हो। अपविद्धभुज-जिसमें दोला के
आकार में भुजा जल्दी २ गिरती हो।
६६-६८. अर्थवश = प्रयोजन के अनुकूल मान कर अवतरण किया जाए।
इसमें नदी या जल में अवतरण (में उतर रहे हों) जैसा वर्णित क्रियाओं में
अभिनय कर शरीर को ललित अंगक्रिया द्वारा उतारे।
१०१-१०३. तैरने की प्रक्रिया जल के प्रमाण की अपेक्षा से की जाए
अर्थात् जब पानी थोड़ा हो तो वस्त्रों को ऊपर लेकर तथा अधिक
जल में पाणि के द्वारा विचित्र रूप में जल को हटाते हुए गति रखे। इसमें
पताक तथा सर्पशीर्ष हस्त से उपलक्षित गति रखी जाती है।
१०३-१०४. वैसे अपनी जानकारी या इच्छा में तैर कर मनुष्य चलते
हैं किन्तु कभी कभी-कभी तेज प्रवाह में बिना इच्छा के भी जल में बहते हुए
चला जाता है या जल बहा कर ले जाए तो ऐसी स्थिति में गति दिखलाते
हैं—'प्रसार्य' इत्यादि से। एकैकं—अर्थात् क्रमशः। ऐसी गति में सभी अंगों
में आकुलता तथा मुख को तिरछा घुमा कर (आधूत) रखा जाता है।
अन्य आचार्य पारी पारी से पार्श्व परिवर्तन के द्वारा भी इसे दिखलाने की
बात कहते हैं परन्तु इसमें पार्श्वपरिवर्तन नहीं होता वह तो स्वेच्छा से जल
में तैरने के समय ही सम्भव रहता है।
१०५-१०७. जल के प्रसंग में नौका की एवं नौका में बैठे हुए पात्र की
गति भी—'नौस्थस्यापि' के द्वारा बतलाते हैं।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४३३
१०८-१०६. इस प्रकार देश की अपेक्षा से गति बतलाई गयी तथा
नागादि के प्रसंग से सर्प-गति भी बतलाई ।
११०-१११. अवस्थाभेद से गति निरूपण के प्रसंग में विट की गति
बतलाते हैं—'विटस्यापि' इत्यादि से । सौष्ठव जो अपनी प्रकृति के
उपयुक्त हो ।
११२-११३. कञ्चुक के योग्य वृत्ति को जो अपने लिये चाह कर
लेता है इस विग्रह से कञ्चुक पद से क्यच् तथा 'क्वचि + च' से ककार
को ईकार युक्त कर कञ्चुकी शब्द निष्पन्न होता है । वय एवं अवस्था के
विभाग को विचार कर यह विवरण दिया गया है जिसका अभिनय में प्रयोग
किया जाता है ।
११४-११७. विष्कम्भनकृतप्राण-विष्कम्भ अर्थात् स्थैर्य, वह जिसे हो
या ऐसी दशा में यष्टि आदि से प्राण बल को जिसने समन्वित किया हो—
ऐसी गति ।
११८. विकूणन, सङ्कोचन, विमर्दन इत्यादि मिश्रित क्रियाओं को लिया
जाए पथिक की गति में ।
११९-१२०. स्थूल अर्थात् महाकाय या मोटे आकार का व्यक्ति जिसे
थोड़े से श्रम से थकावट आ जाए तथा पसीना आने लगे ।
१२१-१३०. पैरों की विपर्यय गति के साथ चेष्टा के साथ तदनुकूल
हाथों की गति, स्थिति भी रखी जाती है ।
१३१-१३४. 'कुहक' शब्द का कुछ आचार्य अधम-लिङ्गी (नीच साधु)
अर्थ करते हैं । 'कुहना' पाठ के अनुसार अर्थ होगा जो दम्भी या ईर्ष्यालु
है । (मेदिनी कोष भी इसका—'कुहना दम्भचर्यायामर्ष्यालौ कुहनस्त्रिषु'
के द्वारा समर्थन करता है) । पैर में कांटा या क्षत हो जाए तो ऐसे
(लंगड़े) पात्र की गति या पंगु की गति का 'अग्रतलसंचरपाद' से अभिनय
दिखलावे । अन्य आचार्यों ने यहाँ नर्कुट की योजना भी दिखलाई है ।
१३७-१४२. विदूषक की गति बतलाते हैं—'विदूषकस्यापि' इत्यादि
से । असम्बद्ध प्रभाषण अर्थात् निरर्थक या अनुचित भाषण । जब ऐसा
पात्र रंगमञ्च पर आता है तो अङ्गहास्य होता है। यहाँ प्रवेश पद से
नाट्य में ही रस है, लोक में नहीं; यही दिखलाया गया है । इस प्रकार
तीन हास्यों में में से कहीं पर एक प्रकार का, कहीं दो तथा कहीं तीनों
प्रकारों का आश्रय लिया जाता है । इस क्रम में विदूषक को अपने
स्वामी राजा, अमात्य या श्रेष्ठो की प्रकृति को समझते हुए विभागशः इसे
२८ ना० शा० द्वि०

