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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 545, कुल 668 में से

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पृष्ठ 545

प्रस्तुत करना चाहिए परन्तु राजा आदि की अनुपस्थिति में इसका अश्लील
भाषण करना अनुचित है।
१४३-१४६. इस प्रकार गति के उपयुक्त तथ्य को दिखला कर अब
उसकी—'स्वभावजायाम्' इत्यादि से गति बतलाते हैं। इसमें विलम्बित
लय, ताल में लघु, गुरु तथा प्लुत सभी रखे जाते हैं, जब कि अन्यत्र द्रुतलय
के नहीं होने से तथा प्लुत के कालमान के प्राचुर्य से शोकादि के प्रसंग में भी
स्वभावजा गति होती है। गति में गर्वात्मक विकृति भी अलाभलाभ पद से
दिखलाई गयी है। भुक्त पद से उपयोग में लिये गये वस्त्र, भूषा आदि को
संकेतित किया गया है। भयादि में परितः परिक्रम होता है।
१४८-१५१. अपने संभाषण व्यवहार में 'शकार' के अधिक प्रयोग करने
वाला अभिनेता 'शकार' कहलाता है या फिर शकार से उपलक्षित शकादि
जनपद का निवासी भी 'शकार' है। अन्य आचार्य शकार उसे मानते हैं
जिसे उत्तम पद मिलने पर भी उसकी आशय या भावना सदा हीन बनी
रहे। इस विषय में अध्वरहार का एक प्रसिद्ध कथन इस प्रकार है :—
प्राकृतेऽपि शशकारस्य विभूतिर्न प्रसिद्ध्यते।
तद्विभूतिरपभ्रंशे तापस्येव प्रकाशिता॥
[ शकार की विभूति प्राकृत भाषाओं में प्रसिद्धि की हेतु या उसका
आधार नहीं होती परन्तु शकार की यह बहुलता अपभ्रंश भाषा में ताप की
तरह ( ही ) प्रकाशित होती है। तात्पर्य यह कि अपभ्रष्ट पात्र होने से
शकार अपभ्रंश भाषा के ही उपयुक्त होता है।]
इस प्रकार जो उच्च श्रेणी के व्यक्तियों के सम्पर्क एवं ( धन )
विद्या एवं बुद्धि शून्य पुरुष हो, वही शकार होता है। यह अपने वस्त्र,
आभरण के स्पर्श एवं आलोकन में गर्व का अनुभव करता है तथा आर्यजाति
का नहीं होता। म्लेच्छों की जातियों का वर्णन स्वतन्त्र रूप में आगे किया ही
गया है।
१५३. रीछ तथा वानर जाति में जाम्बवान्, सुग्रीव, अङ्गद एवं हनुमान
आदि की जो गति हो उसे स्वजाति के अनुसार रखना चाहिए।
'प्रभविष्णुना'—पद से नरसिंह आदि अवतार के प्राधान्य के अनुरूप गति को
सूचित किया गया है। 'तस्यैव' पद से आलीढ़ स्थान के अनुगत शरीर के
अवयवों द्वारा बायी ओर से गमन किया जाना चाहिए।