नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४३३
१०८-१०६. इस प्रकार देश की अपेक्षा से गति बतलाई गयी तथा
नागादि के प्रसंग से सर्प-गति भी बतलाई ।
११०-१११. अवस्थाभेद से गति निरूपण के प्रसंग में विट की गति
बतलाते हैं—'विटस्यापि' इत्यादि से । सौष्ठव जो अपनी प्रकृति के
उपयुक्त हो ।
११२-११३. कञ्चुक के योग्य वृत्ति को जो अपने लिये चाह कर
लेता है इस विग्रह से कञ्चुक पद से क्यच् तथा 'क्वचि + च' से ककार
को ईकार युक्त कर कञ्चुकी शब्द निष्पन्न होता है । वय एवं अवस्था के
विभाग को विचार कर यह विवरण दिया गया है जिसका अभिनय में प्रयोग
किया जाता है ।
११४-११७. विष्कम्भनकृतप्राण-विष्कम्भ अर्थात् स्थैर्य, वह जिसे हो
या ऐसी दशा में यष्टि आदि से प्राण बल को जिसने समन्वित किया हो—
ऐसी गति ।
११८. विकूणन, सङ्कोचन, विमर्दन इत्यादि मिश्रित क्रियाओं को लिया
जाए पथिक की गति में ।
११९-१२०. स्थूल अर्थात् महाकाय या मोटे आकार का व्यक्ति जिसे
थोड़े से श्रम से थकावट आ जाए तथा पसीना आने लगे ।
१२१-१३०. पैरों की विपर्यय गति के साथ चेष्टा के साथ तदनुकूल
हाथों की गति, स्थिति भी रखी जाती है ।
१३१-१३४. 'कुहक' शब्द का कुछ आचार्य अधम-लिङ्गी (नीच साधु)
अर्थ करते हैं । 'कुहना' पाठ के अनुसार अर्थ होगा जो दम्भी या ईर्ष्यालु
है । (मेदिनी कोष भी इसका—'कुहना दम्भचर्यायामर्ष्यालौ कुहनस्त्रिषु'
के द्वारा समर्थन करता है) । पैर में कांटा या क्षत हो जाए तो ऐसे
(लंगड़े) पात्र की गति या पंगु की गति का 'अग्रतलसंचरपाद' से अभिनय
दिखलावे । अन्य आचार्यों ने यहाँ नर्कुट की योजना भी दिखलाई है ।
१३७-१४२. विदूषक की गति बतलाते हैं—'विदूषकस्यापि' इत्यादि
से । असम्बद्ध प्रभाषण अर्थात् निरर्थक या अनुचित भाषण । जब ऐसा
पात्र रंगमञ्च पर आता है तो अङ्गहास्य होता है। यहाँ प्रवेश पद से
नाट्य में ही रस है, लोक में नहीं; यही दिखलाया गया है । इस प्रकार
तीन हास्यों में में से कहीं पर एक प्रकार का, कहीं दो तथा कहीं तीनों
प्रकारों का आश्रय लिया जाता है । इस क्रम में विदूषक को अपने
स्वामी राजा, अमात्य या श्रेष्ठो की प्रकृति को समझते हुए विभागशः इसे
२८ ना० शा० द्वि०