प्रस्तुत करना चाहिए परन्तु राजा आदि की अनुपस्थिति में इसका अश्लील
भाषण करना अनुचित है।
१४३-१४६. इस प्रकार गति के उपयुक्त तथ्य को दिखला कर अब
उसकी—'स्वभावजायाम्' इत्यादि से गति बतलाते हैं। इसमें विलम्बित
लय, ताल में लघु, गुरु तथा प्लुत सभी रखे जाते हैं, जब कि अन्यत्र द्रुतलय
के नहीं होने से तथा प्लुत के कालमान के प्राचुर्य से शोकादि के प्रसंग में भी
स्वभावजा गति होती है। गति में गर्वात्मक विकृति भी अलाभलाभ पद से
दिखलाई गयी है। भुक्त पद से उपयोग में लिये गये वस्त्र, भूषा आदि को
संकेतित किया गया है। भयादि में परितः परिक्रम होता है।
१४८-१५१. अपने संभाषण व्यवहार में 'शकार' के अधिक प्रयोग करने
वाला अभिनेता 'शकार' कहलाता है या फिर शकार से उपलक्षित शकादि
जनपद का निवासी भी 'शकार' है। अन्य आचार्य शकार उसे मानते हैं
जिसे उत्तम पद मिलने पर भी उसकी आशय या भावना सदा हीन बनी
रहे। इस विषय में अध्वरहार का एक प्रसिद्ध कथन इस प्रकार है :—
प्राकृतेऽपि शशकारस्य विभूतिर्न प्रसिद्ध्यते।
तद्विभूतिरपभ्रंशे तापस्येव प्रकाशिता॥
[ शकार की विभूति प्राकृत भाषाओं में प्रसिद्धि की हेतु या उसका
आधार नहीं होती परन्तु शकार की यह बहुलता अपभ्रंश भाषा में ताप की
तरह ( ही ) प्रकाशित होती है। तात्पर्य यह कि अपभ्रष्ट पात्र होने से
शकार अपभ्रंश भाषा के ही उपयुक्त होता है।]
इस प्रकार जो उच्च श्रेणी के व्यक्तियों के सम्पर्क एवं ( धन )
विद्या एवं बुद्धि शून्य पुरुष हो, वही शकार होता है। यह अपने वस्त्र,
आभरण के स्पर्श एवं आलोकन में गर्व का अनुभव करता है तथा आर्यजाति
का नहीं होता। म्लेच्छों की जातियों का वर्णन स्वतन्त्र रूप में आगे किया ही
गया है।
१५३. रीछ तथा वानर जाति में जाम्बवान्, सुग्रीव, अङ्गद एवं हनुमान
आदि की जो गति हो उसे स्वजाति के अनुसार रखना चाहिए।
'प्रभविष्णुना'—पद से नरसिंह आदि अवतार के प्राधान्य के अनुरूप गति को
सूचित किया गया है। 'तस्यैव' पद से आलीढ़ स्थान के अनुगत शरीर के
अवयवों द्वारा बायी ओर से गमन किया जाना चाहिए।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४३५
१७१-१७६. प्रकृति संस्थिताम्-यह सामान्य या सहज स्थिति में कहा
गया है किन्तु प्राथम्य या प्राधान्यतः जब कोई गति हो तो उसे भी सम्पन्न
किया जाए इसे 'कृत्वावहित्थम्', इत्यादि से भी कहा गया है। बाहर की
ओर (अर्थात्) कनिष्ठिका अंगुलि के क्षेत्र में वामभुज को लताख्य दशा
में रखे।
१७७-१७८. 'यो विधिः' इत्यादि। उसके पश्चात् 'वामवेध' को
सम्पादित करे अर्थात् एडी के समीप सूची-पाद का निपातन हो। पूर्व में रस,
प्रकृति, काल तथा देश की अपेक्षा से जो मनुष्यों की गति बतलाई गयी हैं
वे सभी गति विलासादि से युक्त रख कर वैसे ही स्त्री पात्रों में भी संयोजित
करना इष्ट है। इस सन्दर्भ में यह भी बतलाया जा चुका है कि स्त्रियों का
पादपात चारकलाओं से अधिक परिमाण का नहीं रखना चाहिए। षट् या
अष्टकल से यह भी यहाँ सूचित किया गया है कि इससे अधिक परिमाण
पुरुषों के लिये भी न रखा जाए क्योंकि जब षट्कलाओं का ही निषेध किया
गया है तो फिर अष्ट कलाओं की तो संगति ही नहीं बैठेगी।
१७६-१८१. यहाँ स्थानीया पद से मध्यम अवस्था वाली युवति का
संकेत है अतः प्रकृत में मध्यम प्रकृति को उद्देश्य करके ही यह विधि दिखलायी
है। आद्य अर्थात् दक्षिण पाद। इसे परिवाहित भी नहीं किया जाए।
१८२-१८३. विभाग के अनुसार अधमपात्रों की गति में प्रेष्याओं की
गति उद्भ्रान्तगामिनी अर्थात् मद विकार से युक्त रखनी चाहिए। 'आविद्ध-
भुज-विक्रमा' अर्थात् बाहुओं का क्रम वर्तना बहुल रहना चाहिए।
१८४-१८६. 'नार्या अर्धम्' नारी के आधे इस प्रकार भाग की विवक्षा में
यहां 'अर्ध नपुंसकम्' से समास हुआ है। नारी की प्रकृति का आधा भाग ही
यहाँ अनुकृत रहने से इसे (नपुंसक को) तृतीया प्रकृति भी कहा जाता है।
तब पुरुषों की गति में उदात्तत्व तथा स्त्रियों की गति में ललितत्व या सौन्दर्य
रहेगा। इनमें गति का परिमाण चार ताल तथा चार कलाएँ होता है।
अनुत्तम स्त्रियों की गति का मान द्विताल तथा द्विकला है। इससे भी आधा
प्रमाण कर्म-कर भृत्यों और अधम पुरुषों का अर्थात् एक ताल और एक कला
प्रमाण रहता है। इस प्रकार अनुत्तम पुरुषादि पात्रों की गति को दिखला कर
मध्यम तथा उत्तम पुरुषों की गति एवं चेष्टा की अनुगामी ही उत्तम, मध्यम
एवं अधम स्त्रीपात्रों की तथा भृत्यों की गति में चेष्टाएँ रखी जाए इस तथा
को 'उत्तम' पद से संकेतित किया गया है।

४३६ नाट्यशास्त्र

१८७-१८८. जहाँ उत्तमादि की स्थिति उद्भिन्न नहीं हुई ऐसे पात्रों को
दिखलाकर विवरण का सर्वग्राहत्व दिखलाने की भावना से—बालानाम्,
इत्यादि से 'बालकों' की गति बतलाई गयी है।
१८६-१६१. 'तद्भावगमनादिति'—जो पुरुष जिस रूप को ग्रहण करता
है उसकी वैसी ही गति (स्वभाव के अनुरूप) रखी जाती है। परन्तु विपर्यय
विशिष्ट-कारण या स्थितिवश होता है—जैसे व्याजादि से। ब्याज = छल।
किसी उद्देश को सिद्ध करने के लिये छल का प्रयोग किया जाता है, इसे भ्रम
उत्पन्न करने के लिये, क्रीड़ा में तथा वञ्चना के लिये प्रयुक्त करते हैं। अपिच
पद से स्त्री और पुरुष का नपुंसक से तथा नपुंसक का स्त्री या पुरुष से
विपर्यय हो जाता है यह दिखलाया गया है। इसी विपर्यय दशा में गति के
विपर्यय में सञ्चारी तथा सात्विक भावों के तथा उपाङ्गादि अभिनयों में होने
वाले विपर्यय भी--'धैर्यौदार्येण' इत्यादि से बतलाये गये हैं। यहां सामान्य
अभिनय में उक्त धैर्य एवं औदार्य का ग्रहण समझना चाहिए तथा इनसे अन्य
भावों का (भी उपलक्षण है यह भी। यथा 'बुध्यापद से-स्थायी भाव का,
सत्व से सात्विक भाव का, कर्म से स्थानकादि विषयक अनुभावों का, वेष से
आहार्य (वेष भूषा के) प्रकार का, वाक्य से संस्कृतादि भाषाओं के वाचिक
प्रकार का चेष्टित से त्रिपताक आदि शारीर का उपलक्षण से ग्रहण समझना
चाहिए।
१६६-१६८. जैसे स्थानक गमन आगे पीछे होता है वैसे ही उपवेशनात्मा
आसन में भी पूर्व-पश्चाद्-भाविता रहने से उसे भी बतलाया जा रहा है—
'अथासन' इत्यादि से। तथैव--अर्थात् जैसे गति में पूर्व पश्चाद् भाव है वैसे
ही शयन और तदाश्रय, आसन आदि में भी। विष्कम्भ अर्थात् वैशाख-स्थानक
के उचित प्रसार से अञ्चित अर्थात् सुन्दर पाद, अतः यहाँ अञ्चितपाद का
लक्षणानुसारी स्वरूप इष्ट नहीं है। स्वस्थ पुरुष के आसन पर बैठने पर त्रिक
उन्नत रहती ही है। यहाँ दोनों हाथ कटि तथा ऊरू पर 'कर्कटमुद्रा में रखे
जाएँ।
१६६-२०० संप्रणष्ट विशेषण केवल इन्द्रियमात्र से सम्बद्ध है, उसे मन के
साथ लगा कर 'आकुल' अर्थ करते हैं। शोक की दशा में 'आकुल-मन' से बैठा
जाए। अपायाश्रयाश्रितः—अपने आश्रित का या किसी वस्तु का सहारा लेकर
रहना। उपवेशयेत्—यहाँ स्वार्थ में णिच् है। अतः कर्ता मात्र यहाँ विवक्षित
है। अन्य आचार्य कहते हैं कि जब वह इस स्थिति मे अपने बाहुओं को फैला
दे तो उसे विश्राम हेतु बिठवा दे।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४३७
२०१-२०२. अंगो के पिण्डीकृतत्व में जानुओं के विश्लेष से घुटनों और
शरीर के ऊपरी भाग का मेल हो गया होता है तथा उसे विघटित कर देने
पर घुटने अलग होकर ऊर्ध्वकाय टेड़ा हो जाएगा । ऐसी स्थिति उत्कटिक
स्थान कहलाती है। इसमें घुटनों का विरलत्व और स्फिक् का भूमि से
स्पर्श रहता है। पूर्व पिण्डितांग दशा से यह भिन्नता ही यहाँ वैलक्षण्य
दिखाता है। निवाप = पितरों का तर्पण । सन्ध्या शब्द से सन्ध्या के योग्य
जप तथा ध्यान का ग्रहण है।
२०३-२०६. विष्कम्भितम्—एक जानु को भूमि पर फैलाकर दूसरे को
यथास्थित रखना । होमादि के करने में मन्त्रादि का उच्चारण भी किया
जाए। शोके च तथा नीचानां—का प्रकृत में सभी स्थान पर सम्बन्ध समझना
चाहिए ।
२०६-२१४. आसन सन्निवेश के प्रसंग में सभी के लिये आसन विधान
बतलाया जाए अतः इसे—'तथासन' इत्यादि से दिखलाते हैं। बाह्य-सभी
व्यक्तियों के उपयुक्त तथा आभ्यन्तर—राजा के योग्य इनका विधान ।
मुण्डासन—गोलाकार चतुरतापूर्ण रचना का आसन । मसूरक—आराम से
बैठने लायक आसन । काष्ठासन—पट्टासन या लकड़ी का पीठक (या स्टूल
जैसी कुरसी) । एवं पद का अभिप्राय है राजा की सन्निधि में। यह
आभ्यन्तर विधि है । अन्यकालों में इच्छानुसार आसन रखे जा सकते हैं इसी
तथ्य को 'स्वगृहवार्तायाम्' इत्यादि से कहा है। तथा पद से सेनापति का
अमात्य के घर जाना जैसी व्यक्तिगत सम्बन्ध की स्थिति दर्शायी गयी है।
२१५-२२०. अपेक्षित नियमादि से युक्त मुनिजन के रहने के कारण
उनके नियत आसन पर ही बैठने का विधान है जो उनके व्रतादि को ध्यान में
रखकर रखा जाता है। स्थानीय अर्थात् आश्रमादि (स्थान) में निवास
करने वाले वृद्ध या पूज्यजन । आसनसत्कार—आसन पर बैठने का निवेदन
कार्य । आसन के विषय में, विभाग की अन्य बात भी—'समे' इत्यादि कारि०
से कही है। सम—जो जाति एवं विद्या में तुल्यता रखता हो । आसन चार
प्रकार के होते हैं—सम, मध्य, उच्च या अतिरिक्त तथा भूमि । मध्यम—
कुछ कम या आसन के प्रमाण में थोड़ा न्यून । हीन—अपनी अपेक्षा से
अधम । भूम्यासन—यहाँ बैठो कह कर निर्देश्य भूमि को बैठने हेतु दिखलाना
यह हीन या अधम जैसे पात्रों के लिये उपवेशन स्थान है।

