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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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४४० नाट्यशास्त्र
सरिता, आश्रम आदि को साक्षात् बोधक पदों से नहीं कहा हो तो वे 'वा'
शब्द की वीप्सा से द्योतित हो जाते हैं ।
८. इतिवृत्त या प्रस्तुत रूपकादि में विद्यमान या प्राप्त वृत्तान्त के
मध्यवर्ती प्रदेश ही रङ्गपीठ पर कक्ष्या में विभाग पूर्वक दिखलाये जाए—इसी
भाव से रंगपीठ के विशिष्ट देश को—'बाह्यं वा' इत्यादि से बतलाते हैं ।
रङ्गपीठ के अभिनेय-स्थल पर देशादि की कल्पना के साथ प्रदेश के दूर या
सामीप्य के आधार पर या अभिनय के अल्पत्व एवं आधिक्य के कारण
भिन्नता को लिये हुए परिक्रम से ही (दूर आदि भेदों की) कल्पना की
जाए ।
६. ये बाह्य आदि भेद—'पूर्वं प्रविष्टा' इत्यादि से निरूपित करते हैं ।
यहाँ पूर्व पद का अर्थ दो तरह से होता है एक पूर्व अर्थात् प्रधानभूत । अतः
प्रधान होने से जिनका प्रवेश पहिले हुआ था, वे आभ्यन्तर तथा उनसे
अधिष्ठित देश विशेष को आभ्यन्तरकक्ष्या कहते हैं । इसी प्रकार पीछे प्रवेश
करने वाला बाह्य तथा उसके द्वारा अधिष्ठित बाह्यकक्ष्या-स्थान विशेष के
द्वारा पूर्वप्रविष्ट का उपसर्पण या अनुगमन करने वाले का स्थानविशेष
मध्यमकक्ष्या कहलाता है । पूर्व प्रविष्ट भी यदि अप्रधान (पात्र) है तो
प्रधान के प्रवेश के बाद भी वह अपनी कक्ष्या के अन्त में ही स्थित रहता है ।
यही कल्पना यहाँ की गयी है ।
१०. पात्रों के रङ्गपीठ पर प्रवेश के साथ एकत्र हो जाने या मिल जाने
पर उनके द्वारा करने योग्य (सम्पाद्य) कार्य दिखलाने के लिये—'तेषान्तु'
इत्यादि से विधान बतलाते हैं । तेषां—अर्थात् जो पूर्व में प्रविष्ट हैं उन । यहाँ
'तु' शब्द से पूर्वप्रविष्ट पात्र तथा उनसे बाद में मिल जाने वाले पात्रों के
क्रिया-कलाप का 'बाह्य' कक्ष्य में विधान सूचित किया गया है । इसी प्रकार
'अथ' शब्द से पूर्वप्रविष्ट पात्रों का दक्षिणादि से क्रम है तो बाद में प्रविष्ट
पात्रों का उसके (सामने होने से) विपरीत क्रम स्पष्ट (ही) समझा जा
सकता है, (यहाँ यही क्रम 'अथ' पद से दिखलाया है) पूर्वप्रविष्ट पात्रों की
प्रवृत्ति के लिये ही दक्षिणाभिमुख आदि क्रम विहित है (यही आशय है) ।
११. रंगपीठ पर कौन (सा प्रदेश) पूर्व दिशा हैं?—उत्तर—जिसकी
अपेक्षा से या जिस ओर आतोद्यादि वाद्ययन्त्र रखे हों तथा वादक बैठे हों वही
पूर्वदिशा होती है । प्रश्न—केवल भाण्ड के मुख को ही प्रमाण क्यों माने ?
उत्तर—इसी लिये 'द्वार' को भी कहा गया है कि द्वार को प्रमाण मान कर ।
क्योंकि वह विधानानुसार ही निर्मित होता है । इसी प्रकार नेपथ्य पद के