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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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४४४ नाट्यशास्त्र
४३-४५. पूर्वदेश की सीमा होने से दक्षिण में उडू है तथा समुद्र के
निकट उत्तर में मागधी है अतः इन देशों के मध्य के प्रदेश में 'उड्रमागधी'
है। यहाँ इसीलिये अंग, बंग, एवं कलिंगों में उभयोपजीविता के आशय से
उन्हें दो वृत्तियों के मध्य में परिगमन किया गया ।
४६. यहाँ 'पुराणे' शब्द के द्वारा यह विषय आगम सिद्ध है यह भी
संकेत दिया गया है ।
४७-४६. यहाँ अल्पगीतार्थ कथन से लेशतः कैशिकी की सहमति मुनि
ने दिखलायी है ।
५०-५२. दक्षिण तथा उत्तर को छोड़ कर परिक्रमण नहीं किया जाता
है। इसीलिये निकट की दो वृत्तियों को मिला कर प्रयोग करने का विधान
बतलाया गया है । इस प्रयोग के समय दाक्षिणात्य उत्तरद्वार से प्रवेश कर
पश्चिम दिशा में परिक्रमण करे और घूम कर उसी दिशा में आत्मनिवेदन
करे । जैसा कि पूर्व में कहा भी है—'दक्षिणाभिमुख हो आत्मनिवेदन करें'
(ना० शा० १४।१०) । निष्क्रमण में भी उत्तर से पूर्व को तथा फिर दक्षिण
तथा पश्चिम की ओर जाते हुए उत्तर दिशा से निष्क्रमण किया जाय । इसी
प्रकार सात्वती आदि से विपरीत क्रम पाञ्चाली में रहता है। दक्षिण द्वार
से किया जाने वाला प्रवेश भी आभ्यन्तर कक्ष्या में स्थित पात्र के निकट ही
होता है। यही प्रक्रिया अपसव्य प्रवेश में भी होती है ।
५३. अन्य विशेषताएँ भी बतलाते हैं—'एकीभूता' इत्यादि से । देश,
काल एवं स्थितिवश पात्रों की समीक्षा से जो वैचित्र्यकृत प्राधान्य दिखे
उसी के अनुसार नियम में सांकर्य भी किया जा सकता है। इसी कारण मूल
में 'एकीभूताः' कहा गया । अर्थात् प्रधान का अनुगमन सर्वत्र किया जाए ।
५४. इसी प्रकार प्रयोक्ता का परिक्रम दिखला कर अब प्रवृत्तियों का
उपयोग बतलाते हैं—'येषु' इत्यादि से । जिन देशों में जो प्रवृत्ति हो उसी
के अनुरूप रूपकों में वृत्तियाँ भी रहे । अर्थात् उसी देश के नायक के प्राधान्य
द्वारा वे ही रूपक कवि के द्वारा निबन्धनीय एवं अभिनेता के द्वारा प्रयोज्य
भी होना चाहिए ।
५८-५६. आविद्धाङ्गहारं = आविद्ध अर्थात् उत्कट अंगों का हरण जहाँ
हो वह । आहव = संग्राम, जहाँ वीर एक दूसरे को चुनौती देते हों ( आह्व-
यन्ते इति आहवः=व्युत्पत्ति के अनुसार ) । मणि, मन्त्र या औषधि के प्रयोग
से रूप का परिवर्तन 'माया' ( कहलाता ) है । सादृश्य के आधार पर
हस्तलाघव द्वारा रूपान्तरण 'इन्द्रजाल' होता है । पुस्त = लकड़ी या मिट्टी

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