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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १५ ४४९
विपरीत चूर्णपद होता है जहाँ अक्षर एवं संख्या का नियम नहीं हो । अर्थ की
अर्थात् शृंगार या वीरादि उनकी अपेक्षा से जहाँ अक्षर निबद्ध हों, यह
पाठ्य होता है, अतः गद्य कहलाता है ।
३८. यति = विराम तथा छेद = यति के द्वारा किये गये पद विभाग
इनसे युक्त । प्रमाणनियतात्मकम्-पाद की संख्या के प्रमाण के अनुसार
जिसका स्वरूप नियत = निबद्ध है ऐसा पद 'निबद्धपद' कहलाता है ।
३६. छन्द का लक्षण आरम्भ करने के लिये उसके स्वरूप को बतलाते
हैं--'एवम्' इत्यादि से । वर्ण गुरुत्व से एवं लघुत्व से युक्त विशिष्ट वर्णरूप
जो चार पादों से युक्त हो-पद्य है । यह पद्य पादों से निर्मित होता है । गद्य
तथा पद्य दोनों ही निगदनीय अर्थात् उच्चारणीय होते हैं तथापि गद्य ही इस
नाम से व्यवहार में प्रचलित है ।
४३-४६. एक अक्षर से आरम्भ कर २६ अक्षरों तक के पाद वाले
उक्ता से उत्कृति तक 'छन्द होते हैं । जिनके चारों पाद तुल्य लक्षण वाले हो वे
'सम' कहलाते हैं तथा जो प्रथम एवं तृतीय या द्वितीय एवं चतुर्थ पादो में
सम हों वे 'अर्धसम' तथा चारों पादों में अतुल्य लक्षण वाले पाद हों तो उन्हे
'विषम' छन्द कहते हैं ।
५०. ये छन्द हैं तथा इनके ये आगे भेद हैं । प्रश्न-इनके ये भेद कैसे हो
जाते हैं ? उत्तर-प्रस्तार में जो योग-युक्ति है उससे भेद बनते हैं जिसे आगे
बतलाया जाएगा ।
५१. यद्यपि एकाक्षर से आरम्भ होने वाले पादों के छन्द होते हैं किन्तु
भरतमुनि ने उन्हें छोड़ कर छः अक्षरों वाले पाद छन्दः से ही विवरण आरम्भ
किया है तथा प्रस्तरभेद भी दिये हैं । इसका कारण है काव्यों में तथा शास्त्र
ग्रन्थों में इन्हीं छन्दों की प्रयोग बहुलता तथा प्रयोग योग्यता रहना । दूसरा
कारण है इनके लक्ष्य में प्रयोग या उदाहरण की विरलता, फिर भी शास्त्रज्ञान
की पूर्णता के लिये निरुपयोगी भी इन प्रकारों का अध्ययन वेद की तरह किया
जाना उचित है ।
५२. 'वृत्तानि' इत्यादि के द्वारा भरत मुनि संख्या आदि को स्वकण्ठ से
पढ़ते है ।
● नाट्यशास्त्र में पद्य १०१ के पश्चात् प्राप्त अधिक एवं प्रक्षिप्त पद्यों को
मूल तथा हिन्दी व्याख्या सहित यहाँ दिया जा रहा है । सौकर्य के लिये इनमें
क्रम संख्या लगाई गयी है जो अन्य संस्करणों में भी ( मिलती ) हैं ।
२६ ना० शा० द्वि०