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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 550, कुल 668 में से

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पृष्ठ 550

चतुर्दश अध्याय
(कक्ष्या, परिधि तथा लोकधर्मी निरूपण)
१. 'तु' शब्द से द्वितीयाध्याय में पूर्व में (बहुत पहिले) कही बात को
पुनः संकेतित किया गया है। मण्डप के विशिष्ट भाग रंगपीठ को विभाग
पूर्वक समझ कर (विज्ञाय) कक्ष्या एवं गति के उपयोगी विशिष्ट स्थानों
का प्रयोग किया जाता है। नाटकीय प्रदेशानुसार प्रकोष्ठ को छोड़ते हुए जो
स्थान बचता है उसी में चतुरस्र योजना की जाती है। अतः कक्ष्या के वाम
तथा दक्षिण (बाजू के) भाग में कुतपों (आर्केस्ट्रा) की स्थापना की जाती
है तथा शेष भाग में कक्ष्या का विभाग रखते हैं।
२. रंगमण्डप के कौन (से) विभाग में कक्ष्या हो इसके उत्तर में कहते
हैं—'यो नेपथ्य' इत्यादि से। नेपथ्यगृह और उसका द्वार आदि द्वितीया-
ध्याय में कहे हैं। आतोद्य के बिठलाने पर जो प्रदेश बचा रहता है उसी
रंगपीठ के प्रदेश में पात्रों के निष्क्रम एवं प्रवेश के लिए गति के उपयोगी
स्थान विभाग का निर्देश करना चाहिए।
३. स्थान विभाग कहाँ हो इसके उत्तर में बतलाते हैं कि जिससे प्रवेश
हो उसे 'परिक्रम' कहते हैं। जहाँ चारी आदि का सन्निवेश हो उस रंगपीठ के
स्थान को (स्थान भेद से) छोड़ा नहीं जाता है (अर्थात् यही कक्ष्या-प्रदेश
होता है)। परिक्रम से स्थान भेद हो जाता है—जैसे ऊपर चढ़ने के गात्र को
सम्हालना, अतिक्रान्त पद से गति रखना—जैसे स्थलों में इसी स्थान भेद से
आरोहणीय स्थल की प्रासाद या पर्वत रूप स्थिति को दिखलाया जाता है।
४-६. रङ्गपीठ पर क्रम विशेष एवं स्थान भेद की कल्पना से कक्ष्या-
विभाग के विशिष्ट देश में भिन्न स्थानों की रचना मान ली जाती है, उन्हें
रचनाकार आदि को स्मरणार्थ (ही) उपलक्षण द्वारा बतलाया (लिखा)
गया है। यद्यपि पृथ्वी आदि सभी स्थानों को एक ही शब्द 'त्रैलोक्यम्' से
कहा ही गया है फिर भी स्वर्ग, पृथ्वी तथा पाताल के भेद से गृह, प्रासाद,
पर्वत का कथन वर्णनोद्देश्य के लिये पृथक्-पृथक् वर्णित हुआ है।
७. इसी त्रैलोक्यवर्ती देशों के पृथक् वर्णन को दिखलाने के लिये—'नगरे'
इत्यादि से यहाँ कहते हैं। यहाँ अटवी पद से ग्राह्य उद्यान, आराम,