नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १४ ४४५
आदि से निर्मित आकृति या मूर्तियाँ। आविद्ध = स्त्रियों के कर्म तथा रूपों
को दिखलाने वाला होता है जिसे आगे बतलाएँगे।
६०. 'डिमादि' चार रूपक उद्धत माने गये हैं ये भिन्न-भिन्न तो है
ही; किन्तु इनका वर्ग बना कर विभाजन कर दिया गया है। इसी प्रकार शेष
नाटकादि छः सुकुमार समझना चाहिए। नाट्य के अन्तरंग एवं उपकारक
कक्ष्याओं के आधार पर उद्धत तथा सुकुमार नाट्य-प्रयोग होते हैं।
६८. देश का प्रवृत्ति के क्रम से विवरण देकर अब उसी को आङ्गिक
अभिनय के अंग रूप में दिखलाने के उद्देश्य से 'धर्मी' का विवरण देना
आवश्यक मान कर यहीं मुनि ने 'धर्मी' का भी निरूपण किया। यह धर्मी दो
प्रकार का होता है (जिसका ना० शा० षष्ठ अध्याय ६।१० उद्देश्यक्रम में
उल्लेख हैं) लोक विषयक एवं नाट्यविषयक होने से द्विविध धर्मी हो जाता
है। यह धर्मी नाट्यप्रयोग की भित्ति या आधार होता है।
यद्यपि लौकिक धर्म के अतिरिक्त नाट्य में धर्म नही होता। तथापि
वह लौकिक प्रक्रिया में रञ्जनाधिक्य की प्रमुखता के आधार पर प्रयुक्त होने
पर प्रयोग-व्यापारगत विचित्रता को लाता है इसी कारण ये लोक नाट्यधर्मी
दोनों प्रभेद माने भी जाते हैं।
६६-७०. जो जिसका स्वाभाविक भाव है—स्थायी या संचारी उनसे
युक्त। स्त्री तथा पुरुष नाना हैं फिर भी जब (भूमिका) स्त्री प्रयोज्य हो
तो उसकी प्रयोजिका स्त्री मानी जाएगी और पुरुषों में पुरुष। इस प्रकार
का अभ्यास एवं चेष्टित (काय व्यापार) जहाँ हो उसे 'लोकधर्मी' कहेंगे
क्योंकि उसमें लोक के धर्मों का व्यपदेश है। लोकवार्ता = लोकप्रसिद्धि।
इसमें जो क्रिया (या) व्यवहार है उससे युक्त जो नाट्य है वह भी 'लोक-
धर्मी। धर्म तथा धर्मवान् में अभेदोपचार (भी) होता है। काव्य के
एवं नाट्यप्रयोग के भाग का लोकधर्म पर आश्रय लेना या आधारितरूप
'लोकधर्मी' समझना चाहिए जिसमें वैचित्र्य का योग या उद्भावना होती हो।
७१-७२. अब नाट्यधर्मी का क्रमप्राप्त विवरण देते हैं 'अतिवाक्य'
इत्यादि से। अतिवाक्य-क्रियोपेतम् = इसमें प्रयुक्त 'क्रिया' शब्द का अर्थ है
कि इतिहास की यथावृत्त घटना का अतिक्रमण कर जो कथावस्तु के उपयुक्त
इतिवृत्त की कल्पना की गयी है वही यहाँ 'क्रिया' है। सत्व = स्वभाव,
भाव = चित्तवृत्ति। इनका अतिक्रमण करके जो कवि-कल्पित चित्तवृत्तियाँ।
जैसे स्वभाव का अतिक्रमण कर महारानी द्वारा संस्कृत में भाषण करना। यह