नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 552, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १४ ४४१
ग्रहण से भी यही स्पष्ट है कि नेपथ्यगृह का द्वार पूर्वाभिमुख होता है। अतः
वही पूर्व दिशा है। भाण्ड पद तो उसकी प्रतियोजना रहने पर प्रमुखता के
साथ पूर्वदिशा को सूचित करता है यही समझ कर प्रयुक्त है।
१२. 'तेनैव' का अर्थ है कि पूर्व में प्रविष्ट पात्र के अनन्तर प्रविष्ट दूसरे
पात्र के सम्बन्ध द्वारा।
१७. पूर्वकथित बाह्य, मध्य तथा आभ्यन्तर तथा दूर, मध्य एवं
सन्निकृष्ट के विभाग को कहते हैं—'सैव भूमि' इत्यादि से।
१८-१९. 'नगरे वा' इत्यादि से भूमि के विकृष्टत्व, मध्यत्व एवं सन्नि-
कृष्टत्व को उसके बहुत्वं एवं अल्पत्व के कारण ही नहीं परन्तु परिक्रम की
विचित्रता के कारण भी मानना होता है यही दिखलाया गया है। प्रयोग =
जो नाट्य में किया जाए। दिव्य = पिशाच से लेकर सभी दैवयोनियाँ। इनका
नगर, दीप आदि में गमन आकाश से, आकाशगामी विमान या अन्तर्हित
करने वाली माया से अथवा विविध प्रयोजनों वाली बलाद् आहरण करने
वाली क्रियाओं से दिखलाया या सम्पन्न करवाया जाए।
२०-२१. दिव्यों के लिये केवल यही उपर्युक्त विधान नहीं है। ऐसे अन्य
प्रकार भी हैं उन्हें दिखलाने के लिये—'नाटके' इत्यादि से पुनः कहते हैं।
छन्नवेष पद से यह दिखता है कि वरदान आदि या अनुग्रह करने के कारण
देवताओं का भी अपने स्वरूप को छिपा कर मनुष्य के रूप में दर्शन हो जाता
है। ऐसी दशा में दिव्य पात्र का भूमि पर संचार होगा ही क्योंकि जहाँ
घूमना है वहाँ तो भूमि रहेगी ही।
२२. (यहाँ) देवताओं का साधारण प्रकार दिखलाते हैं—'दिव्यानाम्'
इत्यादि से। पुराणों में सामान्यतः इसे बतलाया भी है। यह भारतवर्ष में ही
न कि इलावृत आदि खण्डों में।
२७-३२. वर्षों में हरिवर्ष, किम्पुरुष आदि स्थानों में प्रचार कहते हैं—
'हिमवत्' इत्यादि से। हिमवान् में इनकी गति अर्थात् प्रचार है। इसी
प्रकार सर्वत्र समझना चाहिए। नील पद अद्रि का विशेषण है तथा इसी का
विशेषण वैडूर्यमय है। यह विवरण कविशिक्षा के लिये (भी) दिया गया
है। दिव्यजन के ये ही आवास होते हैं।
३२-३६. तेषाम्' इत्यादि से वर्षान्तरों में होने वाले (दिव्य पर्वतों पर
सम्भव एवं उचित) गमन प्रदेश के तथा कार्य आदि विषय में यहाँ बतलाया