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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 557

४४६ नाट्यशास्त्र
अभिनेय में नाट्यधर्मी हो गया है। लीलाप्रधान एवं मनोहर अंगहारों की
प्रमुखता वाले अभिनय से युक्त नाट्य की लक्षणानुसारिता भी नाट्यधर्मी
है। जहाँ पुरुष अपने ( सहज ) रूप में न रह कर स्त्रीभाव का आश्रय
ले ले तो भी नाट्यधर्मी हो जाता है। यहाँ 'भवेत्' क्रिया के द्वारा
ग्रन्थकार ने संभावना में लिङ् का प्रयोग किया है जो समयनिष्ठता को
दर्शाता है। यह सम्भावना रञ्जन के तथा कथावस्तु के लिये भी उपयोगी
रहना चाहिए।
७४. आसन्नवचन के अश्रवण तथा दूसरों के अश्रूयमाण का श्रवण आदि
केवल यहाँ धर्मतः सम्भव है तथा सौन्दर्याधायक भी होते हैं। अनुक्त को
आकाशभाषित के रूप में केवल अभिनेता मात्र श्रवण करता है।
७५. नाट्यधर्मी की इसी बहुलता तथा व्यापक क्षेत्र को अनेक उदाहरणों
तथा विवरणों से दिखलाने के लिये यह विस्तार दिया गया है। शैल आदि
पदार्थों का आवश्यकतानुसार अभिनेता जो प्रयोग करते हैं यह प्रयोग भी
'नाट्यधर्मी' होता है !
७८. 'नृत्यतेऽवगम्यते' में नृत्त सदृश 'विशाखागति' का प्रयोग सूचित
किया गया है। यहाँ ललित अर्थात् आवेष्टितादि करण से गृहीत वर्तना तथा
उत्क्षिप्त पद से चतुस्तालादि के द्वारा काल-विभाग भी सूचित होता है ।
८१. नाट्यधर्मी के व्यापकत्व को दिखला कर उपसंहार में कहते हैं—
'नाट्यधर्मी' इत्यादि । नाट्यधर्मी में जो गति है उसमें हेतु है अंग अर्थात् गीत,
आतोद्य आदि तथा अभिनय । यहाँ अङ्गाभिनय पद में समाहार द्वन्द्व के
कारण एकवचन का प्रयोग हुआ है। राग = सामाजिक की प्रीति ।
८२-८३. अध्यायार्थ का उपसंहार करते हैं—'एवम्' इत्यादि से । यहाँ
दो धर्मियों के रहने से यद्यपि द्विवचन होना चाहिये फिर भी 'धर्मी' पद में
एकवचन के प्रयोग के द्वारा अभिनय में नाट्यधर्मी की प्रमुखता को दिखलाया
गया है, क्योंकि लोकधर्मी इसी में समाविष्ट ( हो सकता ) है। युक्तयः =
प्रवृत्तियाँ । अवशिष्ट अभिनय को सात्विक भावों के अभिनय तथा सामान्य-
भिनय के प्रसंग में आगे कहा जायगा । (ना० शा० भाग ३, :अध्याय २४ में)
अब जो 'वाक्य' बचा तथा जो तत्वतः धर्मी भी है उसके स्वरूप का अगले
अध्याय में निरूपण किया जायगा इस कथन से यहाँ आङ्गिक अभिनय का
उपसंहार करते हुए अध्याय समाप्ति को ( भी ) किया गया है।