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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 488, कुल 668 में से

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पृष्ठ 488

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३७७
उपांग तथा प्रत्यंगों से प्रदर्शित किया जाता है । इनमें केवल उपांगों से होने
वाला अभिनय 'मुखज' कहलाता है तथा स्थान आसन आदि चेष्टाओं के
द्वारा होने वाला 'चेष्टा-कृत' । नाट्यप्रयोग अपनी समग्रता के लिये शारीरिक
अवयवों से सम्बद्ध रखा जाता है । इन शरीर के अवयवों के तीन प्रभेद होते
हैं तथा इन्हीं से युक्त अभिनय रहता है जिसका विवरण अगली कारिकाओं
में ( ८-१२, १३ ) दिया गया है । इन छः अङ्गों से युक्त 'नाट्य' होता है ।
१२. कारिका में छः अंगों का मुनि ने विवरण दिया । अन्य मत
( अभि० दर्प० ) के अनुसार ग्रीवा को भी अतिरिक्त रूप में अंग माना
गया है ।
१३. प्रत्यंग अर्थात् सहायक अवयव जो अंगों के जोड़ने वाले होते
हैं—छः प्रकार होते हैं । इसके अतिरिक्त दोनों कलाइयाँ, दोनों कुहनियाँ,
दोनों घुटने तथा ग्रीवा को भी प्रत्यंगों में परिगणित किया जाता है । उपांग
अर्थात् अंगों के छोटे-छोटे भाग । ये प्रत्येक अंग में पृथक् पृथक् हैं । जैसे
शिर के उपांग ( बारह ) हैं—नेत्र, पलकें, पुतलियाँ, भौंह, कपोल,
नासिका, हनु ( जबड़ा ) ओष्ठ, दन्त, जिह्वा, चिबुक तथा मुख ( चेहरा ।
अन्य मत से कन्धों को भी उपांग माना गया है । हाथों के उपांग हैं—
कोहनी, कलाई तथा अंगुलियाँ । इसी प्रकार पैर के उपांग होते हैं—
टखने, एडियाँ, अंगुलियाँ पैरों के तले आदि । मुनि ने अगली कारिकाओं
के द्वारा इस समग्र अध्याय में अंग, उपांगों के अभिनय को विस्तार से
समझाया है ।
१४. शाखा अंकुर, तथा नृत्त ये तीनों भी अभिनय ही होते हैं । इनमें
आङ्गिक अभिनय को 'शाखा' कहते हैं । शाखा में हस्तों की चमत्कार पूर्ण
गति रखी जाती है कथित—अर्थानुसारी ( या भावों के अभिव्यञ्जक )
उपयुक्त अभिनय के प्रस्तुतीकरण को अंकुर तथा शारीर अभिनय के अंकुर
के द्वारा प्रदर्शित अर्थों को बतला कर आगे प्रस्तुत अर्थ की कल्पना करवा
देना अर्थात् 'अंकुर' के द्वारा प्रस्तुत अर्थ को आगे विस्तार देकर अगले अर्थों
को भी प्रस्तुत करने का आधार बनाना 'सूची' है । यही मत संगीतरत्नाकर
का है जिसकी मूल कारिका टिप्पणी पृष्ठ ६ पर उद्धृत है । ( भरतानुमत
शाखा, अंकुर तथा नृत्त का लक्षण इसी अध्याय की कारिका १५ पर है ) ।
१५. मुनि ने प्रस्तुत कारिका में शाखा, अंकुर तथा नृत्त का आंगिक
अभिनय में रहने वाला स्वरूप बतलाया ।