४३८ नाट्यशास्त्र
२२१-२२७. अब आगे शयन के विभाग पूर्वक सन्निवेश को दिखलाते
हैं—‘आकुञ्चित’ इत्यादि से। वह स्थिति जो अपने शरीर के तिरछे रखने
पर रहे। पूर्वकाय अर्थात् शरीर के ऊपरी भाग के पास किसी इष्ट जन के
बैठने पर बाहुओं के फैलाने में ‘विक्षेप’ होता है तथा शयन पर अन्य जन के
बैठ जाने पर भी ‘विक्षेप’ होता है। शरीर का तिरछा रखना ही ‘आकुञ्चित’
है। इसी प्रकार आगे सभी स्थितियों का स्पष्ट विवरण है।
२२८. अर्थवशेन—व्यवहार के आधार पर तदनुरूप। इस अध्याय के
उपसंहार के साथ अगले अध्याय के प्रारम्भ की संगति के लिये कहते हैं—
‘अतः परम्’ इत्यादि से। रंग में घूमने का निरूपण गत्यध्याय में किया था
उसका कक्ष्याविशेष के विभाग में विशेष उपयोग को अगले अध्याय में कहेंगे।
इति शिवम्।

चतुर्दश अध्याय
(कक्ष्या, परिधि तथा लोकधर्मी निरूपण)
१. 'तु' शब्द से द्वितीयाध्याय में पूर्व में (बहुत पहिले) कही बात को
पुनः संकेतित किया गया है। मण्डप के विशिष्ट भाग रंगपीठ को विभाग
पूर्वक समझ कर (विज्ञाय) कक्ष्या एवं गति के उपयोगी विशिष्ट स्थानों
का प्रयोग किया जाता है। नाटकीय प्रदेशानुसार प्रकोष्ठ को छोड़ते हुए जो
स्थान बचता है उसी में चतुरस्र योजना की जाती है। अतः कक्ष्या के वाम
तथा दक्षिण (बाजू के) भाग में कुतपों (आर्केस्ट्रा) की स्थापना की जाती
है तथा शेष भाग में कक्ष्या का विभाग रखते हैं।
२. रंगमण्डप के कौन (से) विभाग में कक्ष्या हो इसके उत्तर में कहते
हैं—'यो नेपथ्य' इत्यादि से। नेपथ्यगृह और उसका द्वार आदि द्वितीया-
ध्याय में कहे हैं। आतोद्य के बिठलाने पर जो प्रदेश बचा रहता है उसी
रंगपीठ के प्रदेश में पात्रों के निष्क्रम एवं प्रवेश के लिए गति के उपयोगी
स्थान विभाग का निर्देश करना चाहिए।
३. स्थान विभाग कहाँ हो इसके उत्तर में बतलाते हैं कि जिससे प्रवेश
हो उसे 'परिक्रम' कहते हैं। जहाँ चारी आदि का सन्निवेश हो उस रंगपीठ के
स्थान को (स्थान भेद से) छोड़ा नहीं जाता है (अर्थात् यही कक्ष्या-प्रदेश
होता है)। परिक्रम से स्थान भेद हो जाता है—जैसे ऊपर चढ़ने के गात्र को
सम्हालना, अतिक्रान्त पद से गति रखना—जैसे स्थलों में इसी स्थान भेद से
आरोहणीय स्थल की प्रासाद या पर्वत रूप स्थिति को दिखलाया जाता है।
४-६. रङ्गपीठ पर क्रम विशेष एवं स्थान भेद की कल्पना से कक्ष्या-
विभाग के विशिष्ट देश में भिन्न स्थानों की रचना मान ली जाती है, उन्हें
रचनाकार आदि को स्मरणार्थ (ही) उपलक्षण द्वारा बतलाया (लिखा)
गया है। यद्यपि पृथ्वी आदि सभी स्थानों को एक ही शब्द 'त्रैलोक्यम्' से
कहा ही गया है फिर भी स्वर्ग, पृथ्वी तथा पाताल के भेद से गृह, प्रासाद,
पर्वत का कथन वर्णनोद्देश्य के लिये पृथक्-पृथक् वर्णित हुआ है।
७. इसी त्रैलोक्यवर्ती देशों के पृथक् वर्णन को दिखलाने के लिये—'नगरे'
इत्यादि से यहाँ कहते हैं। यहाँ अटवी पद से ग्राह्य उद्यान, आराम,

