नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 546, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४३५
१७१-१७६. प्रकृति संस्थिताम्-यह सामान्य या सहज स्थिति में कहा
गया है किन्तु प्राथम्य या प्राधान्यतः जब कोई गति हो तो उसे भी सम्पन्न
किया जाए इसे 'कृत्वावहित्थम्', इत्यादि से भी कहा गया है। बाहर की
ओर (अर्थात्) कनिष्ठिका अंगुलि के क्षेत्र में वामभुज को लताख्य दशा
में रखे।
१७७-१७८. 'यो विधिः' इत्यादि। उसके पश्चात् 'वामवेध' को
सम्पादित करे अर्थात् एडी के समीप सूची-पाद का निपातन हो। पूर्व में रस,
प्रकृति, काल तथा देश की अपेक्षा से जो मनुष्यों की गति बतलाई गयी हैं
वे सभी गति विलासादि से युक्त रख कर वैसे ही स्त्री पात्रों में भी संयोजित
करना इष्ट है। इस सन्दर्भ में यह भी बतलाया जा चुका है कि स्त्रियों का
पादपात चारकलाओं से अधिक परिमाण का नहीं रखना चाहिए। षट् या
अष्टकल से यह भी यहाँ सूचित किया गया है कि इससे अधिक परिमाण
पुरुषों के लिये भी न रखा जाए क्योंकि जब षट्कलाओं का ही निषेध किया
गया है तो फिर अष्ट कलाओं की तो संगति ही नहीं बैठेगी।
१७६-१८१. यहाँ स्थानीया पद से मध्यम अवस्था वाली युवति का
संकेत है अतः प्रकृत में मध्यम प्रकृति को उद्देश्य करके ही यह विधि दिखलायी
है। आद्य अर्थात् दक्षिण पाद। इसे परिवाहित भी नहीं किया जाए।
१८२-१८३. विभाग के अनुसार अधमपात्रों की गति में प्रेष्याओं की
गति उद्भ्रान्तगामिनी अर्थात् मद विकार से युक्त रखनी चाहिए। 'आविद्ध-
भुज-विक्रमा' अर्थात् बाहुओं का क्रम वर्तना बहुल रहना चाहिए।
१८४-१८६. 'नार्या अर्धम्' नारी के आधे इस प्रकार भाग की विवक्षा में
यहां 'अर्ध नपुंसकम्' से समास हुआ है। नारी की प्रकृति का आधा भाग ही
यहाँ अनुकृत रहने से इसे (नपुंसक को) तृतीया प्रकृति भी कहा जाता है।
तब पुरुषों की गति में उदात्तत्व तथा स्त्रियों की गति में ललितत्व या सौन्दर्य
रहेगा। इनमें गति का परिमाण चार ताल तथा चार कलाएँ होता है।
अनुत्तम स्त्रियों की गति का मान द्विताल तथा द्विकला है। इससे भी आधा
प्रमाण कर्म-कर भृत्यों और अधम पुरुषों का अर्थात् एक ताल और एक कला
प्रमाण रहता है। इस प्रकार अनुत्तम पुरुषादि पात्रों की गति को दिखला कर
मध्यम तथा उत्तम पुरुषों की गति एवं चेष्टा की अनुगामी ही उत्तम, मध्यम
एवं अधम स्त्रीपात्रों की तथा भृत्यों की गति में चेष्टाएँ रखी जाए इस तथा
को 'उत्तम' पद से संकेतित किया गया है।