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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 493

३८२ नाट्यशास्त्र
भरत मुनि से विशिष्ट या विभिन्न स्वरूप हों । [ संक्षिप्त टिप्पणी पृष्ठ ३७,
३८ तथा ३६ पर दी ही जा चुकी है । ]
८-१०. अञ्जलि आदि हस्त संयुक्त ही होते हैं परन्तु कभी कभी
पताकादि का प्रयोग भी संयुक्तत्व युक्त रखा जाता है । आशय यह कि
अञ्जलि आदि हस्तमुद्राएँ बिना संयुत हुए अपने स्वरूप तथा अर्थ की ही बोधक
नहीं हो सकतीं ।
११-१६. अभिनय के उपयोगी संयुत तथा असंयुत हस्तों के साथ ही
नृत्तहस्तों का भी विवरण अपेक्षित है । ये अभिनेय अर्थ में विश्रान्ति को
अधिक फैलाकर प्रभावी बनाते हैं तथा शाखा एवं अंकुर के अभिनय की
पूर्ति करते हैं। ये कभी संयुक्त रूप तथा कभी असंयुत रूप का उपजीवन
रखते हैं तथा इनमें से किसी एक का भी प्रयोग किया जा सकता है । मोटे
तौर पर इनका प्रयोग नृत्त में रहता है परन्तु मुनि ने इनकी नाट्य अभिनय
में भी योजना रखने की सहमति दी है ।
१७-१८. पताक ( हस्त ) :-कारिका में प्रयुक्त 'कुञ्चित' शब्द
का यहाँ अंगूठे से सम्बन्ध है । कुञ्चित पाद का आगे लक्षण दिया गया
है उसी की क्रिया के अनुसार अंगूठे को कुञ्चित अर्थात् तिरछा कर देना
चाहिए । इस हस्त को 'पताक' इसी लिये कहा गया कि यह पताका (ध्वज)
के आकार जैसा रहता है । जैसी अपेक्षा हो तदनुसार इनका विनियोग
रखा जाता है । हस्तमुद्रा में प्रथम एवं महत्वपूर्ण यही पताक हस्त माना जाता
है जिसका उपयोग व्यापक रूप में होता है। अभिनयदर्पण में 'पताक' के
स्वरूप में अंगुलियाँ सटा कर रखते हुए फैलायी जाती है तथा अंगूठा मोड़
कर तर्जनी के मूल में लगाया जाता है
१६-२७. भरतमुनि ने 'पताक' हस्त की योजना का विशद विवरण
दिया है । 'पताक' हस्त से सूचित शेष अर्थ एवं कार्य को चित्राभिनय' में
( अध्याय २६ ) भी दर्शाया गया है । इतना होने पर भी इसके नाट्याचार्यों
की परम्परा में अनेक स्थिति में विविध प्रयोग होते हैं । भरतमुनि ने इसके
एक हाथ को तथा दोनों को शरीर के विभिन्न अवयवों के साथ रखते हुए तथा
अन्य क्रियाओं के द्वारा अभिनेय वस्तु एवं अर्थों की सूचकता को दिखलाया ।
अभिनयदर्पणकार ने इसके द्वारा किये जाने वाले अभिनय से सूचित या
अभिव्यक्ति वस्तु एवं कार्यों को विशदरूप में दिखलाया है । तदनुसार इसका
उपयोग अभिनय-प्रयोग के आरम्भ में किया जाता है । इसके अतिरिक्त