नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः ३७१
अत्र१ च भावगतानि २रसगतानि च ३कृष्याक्षराणि बोद्धव्यानि ।
तद्यथा—
( वृत्ति )—इसी प्रसंग में भाव तथा रस में होने वाले कृष्याक्षरों को भी
जान लेना चाहिए।
‘कृष्याक्षर और उनका व्यवहार—
४आकारैकारसंयुक्तमेकारौकारसंयुतम् ।
व्यञ्जनं यद्भवेद्दीर्घं कृष्यं तत्तु विधीयते ॥ ६८ ॥
जो व्यंजन आकार से युक्त या ए, ऐ, औ जैसे दीर्घाक्षर वाले स्वरूप के
हों उन्हें कृष्याक्षर समझना चाहिए ॥ ६८ ॥
विषादे च वितर्के च प्रश्नेऽथामर्ष६ एव च ।
कलाकालप्रमाणे पाठ्यं कार्यं७ प्रयोक्तृभिः ॥ ६९ ॥
विषाद, वितर्क, प्रश्न और क्रोध की अवस्था में ऐसे वर्णों के (संवाद
में) आने पर उन पर एक कला का विराम (प्रमाणानुसार) रखा
जाए ॥ ६९ ॥
शेषाणामर्थयोगेन विरामे विरमेदिह८ ।
एकद्वित्रिचतुःपञ्च-षट्कलञ्च विलम्बितम् ॥ ७० ॥
(इसके अतिरिक्त) शेष (अक्षरों के होने पर) उनके अर्थों के
१. कृष्यतीति कृष्यो=विलम्बितो लयः तत्र साधूनि कृष्याक्षराणि
सन्ध्यक्षराणीत्यर्थः । (अभि० भार० voll II. पृ० ४०२) अर्थात्
विलम्बित लय के उपयुक्त सन्ध्यक्षर कृष्याक्षर समझना चाहिए।
(जैसे आ ई ऊ जैसे दीर्घ अक्षर एवं सन्ध्यक्षर कृष्याक्षर हैं) ।
१. अथ—क०, ख०; अत्रानुगतानि चत्वार्यक्षराणि रसभावानुगतानि
निकृष्टाण्यक्षराणि चोद्बोध्यानि—ग० ।
२. रसजातानि—ख० । ३. कृष्याण्यक्षराणि—ख० ।
४. एकारैकारसंयुक्तमोकारौकारसंयुतम्—ख०; आकारे कारसंयुक्तमेकारे
कारसंयुतम्—ग० ।
५. भवेदिह—ख०; ग० ।
६. चामर्षणे—ख०; वामर्षणे—ग० ।
७. योज्यं—क० । ८. विरमेद्बुधः—क० ।