४४० नाट्यशास्त्र
सरिता, आश्रम आदि को साक्षात् बोधक पदों से नहीं कहा हो तो वे 'वा'
शब्द की वीप्सा से द्योतित हो जाते हैं ।
८. इतिवृत्त या प्रस्तुत रूपकादि में विद्यमान या प्राप्त वृत्तान्त के
मध्यवर्ती प्रदेश ही रङ्गपीठ पर कक्ष्या में विभाग पूर्वक दिखलाये जाए—इसी
भाव से रंगपीठ के विशिष्ट देश को—'बाह्यं वा' इत्यादि से बतलाते हैं ।
रङ्गपीठ के अभिनेय-स्थल पर देशादि की कल्पना के साथ प्रदेश के दूर या
सामीप्य के आधार पर या अभिनय के अल्पत्व एवं आधिक्य के कारण
भिन्नता को लिये हुए परिक्रम से ही (दूर आदि भेदों की) कल्पना की
जाए ।
६. ये बाह्य आदि भेद—'पूर्वं प्रविष्टा' इत्यादि से निरूपित करते हैं ।
यहाँ पूर्व पद का अर्थ दो तरह से होता है एक पूर्व अर्थात् प्रधानभूत । अतः
प्रधान होने से जिनका प्रवेश पहिले हुआ था, वे आभ्यन्तर तथा उनसे
अधिष्ठित देश विशेष को आभ्यन्तरकक्ष्या कहते हैं । इसी प्रकार पीछे प्रवेश
करने वाला बाह्य तथा उसके द्वारा अधिष्ठित बाह्यकक्ष्या-स्थान विशेष के
द्वारा पूर्वप्रविष्ट का उपसर्पण या अनुगमन करने वाले का स्थानविशेष
मध्यमकक्ष्या कहलाता है । पूर्व प्रविष्ट भी यदि अप्रधान (पात्र) है तो
प्रधान के प्रवेश के बाद भी वह अपनी कक्ष्या के अन्त में ही स्थित रहता है ।
यही कल्पना यहाँ की गयी है ।
१०. पात्रों के रङ्गपीठ पर प्रवेश के साथ एकत्र हो जाने या मिल जाने
पर उनके द्वारा करने योग्य (सम्पाद्य) कार्य दिखलाने के लिये—'तेषान्तु'
इत्यादि से विधान बतलाते हैं । तेषां—अर्थात् जो पूर्व में प्रविष्ट हैं उन । यहाँ
'तु' शब्द से पूर्वप्रविष्ट पात्र तथा उनसे बाद में मिल जाने वाले पात्रों के
क्रिया-कलाप का 'बाह्य' कक्ष्य में विधान सूचित किया गया है । इसी प्रकार
'अथ' शब्द से पूर्वप्रविष्ट पात्रों का दक्षिणादि से क्रम है तो बाद में प्रविष्ट
पात्रों का उसके (सामने होने से) विपरीत क्रम स्पष्ट (ही) समझा जा
सकता है, (यहाँ यही क्रम 'अथ' पद से दिखलाया है) पूर्वप्रविष्ट पात्रों की
प्रवृत्ति के लिये ही दक्षिणाभिमुख आदि क्रम विहित है (यही आशय है) ।
११. रंगपीठ पर कौन (सा प्रदेश) पूर्व दिशा हैं?—उत्तर—जिसकी
अपेक्षा से या जिस ओर आतोद्यादि वाद्ययन्त्र रखे हों तथा वादक बैठे हों वही
पूर्वदिशा होती है । प्रश्न—केवल भाण्ड के मुख को ही प्रमाण क्यों माने ?
उत्तर—इसी लिये 'द्वार' को भी कहा गया है कि द्वार को प्रमाण मान कर ।
क्योंकि वह विधानानुसार ही निर्मित होता है । इसी प्रकार नेपथ्य पद के

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १४ ४४१
ग्रहण से भी यही स्पष्ट है कि नेपथ्यगृह का द्वार पूर्वाभिमुख होता है। अतः
वही पूर्व दिशा है। भाण्ड पद तो उसकी प्रतियोजना रहने पर प्रमुखता के
साथ पूर्वदिशा को सूचित करता है यही समझ कर प्रयुक्त है।
१२. 'तेनैव' का अर्थ है कि पूर्व में प्रविष्ट पात्र के अनन्तर प्रविष्ट दूसरे
पात्र के सम्बन्ध द्वारा।
१७. पूर्वकथित बाह्य, मध्य तथा आभ्यन्तर तथा दूर, मध्य एवं
सन्निकृष्ट के विभाग को कहते हैं—'सैव भूमि' इत्यादि से।
१८-१९. 'नगरे वा' इत्यादि से भूमि के विकृष्टत्व, मध्यत्व एवं सन्नि-
कृष्टत्व को उसके बहुत्वं एवं अल्पत्व के कारण ही नहीं परन्तु परिक्रम की
विचित्रता के कारण भी मानना होता है यही दिखलाया गया है। प्रयोग =
जो नाट्य में किया जाए। दिव्य = पिशाच से लेकर सभी दैवयोनियाँ। इनका
नगर, दीप आदि में गमन आकाश से, आकाशगामी विमान या अन्तर्हित
करने वाली माया से अथवा विविध प्रयोजनों वाली बलाद् आहरण करने
वाली क्रियाओं से दिखलाया या सम्पन्न करवाया जाए।
२०-२१. दिव्यों के लिये केवल यही उपर्युक्त विधान नहीं है। ऐसे अन्य
प्रकार भी हैं उन्हें दिखलाने के लिये—'नाटके' इत्यादि से पुनः कहते हैं।
छन्नवेष पद से यह दिखता है कि वरदान आदि या अनुग्रह करने के कारण
देवताओं का भी अपने स्वरूप को छिपा कर मनुष्य के रूप में दर्शन हो जाता
है। ऐसी दशा में दिव्य पात्र का भूमि पर संचार होगा ही क्योंकि जहाँ
घूमना है वहाँ तो भूमि रहेगी ही।
२२. (यहाँ) देवताओं का साधारण प्रकार दिखलाते हैं—'दिव्यानाम्'
इत्यादि से। पुराणों में सामान्यतः इसे बतलाया भी है। यह भारतवर्ष में ही
न कि इलावृत आदि खण्डों में।
२७-३२. वर्षों में हरिवर्ष, किम्पुरुष आदि स्थानों में प्रचार कहते हैं—
'हिमवत्' इत्यादि से। हिमवान् में इनकी गति अर्थात् प्रचार है। इसी
प्रकार सर्वत्र समझना चाहिए। नील पद अद्रि का विशेषण है तथा इसी का
विशेषण वैडूर्यमय है। यह विवरण कविशिक्षा के लिये (भी) दिया गया
है। दिव्यजन के ये ही आवास होते हैं।
३२-३६. तेषाम्' इत्यादि से वर्षान्तरों में होने वाले (दिव्य पर्वतों पर
सम्भव एवं उचित) गमन प्रदेश के तथा कार्य आदि विषय में यहाँ बतलाया

४४२ नाट्यशास्त्र
गया है। 'कक्ष्याविभागश्च' में उपात्त 'च' को 'इव' अर्थ में प्रयुक्त समझना
चाहिए। जम्बूद्वीप की तरह दिव्य पर्वतों को भी कक्ष्याविभाग में लिया
जाकर दिव्यपात्रों की गति स्थानविशेष से उपलक्षित करनी होती है।
'परिच्छदविशेष' पाठके अनुसार उन देवताओं के विशिष्ट उपकरणों को चारों
ओर नहीं रखा जाता है। 'परिच्छेद' पाठ को यहाँ मूल में लिया गया है।
तदनुसार अर्थ है—दूरस्थ पदार्थ को जान लेना और व्यवधान में स्थित पदार्थ
को जान लेने जैसे कार्य (यहाँ) नहीं दिखलाने चाहिए। प्रश्न—यदि देवगण
के ऐसे रूप को न दिखलाये तो फिर कैसा रूप रखा जाए? उत्तर—इनमें भी
मनुष्यों के भाव ही दिखलाने अभीष्ट हैं जिन्हें मनुष्यों की तरह दिखलाना
चाहिए। अंशावतार श्री—रामादि नायकों का जो उत्कृष्ट एवं अतिशय
विशिष्ट चरित है वह भी मानुषोचित ही है। इसी प्रकार जिन २ अवतारों
में दिव्यभाव की स्थिति हो उनके भी चरित मनुष्यवत् ही दिखाना चाहिए।
ऐसी स्थिति में देवगण के पलक न गिराने जैसे शास्त्र वर्णित रूप को यहाँ
नहीं दिखलाना चाहिए।
इसका अन्य कारण यह है कि इस लोक में भाव, संचारी और स्थायी
सभी दृष्टि के द्वारा ही प्रस्तुत किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त सूचा-अभिनय
भी भाव के योग से ही प्रस्फुटित होता है। इसलिये इन सभी कारणों से
देवपात्रों की ( भी ) उनकी अपनी मूल प्रकृति मंच पर प्रस्तुत ( हीं की जाए
किन्तु मनुष्यवत् ही उनकी चेष्टाएँ रखी जाए।
३६. प्रवृत्तियों का उद्देश्यक्रम से चतुर्विधत्व दिखलाने के लिये—
'चतुर्विधा' इत्यादि से स्वरूपादि विवरण आरम्भ करते हैं।
प्रश्न--इन्हें क्यो प्रवृत्ति कहते हैं, इनके मानने में हेतु क्या है, किस
आधार पर ये प्रवृत्तियाँ है तथा इन प्रवृत्तियों का किससे उद्भव हुआ है।
ये चार प्रश्न यहाँ बनते हैं जिनका आचार्य ने विवेचन किया है। इनमें प्रथम
प्रवृत्ति के विषय को कहा गया कि वह कैसे हुई। देशविशेष के वेष, भाषा,
आचार एवं वार्ता के वैचित्र्य की प्रसिद्धि को 'प्रवृत्ति' कहते हैं। इसमें
ऐसी योजना है—जिन २ देशों में जो वेषभूषा है, जो भाषाप्रवाह है, जो
लौकिक एवं शास्त्रीय रूप में प्रचलित आचार है तथा जो कृषि-पालन एवं
वाणिज्यादि जीविका रूप वार्ता है उनको प्रख्यापन करने या पृथिवी-मण्डल पर
स्थित विद्या की प्रसिद्धि की आधायिका भी 'प्रवृत्ति' कहलाती है। 'प्रवृत्ति'

