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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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४३२ नाट्यशास्त्र :
वृषभ, खर तथा उँट के चित्रपट भी इस कार्य में लिये जाएँ यह भी या फिर
नट के पदों में ही ऐसा अनुकूलगमन रखा जाए जिससे यह मालूम होने लगे
कि जैसे कोई रथ चल रहा है।
६१-६२. यही बात विमान में बैठे हुए पात्र की गति में भी समझना
चाहिए। रथ में चढ़ने की दशा में गात्र को ऊपर ले जाये और इसके
विपरीत उतरने की दशा में उसे नीचे ले जाकर अवरोहण करे।
६२-६५. अब विमान के प्रसंगवश आकाशगति को भी बतलाते हैं—
'अधोऽलोकनेन' इत्यादि से। यहाँ चक्करदार घुमाव में गति को रखे परन्तु
यहाँ आकाशीकीचारी तथा मण्डलों की बार-बार आवृत्ति भी रखी जाती है।
ऋजु = सरल एवं ललित जंघाओं के द्वारा और आयत अर्थात् चरणों को ऊपर
ले जाकर गिराते हुए तथा कुटिल गति से घुमा कर। इसमें उत्क्षेपण के
समय उन्नत और पात के समय नत रखा जाए। भ्रश्यतः—गिरने वाले
की, जो कि अनजाने में नीचे आ रहा हो। अपविद्धभुज-जिसमें दोला के
आकार में भुजा जल्दी २ गिरती हो।
६६-६८. अर्थवश = प्रयोजन के अनुकूल मान कर अवतरण किया जाए।
इसमें नदी या जल में अवतरण (में उतर रहे हों) जैसा वर्णित क्रियाओं में
अभिनय कर शरीर को ललित अंगक्रिया द्वारा उतारे।
१०१-१०३. तैरने की प्रक्रिया जल के प्रमाण की अपेक्षा से की जाए
अर्थात् जब पानी थोड़ा हो तो वस्त्रों को ऊपर लेकर तथा अधिक
जल में पाणि के द्वारा विचित्र रूप में जल को हटाते हुए गति रखे। इसमें
पताक तथा सर्पशीर्ष हस्त से उपलक्षित गति रखी जाती है।
१०३-१०४. वैसे अपनी जानकारी या इच्छा में तैर कर मनुष्य चलते
हैं किन्तु कभी कभी-कभी तेज प्रवाह में बिना इच्छा के भी जल में बहते हुए
चला जाता है या जल बहा कर ले जाए तो ऐसी स्थिति में गति दिखलाते
हैं—'प्रसार्य' इत्यादि से। एकैकं—अर्थात् क्रमशः। ऐसी गति में सभी अंगों
में आकुलता तथा मुख को तिरछा घुमा कर (आधूत) रखा जाता है।
अन्य आचार्य पारी पारी से पार्श्व परिवर्तन के द्वारा भी इसे दिखलाने की
बात कहते हैं परन्तु इसमें पार्श्वपरिवर्तन नहीं होता वह तो स्वेच्छा से जल
में तैरने के समय ही सम्भव रहता है।
१०५-१०७. जल के प्रसंग में नौका की एवं नौका में बैठे हुए पात्र की
गति भी—'नौस्थस्यापि' के द्वारा बतलाते हैं।