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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 553, कुल 668 में से

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पृष्ठ 553

४४२ नाट्यशास्त्र
गया है। 'कक्ष्याविभागश्च' में उपात्त 'च' को 'इव' अर्थ में प्रयुक्त समझना
चाहिए। जम्बूद्वीप की तरह दिव्य पर्वतों को भी कक्ष्याविभाग में लिया
जाकर दिव्यपात्रों की गति स्थानविशेष से उपलक्षित करनी होती है।
'परिच्छदविशेष' पाठके अनुसार उन देवताओं के विशिष्ट उपकरणों को चारों
ओर नहीं रखा जाता है। 'परिच्छेद' पाठ को यहाँ मूल में लिया गया है।
तदनुसार अर्थ है—दूरस्थ पदार्थ को जान लेना और व्यवधान में स्थित पदार्थ
को जान लेने जैसे कार्य (यहाँ) नहीं दिखलाने चाहिए। प्रश्न—यदि देवगण
के ऐसे रूप को न दिखलाये तो फिर कैसा रूप रखा जाए? उत्तर—इनमें भी
मनुष्यों के भाव ही दिखलाने अभीष्ट हैं जिन्हें मनुष्यों की तरह दिखलाना
चाहिए। अंशावतार श्री—रामादि नायकों का जो उत्कृष्ट एवं अतिशय
विशिष्ट चरित है वह भी मानुषोचित ही है। इसी प्रकार जिन २ अवतारों
में दिव्यभाव की स्थिति हो उनके भी चरित मनुष्यवत् ही दिखाना चाहिए।
ऐसी स्थिति में देवगण के पलक न गिराने जैसे शास्त्र वर्णित रूप को यहाँ
नहीं दिखलाना चाहिए।
इसका अन्य कारण यह है कि इस लोक में भाव, संचारी और स्थायी
सभी दृष्टि के द्वारा ही प्रस्तुत किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त सूचा-अभिनय
भी भाव के योग से ही प्रस्फुटित होता है। इसलिये इन सभी कारणों से
देवपात्रों की ( भी ) उनकी अपनी मूल प्रकृति मंच पर प्रस्तुत ( हीं की जाए
किन्तु मनुष्यवत् ही उनकी चेष्टाएँ रखी जाए।
३६. प्रवृत्तियों का उद्देश्यक्रम से चतुर्विधत्व दिखलाने के लिये—
'चतुर्विधा' इत्यादि से स्वरूपादि विवरण आरम्भ करते हैं।
प्रश्न--इन्हें क्यो प्रवृत्ति कहते हैं, इनके मानने में हेतु क्या है, किस
आधार पर ये प्रवृत्तियाँ है तथा इन प्रवृत्तियों का किससे उद्भव हुआ है।
ये चार प्रश्न यहाँ बनते हैं जिनका आचार्य ने विवेचन किया है। इनमें प्रथम
प्रवृत्ति के विषय को कहा गया कि वह कैसे हुई। देशविशेष के वेष, भाषा,
आचार एवं वार्ता के वैचित्र्य की प्रसिद्धि को 'प्रवृत्ति' कहते हैं। इसमें
ऐसी योजना है—जिन २ देशों में जो वेषभूषा है, जो भाषाप्रवाह है, जो
लौकिक एवं शास्त्रीय रूप में प्रचलित आचार है तथा जो कृषि-पालन एवं
वाणिज्यादि जीविका रूप वार्ता है उनको प्रख्यापन करने या पृथिवी-मण्डल पर
स्थित विद्या की प्रसिद्धि की आधायिका भी 'प्रवृत्ति' कहलाती है। 'प्रवृत्ति'