नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 558, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदश अध्याय
(वाचिकाभिनय)
१. आङ्गिक अभिनय के अनन्तर वाचिक का विशेष निरूपण आवश्यक
है क्योंकि आङ्गिक के विषय को प्रस्तुत करने या समर्पण में आधारभूत यही
वाचिक अभिनय होता है। वागभिनय—यहाँ 'वाचामभिनयः' से षष्ठी तत्पुरुष
समास है ही नहीं किन्तु 'वागेवाभिनयः' विग्रह से कर्मधारय समास ही है।
क्योंकि वाणी ही अभिनय है अर्थात् रंगस्थल पर अभिनेता जो संवादादि
बोलता है वही अभिनय। षष्ठ अध्याय में जिसका नाम मात्र उल्लेख हुआ
था अब यहाँ उसी का स्वरूप विशेषतः प्रस्तुत करना है। अतः यहाँ लक्षणत्वेन
अभिधान के कारण इसी का प्राधान्य समझना चाहिए।
२. वाचिक के लक्षण में कारण बतलाने के लिये कहते हैं—'वाचि'
इत्यादि से। क्योंकि वाणी नाट्यप्रयोग के अभिनय की तनु = आधारभूमि
है। सकल प्रयोगों की आधार, गाने बजाने के लिये अनुग्राहक तथा स्वयं
अभिनय स्वरूपा वाणी ही होती है। इसलिये जब वाणी से अभिनय होता
है, तब ये अङ्गादि भी (वाक् सहित होकर) अपने-अपने अर्थ को व्यक्त
करते हैं।
३. वाणी उपयोगिनी होकर विश्व की कारण है इसे 'वाङ्मयानि'
इत्यादि से भी कहते हैं। यह वाणी 'चतुर्थगोपाय' अर्थात् चौथे भाग में
(पुरुषार्थ) के रहने वाले मोक्ष की उपायभूता होती है। इस तथ्य का भी
संकेतित मिलता है। वाङ्निष्ठानि—अर्थात् फलरूपा वाणी में जिसकी
निष्ठा अवस्थान है। इस प्रकार वाणी ही संसार की अवभासिका है
तथा सभी की कारण है और वही निर्वाहिका (भी) है। 'वाणी ही
सम्पूर्ण भूत है' (वाग् वै विश्वा भुवनानि) इस श्रुति के अनुसार वाणी
ही समग्र जगत् का कारण है क्योंकि विश्व शब्द का विवर्त है तथा यह वाणी
ही अर्थ के रूप में विवर्तित होती है। इसी तथ्य को भर्तृहरि ने वाक्यपदीय के
ब्रह्मकाण्ड में विस्तार से दिया है। (इसके उद्धरणात्मक अंश १।१२१, १२४
तथा १२६ को पाद टिप्पणी में देखना चाहिये। द्र० ना० शा०, भाग २ पृष्ठ
२०१)। यह सर्वाकार है इसी कारण इतिवृत्त को नाट्य का शरीर भी
आगे कहा जायगा (द्र० ना० शा० अध्याय २१।१) क्योंकि इतिवृत्त भी
वाङ्मय (रूप वाला) होता है।