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १४ ४४३
शब्द बाह्य अर्थ के निवेदन अर्थात् निःशेष वेदन या बतलाने के ज्ञान रूप
अर्थ में यहाँ प्रयुक्त है ।
प्रवृत्तियों के चतुर्विधत्व ( तथा ) संख्या के विषय में और भी बतलाते हैं
'यथा' इत्यादि से 'देशाः' तक । देशों के नानात्व को मान कर मुनि ने
'चारप्रवृत्तियाँ' ऐसा कहा है अतएव देश भी चार ही हैं ऐसा नहीं समझना
चाहिए । इसका आशय यह नहीं कि इतनी ही कहीं गयी हैं तथा अन्य का
परित्याग कर दिया हो । ये सभी आशंकाएँ हैं । वस्तुतः इनके चार प्रभेद
( प्रयोगों में ) लक्षणों की समानता के आधार पर रखे गये हैं । प्रयोग
अर्थात् नाट्य-प्रयोग । इन चारों की लक्षणगत समानता से साधारण
स्वभाव वाले प्रयोगों का व्यवहार होता है । प्रवृत्ति सदा लोक के अनुगुण
( अनुकूल ) अनुसरण को ही कहा जाता है । क्योंकि लोक का-दक्षिण, पूर्व,
पश्चिम तथा उत्तरभूमि इस प्रकार-चतुर्धाविभाग है और यह विभाग बिना
किसी कारण के नहीं है ।
'तथाहि' इत्यादि से दाक्षिणात्यों में शृङ्गार की प्रचुरता होने से
कैशिकी वृत्ति का होना संभव है, पश्चिम में आवन्ती का संग्रह तो है परन्तु
कैशिकी भी है, इसके अतिरिक्त धर्म की प्रमुखता होने से सात्वती भी है ।
प्राच्यों में विशिष्ट वागाडम्बर की प्रमुखता रहने से भारती एवं आरभटी का
योग रहता है ।
उत्तर में यद्यपि भारती एवं आरभटी का ही प्रमुखतः योग होता है
फिर भी कैशिकी के आंशिक सम्बन्ध रहने से जनता शृङ्गारमय प्रयोग की
सहिष्णु रुचि रखती है । इस प्रकार विभिन्न चित्तवृत्तियों के सादृश्य को चार
प्रभेदों में दिखलाया गया । यद्यपि लोक अनेक प्रकार के वेष, भाषा तथा
आचार आदि से युक्त होता है परन्तु नाट्य में चित्तवृत्तियों की चार प्रमुखता
के अनुकूल ही ये चार प्रभेद कर लिये गये हैं ।
३७-४०. यहाँ भिन्न-भिन्न कुछ देशादि का प्रतिपद पाठ कवि एवं
अध्येतृगण को उन उनकी रुचि एवं देश का ज्ञान करवाने के उद्देश्य से
दिया गया है ।
४१-४२. 'नित्यमेव तु'—देशभेद से होने वाली चित्तवृत्तियों का क्रम
अनादि है क्योंकि देशभेद के औचित्य से प्राप्त स्वभावभेद वेषभूषा पर
स्पष्ट दिखाई देता है । यह स्वभावभेद ही वेष की प्रक्रिया को देशगत
भिन्नता में बदल देता है ।

४४४ नाट्यशास्त्र
४३-४५. पूर्वदेश की सीमा होने से दक्षिण में उडू है तथा समुद्र के
निकट उत्तर में मागधी है अतः इन देशों के मध्य के प्रदेश में 'उड्रमागधी'
है। यहाँ इसीलिये अंग, बंग, एवं कलिंगों में उभयोपजीविता के आशय से
उन्हें दो वृत्तियों के मध्य में परिगमन किया गया ।
४६. यहाँ 'पुराणे' शब्द के द्वारा यह विषय आगम सिद्ध है यह भी
संकेत दिया गया है ।
४७-४६. यहाँ अल्पगीतार्थ कथन से लेशतः कैशिकी की सहमति मुनि
ने दिखलायी है ।
५०-५२. दक्षिण तथा उत्तर को छोड़ कर परिक्रमण नहीं किया जाता
है। इसीलिये निकट की दो वृत्तियों को मिला कर प्रयोग करने का विधान
बतलाया गया है । इस प्रयोग के समय दाक्षिणात्य उत्तरद्वार से प्रवेश कर
पश्चिम दिशा में परिक्रमण करे और घूम कर उसी दिशा में आत्मनिवेदन
करे । जैसा कि पूर्व में कहा भी है—'दक्षिणाभिमुख हो आत्मनिवेदन करें'
(ना० शा० १४।१०) । निष्क्रमण में भी उत्तर से पूर्व को तथा फिर दक्षिण
तथा पश्चिम की ओर जाते हुए उत्तर दिशा से निष्क्रमण किया जाय । इसी
प्रकार सात्वती आदि से विपरीत क्रम पाञ्चाली में रहता है। दक्षिण द्वार
से किया जाने वाला प्रवेश भी आभ्यन्तर कक्ष्या में स्थित पात्र के निकट ही
होता है। यही प्रक्रिया अपसव्य प्रवेश में भी होती है ।
५३. अन्य विशेषताएँ भी बतलाते हैं—'एकीभूता' इत्यादि से । देश,
काल एवं स्थितिवश पात्रों की समीक्षा से जो वैचित्र्यकृत प्राधान्य दिखे
उसी के अनुसार नियम में सांकर्य भी किया जा सकता है। इसी कारण मूल
में 'एकीभूताः' कहा गया । अर्थात् प्रधान का अनुगमन सर्वत्र किया जाए ।
५४. इसी प्रकार प्रयोक्ता का परिक्रम दिखला कर अब प्रवृत्तियों का
उपयोग बतलाते हैं—'येषु' इत्यादि से । जिन देशों में जो प्रवृत्ति हो उसी
के अनुरूप रूपकों में वृत्तियाँ भी रहे । अर्थात् उसी देश के नायक के प्राधान्य
द्वारा वे ही रूपक कवि के द्वारा निबन्धनीय एवं अभिनेता के द्वारा प्रयोज्य
भी होना चाहिए ।
५८-५६. आविद्धाङ्गहारं = आविद्ध अर्थात् उत्कट अंगों का हरण जहाँ
हो वह । आहव = संग्राम, जहाँ वीर एक दूसरे को चुनौती देते हों ( आह्व-
यन्ते इति आहवः=व्युत्पत्ति के अनुसार ) । मणि, मन्त्र या औषधि के प्रयोग
से रूप का परिवर्तन 'माया' ( कहलाता ) है । सादृश्य के आधार पर
हस्तलाघव द्वारा रूपान्तरण 'इन्द्रजाल' होता है । पुस्त = लकड़ी या मिट्टी

