नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १४ ४४३
शब्द बाह्य अर्थ के निवेदन अर्थात् निःशेष वेदन या बतलाने के ज्ञान रूप
अर्थ में यहाँ प्रयुक्त है ।
प्रवृत्तियों के चतुर्विधत्व ( तथा ) संख्या के विषय में और भी बतलाते हैं
'यथा' इत्यादि से 'देशाः' तक । देशों के नानात्व को मान कर मुनि ने
'चारप्रवृत्तियाँ' ऐसा कहा है अतएव देश भी चार ही हैं ऐसा नहीं समझना
चाहिए । इसका आशय यह नहीं कि इतनी ही कहीं गयी हैं तथा अन्य का
परित्याग कर दिया हो । ये सभी आशंकाएँ हैं । वस्तुतः इनके चार प्रभेद
( प्रयोगों में ) लक्षणों की समानता के आधार पर रखे गये हैं । प्रयोग
अर्थात् नाट्य-प्रयोग । इन चारों की लक्षणगत समानता से साधारण
स्वभाव वाले प्रयोगों का व्यवहार होता है । प्रवृत्ति सदा लोक के अनुगुण
( अनुकूल ) अनुसरण को ही कहा जाता है । क्योंकि लोक का-दक्षिण, पूर्व,
पश्चिम तथा उत्तरभूमि इस प्रकार-चतुर्धाविभाग है और यह विभाग बिना
किसी कारण के नहीं है ।
'तथाहि' इत्यादि से दाक्षिणात्यों में शृङ्गार की प्रचुरता होने से
कैशिकी वृत्ति का होना संभव है, पश्चिम में आवन्ती का संग्रह तो है परन्तु
कैशिकी भी है, इसके अतिरिक्त धर्म की प्रमुखता होने से सात्वती भी है ।
प्राच्यों में विशिष्ट वागाडम्बर की प्रमुखता रहने से भारती एवं आरभटी का
योग रहता है ।
उत्तर में यद्यपि भारती एवं आरभटी का ही प्रमुखतः योग होता है
फिर भी कैशिकी के आंशिक सम्बन्ध रहने से जनता शृङ्गारमय प्रयोग की
सहिष्णु रुचि रखती है । इस प्रकार विभिन्न चित्तवृत्तियों के सादृश्य को चार
प्रभेदों में दिखलाया गया । यद्यपि लोक अनेक प्रकार के वेष, भाषा तथा
आचार आदि से युक्त होता है परन्तु नाट्य में चित्तवृत्तियों की चार प्रमुखता
के अनुकूल ही ये चार प्रभेद कर लिये गये हैं ।
३७-४०. यहाँ भिन्न-भिन्न कुछ देशादि का प्रतिपद पाठ कवि एवं
अध्येतृगण को उन उनकी रुचि एवं देश का ज्ञान करवाने के उद्देश्य से
दिया गया है ।
४१-४२. 'नित्यमेव तु'—देशभेद से होने वाली चित्तवृत्तियों का क्रम
अनादि है क्योंकि देशभेद के औचित्य से प्राप्त स्वभावभेद वेषभूषा पर
स्पष्ट दिखाई देता है । यह स्वभावभेद ही वेष की प्रक्रिया को देशगत
भिन्नता में बदल देता है ।