नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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१एतेषां छन्दसां भूयः प्रस्तारविधिसंश्रयम् ।
लक्षणं सम्प्रवक्ष्यामि २नष्टमुद्दिष्टमेव च ॥ [ १ ]
प्रस्तारोऽक्षरनिर्दिष्टो मात्रोक्तश्च ३तथैवहि ।
द्विकौ ग्लाविति वर्णोक्तौ मिश्रौ चेत्यपि ४मात्रिकौ ॥ [ २ ]
५गुरोरधस्तादाद्यस्य प्रस्तारे लघु विन्यसेत् ।
अग्रतस्तु सम्प्रदेया गुरुवः पृष्ठतस्तथा ॥ [ ३ ]
अब मैं इन्हीं छन्दों की प्रस्तारविधि का अनुसरण कर नष्ट और उद्दिष्ट
के लक्षणों को बतलाता हूँ । [ १ ]
प्रस्तार दो प्रकार का ( से ) होता है ( एक ) अक्षरों के निर्देश से होने
वाला ( वर्णिक प्रस्तार ) तथा ( दो ) मात्राओं से उक्त ( या मात्रिक
प्रस्तार ) । इसका उदाहरण है-वर्णों की संख्या आदि के नियम से जो द्वित्व
संख्या के परिमाण वाले ( द्विकौ ) गुरु तथा लघु ( ग्लौ ) हैं वे मात्रिक हैं
प्रथमं गुरुभिर्वर्णैर्लघुभिरत्तवसानजम् ।
वृत्तन्तु सर्वच्छन्दस्सु६ प्रस्तारविधिरेव तु ॥ [ ४ ]
गुर्वधस्ताल्लघु न्यस्य तथा द्विद्वि यथोदितम् ।
न्यस्येत् प्रस्तारमार्गोऽयमक्षरोक्तस्तु नित्यशः ॥ [ ५ ]
मात्रासंख्या विनिर्दिष्टो गणो मात्राविकल्पितः ।
मिश्रौ ग्लाविति विज्ञेयौ पृथक् लक्ष्यविभागतः७ ॥ [ ६ ]
८मात्रागणो गुरुश्चैव ९लघुनी चैव लक्षिते१० ।
आर्याणां तु११ चतुर्मात्रा प्रस्तारः परिकल्पितः ॥ [ ७ ]
( अर्थात् मात्राओं की गणना में उपयुक्त हैं । ) ये ही एक दूसरे को मिला कर
अधिकृत हो तो मिश्र हो जाते हैं । [ २ ]
प्रस्तार के उपाय की स्थिति इस प्रकार है कि प्रस्तार के समय आद्य गुरु
के नीचे लघु का विन्यास करे फिर उसके आगे गुरु रखे इसके नीचे लघु रख
कर आगे और पीछे गुरु रखे । इन अक्षरों तथा मात्राओं के प्रस्तार में प्रथम
१. एवं तु—क० । २. नष्टोद्दिष्टं तथैव च—क० । ३. समानोक्तं
तथैव च—क., समात्रोक्तस्तथैव च—क ( ड ) । ४. मातृका—क० ।
५. इमौ श्लोकौ न दृश्येते—क० पुस्तके ।
६. छन्दस्य—क० । ७. विभागशः—क० । ८. मात्रे द्वे गुरु विज्ञेयं
लघ्वेका तु प्रकीर्तिता—क ( भ० )। ९. लघुनीति च—क० ( प. ) ।
१०. विलक्षितैः—क० ( पं० ) । ११. स चतुमत्रि प्रस्तारे गण इष्यते—क० ।