सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 483, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 483

३७२ नाट्यशास्त्रम्
अनुसार जो विराम रखे जाएं वे एक, दो, तीन, चार या पांच कलाओं के
समय के प्रमाण वाले हों ॥ ७० ॥
'विलम्बिते विरामे हि सदा गुर्वक्षरं भवेत् ।
षष्णां कलानां परतो विलम्बो² न विधीयते ॥ ७१ ॥
जो सबसे अधिक समय लेने वाले ( अर्थात् लम्बे ) विराम हों वहाँ गुरु
अक्षर रहने चाहिए किन्तु छः कला से अधिक समय तक होने वाले विराम
नहीं हो ॥ ७१ ॥
अथवा ³कारणोपेतं प्रयोगं कार्यमेव च ।
समीक्ष्य वृत्ते कर्तव्यो विरामो रसभावतः⁴ ॥ ७२ ॥
या फिर किसी कार्य या अन्य आवश्यकता आ जाने पर और अधिक
समय लेने वाले 'विराम' रखे जा सकते हैं पर इन्हें रस तथा भावों की
स्थिति को देखते हुए ही रखना चाहिए ॥ ७२ ॥
ये विरामाः स्मृताः पाठ्ये⁵ ⁶वृत्तपादसमुद्भवाः ।
उत्क्रम्यापि क्रमं तज्ज्ञैः कार्यास्तेऽर्थवशानुगाः⁷ ॥ ७३ ॥
काव्य रचना में 'पादों' के विभाजन से ही 'विरामों' की सृष्टि होती है
पर रंगमंच पर उनके अर्थ को प्रकट करने के लिये चतुर जन निर्दिष्ट क्रम में
परिवर्तन कर विरामों को रख सकते हैं ॥ ७३ ॥
नापशब्दं पठेत्तज्ज्ञो ⁸भिन्नवृत्तं तथैव हि ।
विश्रमेन्नाविरामेषु⁹ दैन्ये¹⁰ काकुं न दीपयेत् ॥ ७४ ॥
कोई भी पात्र अशुद्ध शब्द और लक्षणहीन छन्दों का पाठ न करें।
निर्दिष्ट विराम स्थल के अलावा अन्य स्थानों पर देर तक न रुके और दैन्य
पूर्ण अवस्था में संवादों को बोलते हुए काकु को दीप्त न करे ॥ ७४ ॥
१. विरामे च विलम्बे च यदा—ख०; ग० ।
२. लम्बनं—ख०; ग० । ३. करणोपेतं—ग० ।
४. कर्त्तव्या विरामा रसभावतः—क० ।
५. काव्ये—ख०; ग० । ६. वृत्ते—क० ।
७. रसाश्रयाः—क०; तेऽर्थवशास्तदा—ग० ।
८. भिन्नवृत्तेन चैव हि—ख०; ग० ।
९. विश्रमेणाविरामेषु—ख०; ग० ।
१०. न काकुरसहीनकम्—ख०; ग० ।