नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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२२१-२२७. अब आगे शयन के विभाग पूर्वक सन्निवेश को दिखलाते
हैं—‘आकुञ्चित’ इत्यादि से। वह स्थिति जो अपने शरीर के तिरछे रखने
पर रहे। पूर्वकाय अर्थात् शरीर के ऊपरी भाग के पास किसी इष्ट जन के
बैठने पर बाहुओं के फैलाने में ‘विक्षेप’ होता है तथा शयन पर अन्य जन के
बैठ जाने पर भी ‘विक्षेप’ होता है। शरीर का तिरछा रखना ही ‘आकुञ्चित’
है। इसी प्रकार आगे सभी स्थितियों का स्पष्ट विवरण है।
२२८. अर्थवशेन—व्यवहार के आधार पर तदनुरूप। इस अध्याय के
उपसंहार के साथ अगले अध्याय के प्रारम्भ की संगति के लिये कहते हैं—
‘अतः परम्’ इत्यादि से। रंग में घूमने का निरूपण गत्यध्याय में किया था
उसका कक्ष्याविशेष के विभाग में विशेष उपयोग को अगले अध्याय में कहेंगे।
इति शिवम्।