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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 480, कुल 668 में से

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पृष्ठ 480

एकोनविंशोऽध्यायः ३६९
१सूचासु चाङ्कुरगते च तथोपचारे
स्वल्पाक्षराणि हि पदानि भवन्ति काव्ये२ ॥ ६० ॥
रे दुष्ट, क्या है, दूर हट, आगे मत बढ़, तू रोक दिया गया है। अरे
निर्बल पुरुष ! तू सभी से उपहास किया जा रहा है। मुझे तुम से कुछ भी
काम नहीं।
इस प्रकार जिनमें थोड़े अक्षर भी हों पर काव्य में १सूचा तथा अंकुर२
(अभिनय) से युक्त होने और 'विराम' की सम्बद्धता से ऐसे समय स्वतः
उनमें गुणशालिता आ जाती है ॥ ६०॥
एवं विरामे प्रयत्नोऽनुष्ठेयः । कस्मात् ? विरामो ह्यर्थानुदर्शकः ।
अतएव 'विराम' के प्रयोग के विषय में ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि
विराम अर्थों की स्पष्टता में सहायक होते हैं।
३अत्र श्लोकः—
४विरामेषु प्रयत्नो हि नित्यं कार्यः प्रयोक्तृभिः ।
५कस्मादभिनयो ह्यस्मिन्नर्थापेक्षी यतः६ स्मृतः ॥ ६१ ॥
इस विषय में प्राचीन अनुवंश्य श्लोक भी हैं :—
वाचिक अभिनय में 'विरामों' पर सदा नाट्य निर्देशक को ध्यान देना
चाहिए क्योंकि अभिनय उच्चारित शब्दों के अर्थ पर निर्भर होता है ॥६१॥
अलंकार तथा विरामों में हस्त संचालन-विधि—
यत्र व्यग्रावुभौ हस्तौ तत्र दृष्टिसमन्वितः७ ।
वाचिकाभिनयः८ कार्यो विरामैरर्थदर्शकैः९ ॥ ६२ ॥
( नृत्य के समय ) आंखों को वहीं रखे जहां हाथ अपनी मुद्राओं को
प्रदर्शित करते हों तो ऐसी स्थिति में अर्थ को स्पष्ट करने के लिए विरामों
के साथ वाचिकाभिनय अवश्य रख देना चाहिए ॥ ६२ ॥
१. सूचा तथा अङ्कुराभिनय के लक्षण नाट्यशास्त्र के अध्याय २४।४३ तथा
२४।४४ पर ( भाग ३ में ) अवलोकन करें ।
१. सूचाङ्कुराभिनयनेषु—क०; शोकं शुचं कुरु गते च—ख० ।
२. कार्ये—ख० । ३. भवत्यपि च—क० ।
४. विरामे तु प्रयत्नस्तु—ग० । ५. तस्माद—ग० ।
६. यतः स्थितः—ख०; ग० । ७. समन्वितैः—क० ।
८. वाचिकोऽभिनयः—क० । ९. दर्शभिः—क० ।
२४ ना० शा० द्वि०