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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 548

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४३७
२०१-२०२. अंगो के पिण्डीकृतत्व में जानुओं के विश्लेष से घुटनों और
शरीर के ऊपरी भाग का मेल हो गया होता है तथा उसे विघटित कर देने
पर घुटने अलग होकर ऊर्ध्वकाय टेड़ा हो जाएगा । ऐसी स्थिति उत्कटिक
स्थान कहलाती है। इसमें घुटनों का विरलत्व और स्फिक् का भूमि से
स्पर्श रहता है। पूर्व पिण्डितांग दशा से यह भिन्नता ही यहाँ वैलक्षण्य
दिखाता है। निवाप = पितरों का तर्पण । सन्ध्या शब्द से सन्ध्या के योग्य
जप तथा ध्यान का ग्रहण है।
२०३-२०६. विष्कम्भितम्—एक जानु को भूमि पर फैलाकर दूसरे को
यथास्थित रखना । होमादि के करने में मन्त्रादि का उच्चारण भी किया
जाए। शोके च तथा नीचानां—का प्रकृत में सभी स्थान पर सम्बन्ध समझना
चाहिए ।
२०६-२१४. आसन सन्निवेश के प्रसंग में सभी के लिये आसन विधान
बतलाया जाए अतः इसे—'तथासन' इत्यादि से दिखलाते हैं। बाह्य-सभी
व्यक्तियों के उपयुक्त तथा आभ्यन्तर—राजा के योग्य इनका विधान ।
मुण्डासन—गोलाकार चतुरतापूर्ण रचना का आसन । मसूरक—आराम से
बैठने लायक आसन । काष्ठासन—पट्टासन या लकड़ी का पीठक (या स्टूल
जैसी कुरसी) । एवं पद का अभिप्राय है राजा की सन्निधि में। यह
आभ्यन्तर विधि है । अन्यकालों में इच्छानुसार आसन रखे जा सकते हैं इसी
तथ्य को 'स्वगृहवार्तायाम्' इत्यादि से कहा है। तथा पद से सेनापति का
अमात्य के घर जाना जैसी व्यक्तिगत सम्बन्ध की स्थिति दर्शायी गयी है।
२१५-२२०. अपेक्षित नियमादि से युक्त मुनिजन के रहने के कारण
उनके नियत आसन पर ही बैठने का विधान है जो उनके व्रतादि को ध्यान में
रखकर रखा जाता है। स्थानीय अर्थात् आश्रमादि (स्थान) में निवास
करने वाले वृद्ध या पूज्यजन । आसनसत्कार—आसन पर बैठने का निवेदन
कार्य । आसन के विषय में, विभाग की अन्य बात भी—'समे' इत्यादि कारि०
से कही है। सम—जो जाति एवं विद्या में तुल्यता रखता हो । आसन चार
प्रकार के होते हैं—सम, मध्य, उच्च या अतिरिक्त तथा भूमि । मध्यम—
कुछ कम या आसन के प्रमाण में थोड़ा न्यून । हीन—अपनी अपेक्षा से
अधम । भूम्यासन—यहाँ बैठो कह कर निर्देश्य भूमि को बैठने हेतु दिखलाना
यह हीन या अधम जैसे पात्रों के लिये उपवेशन स्थान है।