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १४ ४४५
आदि से निर्मित आकृति या मूर्तियाँ। आविद्ध = स्त्रियों के कर्म तथा रूपों
को दिखलाने वाला होता है जिसे आगे बतलाएँगे।
६०. 'डिमादि' चार रूपक उद्धत माने गये हैं ये भिन्न-भिन्न तो है
ही; किन्तु इनका वर्ग बना कर विभाजन कर दिया गया है। इसी प्रकार शेष
नाटकादि छः सुकुमार समझना चाहिए। नाट्य के अन्तरंग एवं उपकारक
कक्ष्याओं के आधार पर उद्धत तथा सुकुमार नाट्य-प्रयोग होते हैं।
६८. देश का प्रवृत्ति के क्रम से विवरण देकर अब उसी को आङ्गिक
अभिनय के अंग रूप में दिखलाने के उद्देश्य से 'धर्मी' का विवरण देना
आवश्यक मान कर यहीं मुनि ने 'धर्मी' का भी निरूपण किया। यह धर्मी दो
प्रकार का होता है (जिसका ना० शा० षष्ठ अध्याय ६।१० उद्देश्यक्रम में
उल्लेख हैं) लोक विषयक एवं नाट्यविषयक होने से द्विविध धर्मी हो जाता
है। यह धर्मी नाट्यप्रयोग की भित्ति या आधार होता है।
यद्यपि लौकिक धर्म के अतिरिक्त नाट्य में धर्म नही होता। तथापि
वह लौकिक प्रक्रिया में रञ्जनाधिक्य की प्रमुखता के आधार पर प्रयुक्त होने
पर प्रयोग-व्यापारगत विचित्रता को लाता है इसी कारण ये लोक नाट्यधर्मी
दोनों प्रभेद माने भी जाते हैं।
६६-७०. जो जिसका स्वाभाविक भाव है—स्थायी या संचारी उनसे
युक्त। स्त्री तथा पुरुष नाना हैं फिर भी जब (भूमिका) स्त्री प्रयोज्य हो
तो उसकी प्रयोजिका स्त्री मानी जाएगी और पुरुषों में पुरुष। इस प्रकार
का अभ्यास एवं चेष्टित (काय व्यापार) जहाँ हो उसे 'लोकधर्मी' कहेंगे
क्योंकि उसमें लोक के धर्मों का व्यपदेश है। लोकवार्ता = लोकप्रसिद्धि।
इसमें जो क्रिया (या) व्यवहार है उससे युक्त जो नाट्य है वह भी 'लोक-
धर्मी। धर्म तथा धर्मवान् में अभेदोपचार (भी) होता है। काव्य के
एवं नाट्यप्रयोग के भाग का लोकधर्म पर आश्रय लेना या आधारितरूप
'लोकधर्मी' समझना चाहिए जिसमें वैचित्र्य का योग या उद्भावना होती हो।
७१-७२. अब नाट्यधर्मी का क्रमप्राप्त विवरण देते हैं 'अतिवाक्य'
इत्यादि से। अतिवाक्य-क्रियोपेतम् = इसमें प्रयुक्त 'क्रिया' शब्द का अर्थ है
कि इतिहास की यथावृत्त घटना का अतिक्रमण कर जो कथावस्तु के उपयुक्त
इतिवृत्त की कल्पना की गयी है वही यहाँ 'क्रिया' है। सत्व = स्वभाव,
भाव = चित्तवृत्ति। इनका अतिक्रमण करके जो कवि-कल्पित चित्तवृत्तियाँ।
जैसे स्वभाव का अतिक्रमण कर महारानी द्वारा संस्कृत में भाषण करना। यह

४४६ नाट्यशास्त्र
अभिनेय में नाट्यधर्मी हो गया है। लीलाप्रधान एवं मनोहर अंगहारों की
प्रमुखता वाले अभिनय से युक्त नाट्य की लक्षणानुसारिता भी नाट्यधर्मी
है। जहाँ पुरुष अपने ( सहज ) रूप में न रह कर स्त्रीभाव का आश्रय
ले ले तो भी नाट्यधर्मी हो जाता है। यहाँ 'भवेत्' क्रिया के द्वारा
ग्रन्थकार ने संभावना में लिङ् का प्रयोग किया है जो समयनिष्ठता को
दर्शाता है। यह सम्भावना रञ्जन के तथा कथावस्तु के लिये भी उपयोगी
रहना चाहिए।
७४. आसन्नवचन के अश्रवण तथा दूसरों के अश्रूयमाण का श्रवण आदि
केवल यहाँ धर्मतः सम्भव है तथा सौन्दर्याधायक भी होते हैं। अनुक्त को
आकाशभाषित के रूप में केवल अभिनेता मात्र श्रवण करता है।
७५. नाट्यधर्मी की इसी बहुलता तथा व्यापक क्षेत्र को अनेक उदाहरणों
तथा विवरणों से दिखलाने के लिये यह विस्तार दिया गया है। शैल आदि
पदार्थों का आवश्यकतानुसार अभिनेता जो प्रयोग करते हैं यह प्रयोग भी
'नाट्यधर्मी' होता है !
७८. 'नृत्यतेऽवगम्यते' में नृत्त सदृश 'विशाखागति' का प्रयोग सूचित
किया गया है। यहाँ ललित अर्थात् आवेष्टितादि करण से गृहीत वर्तना तथा
उत्क्षिप्त पद से चतुस्तालादि के द्वारा काल-विभाग भी सूचित होता है ।
८१. नाट्यधर्मी के व्यापकत्व को दिखला कर उपसंहार में कहते हैं—
'नाट्यधर्मी' इत्यादि । नाट्यधर्मी में जो गति है उसमें हेतु है अंग अर्थात् गीत,
आतोद्य आदि तथा अभिनय । यहाँ अङ्गाभिनय पद में समाहार द्वन्द्व के
कारण एकवचन का प्रयोग हुआ है। राग = सामाजिक की प्रीति ।
८२-८३. अध्यायार्थ का उपसंहार करते हैं—'एवम्' इत्यादि से । यहाँ
दो धर्मियों के रहने से यद्यपि द्विवचन होना चाहिये फिर भी 'धर्मी' पद में
एकवचन के प्रयोग के द्वारा अभिनय में नाट्यधर्मी की प्रमुखता को दिखलाया
गया है, क्योंकि लोकधर्मी इसी में समाविष्ट ( हो सकता ) है। युक्तयः =
प्रवृत्तियाँ । अवशिष्ट अभिनय को सात्विक भावों के अभिनय तथा सामान्य-
भिनय के प्रसंग में आगे कहा जायगा । (ना० शा० भाग ३, :अध्याय २४ में)
अब जो 'वाक्य' बचा तथा जो तत्वतः धर्मी भी है उसके स्वरूप का अगले
अध्याय में निरूपण किया जायगा इस कथन से यहाँ आङ्गिक अभिनय का
उपसंहार करते हुए अध्याय समाप्ति को ( भी ) किया गया है।

