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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 489

३७८ नाट्यशास्त्र
१६-१८. उपांगों से होने वाले मुखज अभिनय में सर्वप्रथम 'शिरोभिनय'
का भरत मुनि विवरण देकर अभिनय निरूपण आरम्भ करते हैं। इसके तेरह
प्रभेद होते हैं भरतमुनि सम्मत किन्तु आचार्य नन्दिकेश्वर ने मस्तक के नौ अन्य
भेद भी बतलाये । यथा—सम, उद्वाहित, अधोमुख, आलोलित, धुत, कम्पित,
परावृत्त, उत्क्षिप्त तथा परिवाहित । नाट्यशास्त्रसंग्रह में उद्वाहित नामक
एक अतिरिक्त प्रभेद दिखलाते हुए मस्तकाभिनय के १४ प्रकार माने हैं।
यहाँ नन्दिकेश्वर सम्मत मस्तकाभिनय के नौ प्रभेदों के स्वरूप ( नाट्यशास्त्र
से भिन्न होने के कारण ) विवरणसहित दिये जा रहे हैं ।
सममुद्वाहितमधोमुखमालोलितं धुतम् ।
कम्पितञ्च परावृत्तमुत्क्षिप्तं परिवाहितम् ।
नवधा कथितं शीर्षं नाट्यशास्त्र-विशारदैः ॥ (अ० द० ४६, ५०)
[ नाट्यशास्त्र के ( विज्ञाता ) आचार्यों ने मस्तकाभिनय के ६ प्रकार
माने हैं। यथा—( १ ) सम, ( २ ) उद्वाहित, ( ३ ) अधोमुख, ( ४ )
आलोलित, ( ५ ) धुत, ( ६ ) कम्पित, ( ७ ) परावृत्त, ( ८ ) उत्क्षिप्त
तथा ( ६ ) परिवाहित । ] इनके लक्षण तथा योजना भी ग्रन्थकार ने दी है
जिसे अभिनयदर्पण ( के कारिका ४६ से ६५ तक के ग्रन्थ भाग में ) देखा जा
सकता है ।
इसके अतिरिक्त नाट्यशास्त्र-संग्रह में भरतोक्त 'उद्वाहित' माना है
जिसका उल्लेख नन्दिकेश्वर ने भी किया था। किन्तु इसका लक्षण है :—
"सकृदूर्ध्वं शिरोनीतमुद्वाहितमुदीरितम्"
[ अर्थात् मस्तक के एक बार ऊपर उठाने या तान लेने को 'उद्वाहित'
शिर समझना चाहिये । ]
योजना—"शक्तोऽहमिह कार्येऽस्मीत्यभिमाने प्रयुज्यते" ॥
( ना० शा० संग० पृ० ५१ )
[ इसका प्रयोग व्यक्ति के कार्य में समर्थ होने के साभिमान सामर्थ्य
ख्यापन में किया जाता है ]
अभिनयदर्पण में उद्वाहित का स्वरूप इसी से मिलता हुआ है। यथा—
"उद्वाहितं शिरो ज्ञेयमूर्ध्वभागोन्नताननम्" ( का० ५२ ) [ मुख को ऊपर
उठाये हुए मस्तक को ऊँचा करते हुए रखना 'उद्वाहित' कहलाता है ]
योजना—"ध्वजे चन्द्रे च गगने पर्वते व्योमगामिषु ।
तुङ्गवस्तुनि संयोज्यमुद्वाहितशिरो बुधैः ॥ ( ५३ )