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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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३८० नाट्यशास्त्र
१०६-११६. यहाँ मुनि ने पलकों के ६ प्रभेद दिखलाते हुए उनकी
अभिनय योजना दिखलाई।
११७-१२७. इसी क्रम में भ्रुकुटी की क्रियाओं को दिखलाते हुए उसके
सात प्रभेद दिखला कर उसके लक्षण दिखलाये तथा अभिनय योजना भी।
१२८-१३४. नासा (नासिका) के कर्म को दिखलाते हुए उसके छः
प्रकार, उनके स्वरूप तथा अभिनय योजना को दिखलाया गया है।
१३४-१३६. कपोल कर्म के छः प्रकार, उनके लक्षण तथा उनकी
अभिनय योजना है।
१३६-१४४. अधर के छः कर्म तथा उनके लक्षण एवं अभिनय योजना।
१४५-१५१. चिबुक के सात कर्म, उनके लक्षणों के साथ-साथ मुखस्थ
दाँतों की क्रियाओं का विवरण एवं इनकी अभिनय योजना को भी बतलाया
गया है।
१५१-१५६. मुखज कर्म के छः प्रभेद दिखला कर उनके लक्षण एवं अभिनय
योजना बतलायी गयी है।
१५६-१६४. मुखज कर्म के विवरण से लगे हुए 'मुखराग' का विवरण
दिया गया है। मुखराग का अभिनय के अन्तर्गत विशेष महत्व होता है
तथा भाव एवं रस के सन्दर्भ में अभिनेता के लिये मुखराग का प्रदर्शन
अत्यन्त आवश्यक रहता है। आङ्गिक अभिनय का मुखराग द्वार माना
जाता है। वेमभूपाल ने भरतोक्त मुखराग के चार प्रभेदों के अतिरिक्त
विकस्वर, अरुण, मलिन तथा पाण्डु नामक अन्य चार प्रभेद भी बतलाये
हैं (द्रष्ट-भरतकोष पृ० ४६६)। नेत्रादि के अभिनय के साथ साथ मुखराग
की योजना नाट्यप्रयोग की स्थिति में आधार रहती है तथा यही प्रयोग
की सिद्धि का मूल माना जाता है क्यों कि मुखराग ही दर्शक को पात्र की
सुख, दुःखमयी स्थिति प्रकट करता है।
१६८-१७६. मुनि ने अन्त में ग्रीवा के नौ कर्म, उनके स्वरूप तथा
अभिनय योजना के दिखला कर 'उपाङ्गविधान' को सम्पूर्ण किया। ग्रीवा
कर्म शिर के आधार होते हैं परन्तु समग्र उपांग विवरण में सभी अंगों का
सन्निवेश रहने से यथावश्यक सभी का विवरण पूर्णतः रखकर मुनि ने अगले
अध्याय में प्रस्तुत किये जाने वाले अंगों का संकेत भी दिया।