पञ्चदश अध्याय
(वाचिकाभिनय)
१. आङ्गिक अभिनय के अनन्तर वाचिक का विशेष निरूपण आवश्यक
है क्योंकि आङ्गिक के विषय को प्रस्तुत करने या समर्पण में आधारभूत यही
वाचिक अभिनय होता है। वागभिनय—यहाँ 'वाचामभिनयः' से षष्ठी तत्पुरुष
समास है ही नहीं किन्तु 'वागेवाभिनयः' विग्रह से कर्मधारय समास ही है।
क्योंकि वाणी ही अभिनय है अर्थात् रंगस्थल पर अभिनेता जो संवादादि
बोलता है वही अभिनय। षष्ठ अध्याय में जिसका नाम मात्र उल्लेख हुआ
था अब यहाँ उसी का स्वरूप विशेषतः प्रस्तुत करना है। अतः यहाँ लक्षणत्वेन
अभिधान के कारण इसी का प्राधान्य समझना चाहिए।
२. वाचिक के लक्षण में कारण बतलाने के लिये कहते हैं—'वाचि'
इत्यादि से। क्योंकि वाणी नाट्यप्रयोग के अभिनय की तनु = आधारभूमि
है। सकल प्रयोगों की आधार, गाने बजाने के लिये अनुग्राहक तथा स्वयं
अभिनय स्वरूपा वाणी ही होती है। इसलिये जब वाणी से अभिनय होता
है, तब ये अङ्गादि भी (वाक् सहित होकर) अपने-अपने अर्थ को व्यक्त
करते हैं।
३. वाणी उपयोगिनी होकर विश्व की कारण है इसे 'वाङ्मयानि'
इत्यादि से भी कहते हैं। यह वाणी 'चतुर्थगोपाय' अर्थात् चौथे भाग में
(पुरुषार्थ) के रहने वाले मोक्ष की उपायभूता होती है। इस तथ्य का भी
संकेतित मिलता है। वाङ्निष्ठानि—अर्थात् फलरूपा वाणी में जिसकी
निष्ठा अवस्थान है। इस प्रकार वाणी ही संसार की अवभासिका है
तथा सभी की कारण है और वही निर्वाहिका (भी) है। 'वाणी ही
सम्पूर्ण भूत है' (वाग् वै विश्वा भुवनानि) इस श्रुति के अनुसार वाणी
ही समग्र जगत् का कारण है क्योंकि विश्व शब्द का विवर्त है तथा यह वाणी
ही अर्थ के रूप में विवर्तित होती है। इसी तथ्य को भर्तृहरि ने वाक्यपदीय के
ब्रह्मकाण्ड में विस्तार से दिया है। (इसके उद्धरणात्मक अंश १।१२१, १२४
तथा १२६ को पाद टिप्पणी में देखना चाहिये। द्र० ना० शा०, भाग २ पृष्ठ
२०१)। यह सर्वाकार है इसी कारण इतिवृत्त को नाट्य का शरीर भी
आगे कहा जायगा (द्र० ना० शा० अध्याय २१।१) क्योंकि इतिवृत्त भी
वाङ्मय (रूप वाला) होता है।

४४८ नाट्यशास्त्र
४. इस वाचिक के अंग ( विभिन्न ) शास्त्रों में प्रसिद्ध नामाख्यातादि हैं
जिनका अगली कारिका से शिक्षार्थ विवरण आरम्भ करते हैं—'नामाख्या-
तादि' । यह शास्त्र योग अर्थों के द्वारा तथा शब्दरूपसौन्दर्य से होता है,
जिसके विभाग युक्त ( अंग ) हैं ये ही नामादि । नाम—जैसे 'मदनरिपु'
शब्द यह संज्ञावाचक है किन्तु शृंगार के प्रसंग में इसका प्रयोग वर्ज्य है ।
क्योंकि जो मदन का रिपु हो शृङ्गारी कैसे होगा । इस प्रकार व्यावहारिक
दृष्टि से यहाँ अनौचित्य है। नाम की तरह आख्यात-( क्रिया ) का भी
वैचित्र्याधान की स्थिति में ही प्रयोग इष्ट है। यथा कुमारसम्भव में—
'स्मरसि स्मर मेखलागुणैरुत गोत्रस्खलितेषु बन्धनम्' (कु० ४।८) ।
यहाँ 'स्मरसि' पद वैचित्र्य का आधायक है। उपसर्ग भी प्रकृत अर्थ
से योग रखे तो प्रयोज्य होता है अन्यथा होने पर नहीं। यथा—'अस्त्रैस्ता-
वन्मुहुरुपचितैर्दृष्टिरालुप्यते मे' ( मेघदूत ३०।४२ ) यहाँ 'उपचितैः' में 'उप'
उपसर्ग के कारण अर्थाधिक्य द्योतित होता है। इसी प्रकार उपसर्ग पद से ही
कर्मप्रवचनीय का भी उपलक्षण समझना चाहिए। निपात का उदाहरण—
'ह हा हा देवि धीरा भव' इत्यादि पद्य जहाँ 'ह हा' हा' से तीव्र खेद की
अभिव्यक्ति को साधा गया है। तद्धित का उदाहरण है रघुवंश का पद्य
'शात्रवञ्च पपुर्यशः' (४।४२) यहाँ अण् प्रत्यय से ग्रासी कृत या गुणीकृत
यश को ग्रहण करना व्यक्त किया गया है। समास का उदाहरण है—
'मध्ये गङ्गायमुनम् अनु' यहाँ समास के कारण एकार्थीभावगत वैशिष्ट
दिखलाया गया है। सन्धि का उदाहरण है—'भवतोया' यहाँ भवतो + या
सन्धि है जिसकी एकपद सी प्रतीति होती है। विभक्ति सुप् तथा तिङ् हैं
जिनसे कारक शक्ति और लिङ्ग आदि का उपग्रह उपलक्षित होता है।
यथा—'पाण्डिम्नि मग्नं वपुः' (विद्ध० भ० २।२१) इसमें शरीर को
मज्जनक्रिया का कर्त्ता बतलाया है तथा उस कर्तृत्व के अधीन शरीर
पाण्डुत्व का आधार हो गया है यह द्योतन अतीव रंजनकारी है। क्रिया का
उदाहरण है—'ग्रस्तं कुलान्तं जगत्' यहाँ ग्रस्तं पद का उपन्यास है न कि भुक्तं
का । यद्यपि ग्रसति पद से भक्षण मात्र परिभाषित किया है तथापि यह
ग्रास्तातिशय है कुलान्त के विषय में। इस प्रकार कविता के वाचक शब्द को—
जो काव्यरूप होते हैं—विभक्त करके यहाँ इस प्रकार दिखलाया गया है।
३७. छन्द नियत अक्षरों वाला होता है जिसमें अक्षरों (या मात्राओं)
का नियम रहता है (अर्थात् गुरु, लघु आदि का नियम होता हैं) इसके

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १५ ४४९
विपरीत चूर्णपद होता है जहाँ अक्षर एवं संख्या का नियम नहीं हो । अर्थ की
अर्थात् शृंगार या वीरादि उनकी अपेक्षा से जहाँ अक्षर निबद्ध हों, यह
पाठ्य होता है, अतः गद्य कहलाता है ।
३८. यति = विराम तथा छेद = यति के द्वारा किये गये पद विभाग
इनसे युक्त । प्रमाणनियतात्मकम्-पाद की संख्या के प्रमाण के अनुसार
जिसका स्वरूप नियत = निबद्ध है ऐसा पद 'निबद्धपद' कहलाता है ।
३६. छन्द का लक्षण आरम्भ करने के लिये उसके स्वरूप को बतलाते
हैं--'एवम्' इत्यादि से । वर्ण गुरुत्व से एवं लघुत्व से युक्त विशिष्ट वर्णरूप
जो चार पादों से युक्त हो-पद्य है । यह पद्य पादों से निर्मित होता है । गद्य
तथा पद्य दोनों ही निगदनीय अर्थात् उच्चारणीय होते हैं तथापि गद्य ही इस
नाम से व्यवहार में प्रचलित है ।
४३-४६. एक अक्षर से आरम्भ कर २६ अक्षरों तक के पाद वाले
उक्ता से उत्कृति तक 'छन्द होते हैं । जिनके चारों पाद तुल्य लक्षण वाले हो वे
'सम' कहलाते हैं तथा जो प्रथम एवं तृतीय या द्वितीय एवं चतुर्थ पादो में
सम हों वे 'अर्धसम' तथा चारों पादों में अतुल्य लक्षण वाले पाद हों तो उन्हे
'विषम' छन्द कहते हैं ।
५०. ये छन्द हैं तथा इनके ये आगे भेद हैं । प्रश्न-इनके ये भेद कैसे हो
जाते हैं ? उत्तर-प्रस्तार में जो योग-युक्ति है उससे भेद बनते हैं जिसे आगे
बतलाया जाएगा ।
५१. यद्यपि एकाक्षर से आरम्भ होने वाले पादों के छन्द होते हैं किन्तु
भरतमुनि ने उन्हें छोड़ कर छः अक्षरों वाले पाद छन्दः से ही विवरण आरम्भ
किया है तथा प्रस्तरभेद भी दिये हैं । इसका कारण है काव्यों में तथा शास्त्र
ग्रन्थों में इन्हीं छन्दों की प्रयोग बहुलता तथा प्रयोग योग्यता रहना । दूसरा
कारण है इनके लक्ष्य में प्रयोग या उदाहरण की विरलता, फिर भी शास्त्रज्ञान
की पूर्णता के लिये निरुपयोगी भी इन प्रकारों का अध्ययन वेद की तरह किया
जाना उचित है ।
५२. 'वृत्तानि' इत्यादि के द्वारा भरत मुनि संख्या आदि को स्वकण्ठ से
पढ़ते है ।
● नाट्यशास्त्र में पद्य १०१ के पश्चात् प्राप्त अधिक एवं प्रक्षिप्त पद्यों को
मूल तथा हिन्दी व्याख्या सहित यहाँ दिया जा रहा है । सौकर्य के लिये इनमें
क्रम संख्या लगाई गयी है जो अन्य संस्करणों में भी ( मिलती ) हैं ।
२६ ना० शा० द्वि०

