नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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१८७-१८८. जहाँ उत्तमादि की स्थिति उद्भिन्न नहीं हुई ऐसे पात्रों को
दिखलाकर विवरण का सर्वग्राहत्व दिखलाने की भावना से—बालानाम्,
इत्यादि से 'बालकों' की गति बतलाई गयी है।
१८६-१६१. 'तद्भावगमनादिति'—जो पुरुष जिस रूप को ग्रहण करता
है उसकी वैसी ही गति (स्वभाव के अनुरूप) रखी जाती है। परन्तु विपर्यय
विशिष्ट-कारण या स्थितिवश होता है—जैसे व्याजादि से। ब्याज = छल।
किसी उद्देश को सिद्ध करने के लिये छल का प्रयोग किया जाता है, इसे भ्रम
उत्पन्न करने के लिये, क्रीड़ा में तथा वञ्चना के लिये प्रयुक्त करते हैं। अपिच
पद से स्त्री और पुरुष का नपुंसक से तथा नपुंसक का स्त्री या पुरुष से
विपर्यय हो जाता है यह दिखलाया गया है। इसी विपर्यय दशा में गति के
विपर्यय में सञ्चारी तथा सात्विक भावों के तथा उपाङ्गादि अभिनयों में होने
वाले विपर्यय भी--'धैर्यौदार्येण' इत्यादि से बतलाये गये हैं। यहां सामान्य
अभिनय में उक्त धैर्य एवं औदार्य का ग्रहण समझना चाहिए तथा इनसे अन्य
भावों का (भी उपलक्षण है यह भी। यथा 'बुध्यापद से-स्थायी भाव का,
सत्व से सात्विक भाव का, कर्म से स्थानकादि विषयक अनुभावों का, वेष से
आहार्य (वेष भूषा के) प्रकार का, वाक्य से संस्कृतादि भाषाओं के वाचिक
प्रकार का चेष्टित से त्रिपताक आदि शारीर का उपलक्षण से ग्रहण समझना
चाहिए।
१६६-१६८. जैसे स्थानक गमन आगे पीछे होता है वैसे ही उपवेशनात्मा
आसन में भी पूर्व-पश्चाद्-भाविता रहने से उसे भी बतलाया जा रहा है—
'अथासन' इत्यादि से। तथैव--अर्थात् जैसे गति में पूर्व पश्चाद् भाव है वैसे
ही शयन और तदाश्रय, आसन आदि में भी। विष्कम्भ अर्थात् वैशाख-स्थानक
के उचित प्रसार से अञ्चित अर्थात् सुन्दर पाद, अतः यहाँ अञ्चितपाद का
लक्षणानुसारी स्वरूप इष्ट नहीं है। स्वस्थ पुरुष के आसन पर बैठने पर त्रिक
उन्नत रहती ही है। यहाँ दोनों हाथ कटि तथा ऊरू पर 'कर्कटमुद्रा में रखे
जाएँ।
१६६-२०० संप्रणष्ट विशेषण केवल इन्द्रियमात्र से सम्बद्ध है, उसे मन के
साथ लगा कर 'आकुल' अर्थ करते हैं। शोक की दशा में 'आकुल-मन' से बैठा
जाए। अपायाश्रयाश्रितः—अपने आश्रित का या किसी वस्तु का सहारा लेकर
रहना। उपवेशयेत्—यहाँ स्वार्थ में णिच् है। अतः कर्ता मात्र यहाँ विवक्षित
है। अन्य आचार्य कहते हैं कि जब वह इस स्थिति मे अपने बाहुओं को फैला
दे तो उसे विश्राम हेतु बिठवा दे।