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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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४४८ नाट्यशास्त्र
४. इस वाचिक के अंग ( विभिन्न ) शास्त्रों में प्रसिद्ध नामाख्यातादि हैं
जिनका अगली कारिका से शिक्षार्थ विवरण आरम्भ करते हैं—'नामाख्या-
तादि' । यह शास्त्र योग अर्थों के द्वारा तथा शब्दरूपसौन्दर्य से होता है,
जिसके विभाग युक्त ( अंग ) हैं ये ही नामादि । नाम—जैसे 'मदनरिपु'
शब्द यह संज्ञावाचक है किन्तु शृंगार के प्रसंग में इसका प्रयोग वर्ज्य है ।
क्योंकि जो मदन का रिपु हो शृङ्गारी कैसे होगा । इस प्रकार व्यावहारिक
दृष्टि से यहाँ अनौचित्य है। नाम की तरह आख्यात-( क्रिया ) का भी
वैचित्र्याधान की स्थिति में ही प्रयोग इष्ट है। यथा कुमारसम्भव में—
'स्मरसि स्मर मेखलागुणैरुत गोत्रस्खलितेषु बन्धनम्' (कु० ४।८) ।
यहाँ 'स्मरसि' पद वैचित्र्य का आधायक है। उपसर्ग भी प्रकृत अर्थ
से योग रखे तो प्रयोज्य होता है अन्यथा होने पर नहीं। यथा—'अस्त्रैस्ता-
वन्मुहुरुपचितैर्दृष्टिरालुप्यते मे' ( मेघदूत ३०।४२ ) यहाँ 'उपचितैः' में 'उप'
उपसर्ग के कारण अर्थाधिक्य द्योतित होता है। इसी प्रकार उपसर्ग पद से ही
कर्मप्रवचनीय का भी उपलक्षण समझना चाहिए। निपात का उदाहरण—
'ह हा हा देवि धीरा भव' इत्यादि पद्य जहाँ 'ह हा' हा' से तीव्र खेद की
अभिव्यक्ति को साधा गया है। तद्धित का उदाहरण है रघुवंश का पद्य
'शात्रवञ्च पपुर्यशः' (४।४२) यहाँ अण् प्रत्यय से ग्रासी कृत या गुणीकृत
यश को ग्रहण करना व्यक्त किया गया है। समास का उदाहरण है—
'मध्ये गङ्गायमुनम् अनु' यहाँ समास के कारण एकार्थीभावगत वैशिष्ट
दिखलाया गया है। सन्धि का उदाहरण है—'भवतोया' यहाँ भवतो + या
सन्धि है जिसकी एकपद सी प्रतीति होती है। विभक्ति सुप् तथा तिङ् हैं
जिनसे कारक शक्ति और लिङ्ग आदि का उपग्रह उपलक्षित होता है।
यथा—'पाण्डिम्नि मग्नं वपुः' (विद्ध० भ० २।२१) इसमें शरीर को
मज्जनक्रिया का कर्त्ता बतलाया है तथा उस कर्तृत्व के अधीन शरीर
पाण्डुत्व का आधार हो गया है यह द्योतन अतीव रंजनकारी है। क्रिया का
उदाहरण है—'ग्रस्तं कुलान्तं जगत्' यहाँ ग्रस्तं पद का उपन्यास है न कि भुक्तं
का । यद्यपि ग्रसति पद से भक्षण मात्र परिभाषित किया है तथापि यह
ग्रास्तातिशय है कुलान्त के विषय में। इस प्रकार कविता के वाचक शब्द को—
जो काव्यरूप होते हैं—विभक्त करके यहाँ इस प्रकार दिखलाया गया है।
३७. छन्द नियत अक्षरों वाला होता है जिसमें अक्षरों (या मात्राओं)
का नियम रहता है (अर्थात् गुरु, लघु आदि का नियम होता हैं) इसके