४५० नाट्यशास्त्र
१एतेषां छन्दसां भूयः प्रस्तारविधिसंश्रयम् ।
लक्षणं सम्प्रवक्ष्यामि २नष्टमुद्दिष्टमेव च ॥ [ १ ]
प्रस्तारोऽक्षरनिर्दिष्टो मात्रोक्तश्च ३तथैवहि ।
द्विकौ ग्लाविति वर्णोक्तौ मिश्रौ चेत्यपि ४मात्रिकौ ॥ [ २ ]
५गुरोरधस्तादाद्यस्य प्रस्तारे लघु विन्यसेत् ।
अग्रतस्तु सम्प्रदेया गुरुवः पृष्ठतस्तथा ॥ [ ३ ]
अब मैं इन्हीं छन्दों की प्रस्तारविधि का अनुसरण कर नष्ट और उद्दिष्ट
के लक्षणों को बतलाता हूँ । [ १ ]
प्रस्तार दो प्रकार का ( से ) होता है ( एक ) अक्षरों के निर्देश से होने
वाला ( वर्णिक प्रस्तार ) तथा ( दो ) मात्राओं से उक्त ( या मात्रिक
प्रस्तार ) । इसका उदाहरण है-वर्णों की संख्या आदि के नियम से जो द्वित्व
संख्या के परिमाण वाले ( द्विकौ ) गुरु तथा लघु ( ग्लौ ) हैं वे मात्रिक हैं
प्रथमं गुरुभिर्वर्णैर्लघुभिरत्तवसानजम् ।
वृत्तन्तु सर्वच्छन्दस्सु६ प्रस्तारविधिरेव तु ॥ [ ४ ]
गुर्वधस्ताल्लघु न्यस्य तथा द्विद्वि यथोदितम् ।
न्यस्येत् प्रस्तारमार्गोऽयमक्षरोक्तस्तु नित्यशः ॥ [ ५ ]
मात्रासंख्या विनिर्दिष्टो गणो मात्राविकल्पितः ।
मिश्रौ ग्लाविति विज्ञेयौ पृथक् लक्ष्यविभागतः७ ॥ [ ६ ]
८मात्रागणो गुरुश्चैव ९लघुनी चैव लक्षिते१० ।
आर्याणां तु११ चतुर्मात्रा प्रस्तारः परिकल्पितः ॥ [ ७ ]
( अर्थात् मात्राओं की गणना में उपयुक्त हैं । ) ये ही एक दूसरे को मिला कर
अधिकृत हो तो मिश्र हो जाते हैं । [ २ ]
प्रस्तार के उपाय की स्थिति इस प्रकार है कि प्रस्तार के समय आद्य गुरु
के नीचे लघु का विन्यास करे फिर उसके आगे गुरु रखे इसके नीचे लघु रख
कर आगे और पीछे गुरु रखे । इन अक्षरों तथा मात्राओं के प्रस्तार में प्रथम
१. एवं तु—क० । २. नष्टोद्दिष्टं तथैव च—क० । ३. समानोक्तं
तथैव च—क., समात्रोक्तस्तथैव च—क ( ड ) । ४. मातृका—क० ।
५. इमौ श्लोकौ न दृश्येते—क० पुस्तके ।
६. छन्दस्य—क० । ७. विभागशः—क० । ८. मात्रे द्वे गुरु विज्ञेयं
लघ्वेका तु प्रकीर्तिता—क ( भ० )। ९. लघुनीति च—क० ( प. ) ।
१०. विलक्षितैः—क० ( पं० ) । ११. स चतुमत्रि प्रस्तारे गण इष्यते—क० ।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १५ ४५१
भेद सर्व गुरु का और अवसानज अर्थात् अन्तिम भेद सर्वलघु का हो
जाता है। यही सभी छन्दों की अक्षरों से होने वाली प्रस्तार-विधि है
आशय यही कि प्रथम भेद सर्व गुरु का होगा तथा गुरु एवं लघु के
विन्यास का क्रम तब तक आगे करता चले जब तक सर्व लघु का पाद न बन
जाए। [ ३-५ ]
मात्रिक छन्दों में मात्राओं की संख्या के अनुसार गण का निर्देश रहता
है। अतः इसमें मात्राओं की कल्पना करके अलग-अलग लक्ष्यों के विभागों
से 'द्विकौ ग्लौ एवं मिश्रौ ग्लौ' सूत्र का उपयोग करे। क्योंकि मात्रा गण
एक गुरु या दो मात्रा और दो लघु या दो मात्राओं से लक्षित होता है।
आर्याओं में प्रस्तार चार मात्रा का होता है। [ ६-७ ]
१गीतकप्रभृतीनान्तु पञ्चमात्रो२ गणः स्मृतः ।
वैतालीयं पुरस्कृत्य षण्मात्राश्चास्तथैव च ॥ [ ८ ]
३त्र्यक्षरास्तु त्रिका ज्ञेया लघुगुर्वक्षरान्विताः४ ।
मात्रागणविभागस्तु गुरुलघ्वक्षराश्रयः ॥ [ ९ ]
५अन्त्याद् द्विगुणिताद् रूपाद् ६द्विद्विरेकं गुरोर्हरेत्७ ।
द्विगुणांश्च लघोः कृत्वा संख्यां पिण्डेन ८योजयेत् ॥ [ १० ]
आद्यं सर्वगुरु ज्ञेयं वृत्तन्तु समसंज्ञितम्९ ।
१०कोशे तु सर्वलध्वन्त्यं मिश्ररूपाणि सर्वतः ॥ [ ११ ]
वृत्तानां तु समानानां संख्यां संयोज्य तावतीम् ।
राशूनामर्धविषमां समासादभिनिर्दिशेत्११ ॥ [ १२ ]
गीति आदि में प्रस्तार पांच मात्राओं का होता है और वैतालीय आदि
छन्द में छः मात्राओं का होता है। लघु एवं गुरु अक्षरों से युक्त तीन-तीन
अक्षरों के वर्ग को 'त्रिक्' समझना चाहिये। [ यह त्रिकादि व्यवस्था छब्बीस
अक्षरों तक के पाद वाले वर्णिक छन्दों में रखी जाती है ] इसी प्रकार गुरु एवं
लघु अक्षरों के आधार पर मात्रिक छन्दों का ( भी ) गणविभाग होता
है। [ ८-६ ]
१. गीतिका—क ( भ० )। २. पञ्चमात्रस्तथेष्यते—क० । ३. त्र्यक्षरस्तु-
क ( न० )। ४. राश्रयाः—क ( न० ), । ५. आद्यात्—क ( भ० )।
६. ऊर्ध्व—क ( उ ), । ७. भवेत्—क० ( ड ), । ८. निर्दिशेत्—
क०। ९. संश्रितम्—क ( ङ ), । १०. कोशं—क० । ११. समासादपि
निर्दिशेत्—क ( भ० ), समासादिति निदिशेत्—क ( ड )।