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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 495, कुल 668 में से

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पृष्ठ 495

३८४ नाट्यशास्त्र
२७-३७. त्रिपताक (हस्त) :- इस हस्त का लक्षण सभी नाट्य-
शास्त्रीय ग्रन्थों में प्रायः समान मिलता है। भरत मुनि ने इससे सूचित भाव
तथा कार्यों को विस्तार से दर्शाये हैं। 'अभिनय-दर्पण' में त्रिपताक की
योजना या विनियोग का विवरण अल्पमात्रा में प्राप्त है। यथा इस हस्त के
उपयोग के द्वारा मुकुट, वृक्ष, वज्र, इन्द्रदेवता, केतकीपुष्प, दीपक, अग्नि की
ज्वालाएँ, जम्हाई लेना, कपोत, पत्रलेखा, बाण तथा परिवर्तन (पीछे मुड़ने)
के भावादि को दिखलाया जाता है। 'नाट्यशास्त्रसंग्रह' में भरतोक्त संकेतित
पदार्थ तथा कार्यादि को दिखलाने के लिये त्रिपताक हस्त के प्रदेश एवं
क्रियाओं का विवरण भी दिया गया है जो अधिकांश नाट्यशास्त्र के विवरण
से समानता लिये हुए है। यथा—इस त्रिपताक हस्त से दधि तथा अन्य
मांगलिक वस्तु का स्पर्श दिखलाया जाता है। इसी प्रकार किसी का बुलाना
बतलाने के लिये त्रिपताक हस्त की दोनों अंगुलियों को पीछे हटा सिकुड़ा कर
एक दूसरे के सम्मुख झुका देना चाहिए। किसी बात की उपेक्षा या विचार भेद
दिखलाने के लिये या किसी पदार्थ को दूर फेंकने (के भाव को दिखलाने)
की स्थिति में दोनों उंगुलियों को सामने की ओर फेंक कर हस्त तल को एक
ओर रखना चाहिए। किसी पूज्यजन को नमस्कार करने का भाव दिखलाने
के लिये त्रिपताक हस्त के सामने की बाजू में एक दूसरे को सामने रख
कर मस्तक पर रखा जाता है। किसी दूसरे के चेहरे को ऊपर उठाने में
दोनों अंगुलियों को ऊपर फैला कर 'त्रिपताक' का प्रयोग किया जाता है।
परन्तु दोनों अंगुलियों को क्रमशः झुका कर और ऊपर उठाते हुए 'सन्देह'
दिखलाया जाता है। इसी प्रकार मस्तक पर पगड़ी या मुकुट के धारण करने
में 'त्रिपताक' हस्त को मस्तक पर हस्ततलों को नीचे की ओर घुमाते
हुए दिखलाया जाता है किन्तु मुकुट की स्थिति में कैवल उसकी मस्तक पर
स्थिति ही रखी जाती है। त्रिपताक हस्त को नासिका, मुख या कान पर
रख कर क्रमशः अनिष्ट गन्ध, अनिष्ट वचन या अनिष्ट शब्द को दिखलाया
जाता है। छोटे पक्षियों, बहती जलधारा तथा हवा को दिखलाने में
त्रिपताक को कटि प्रदेश के बराबर ऊपर नीचे तथा बाजू में अंगुलियों को
चलाते हुए रखना चाहिए। आँसुओं के निकलने और उन्हें पोछने में आँख
के समीप त्रिपताक हस्त को लेजाकर नीचे की ओर जाती हुई अनामिका
दिखलाई जाती है। मस्तक पर तिलक लगाने की स्थिति दिखलाने के लिये
त्रिपताक हस्त को ललाट पर ला कर वहाँ अनामिका से स्पर्शकरवाया जाता