नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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प्रायो वीरे च रौद्रे च करौ प्रहरणाकुलौ ।
बीभत्से १कुत्सितत्वाच्च भवतः कुञ्चितौ करौ ॥ ६३ ॥
हास्ये चोद्देशमात्रेण करुणे च प्रलम्बितौ ।
अद्भुते विस्मयात् स्तब्धौ २भयाच्चैव भयानके ॥ ६४ ॥
इसी प्रकार रौद्र और वीर रस में हाथ शस्त्र प्रहार में व्यस्त रहते हैं।
बीभत्स रस में कुत्सित वस्तु के अवलोकन आदि के कारण हाथ सिकुड़े
रहते हैं। हास्य रस में हाथ किसी व्यक्ति या वस्तु की ओर लटकाए हुए
या ढीले रखे जाते हैं और अद्भुत रस में आश्चर्य के कारण हाथ स्तब्ध
(निष्क्रिय) हो जाते हैं ॥ ६३-६४ ॥
एवमादिषु चान्येषु३ प्रविचारेऽथ४ हस्तयोः ।
अलङ्कारविरामाभ्यां साध्यते ह्यर्थनिश्चयः ॥ ६५ ॥
इसी प्रकार के अन्य अवसरों पर भी अलंकार और विरामों के द्वारा ही
प्रदर्शित अर्थ स्पष्ट होता है ॥ ६५ ॥
ये विरामाः स्मृता वृत्ते५ तेष्वलङ्कार दूष्यते ।
समाप्तेऽर्थे पदे वापि तथा प्राणवशेन वा ॥ ६६ ॥
पदवर्णसमासे च द्रुते बह्वर्थसङ्कटे ।
कार्यो विरामः पादान्ते तथा प्राणवशेन वा ॥ ६७ ॥
शेषमर्थवशेनैव विरामं सम्प्रयोजयेत् ।
पद्यों में जो विराम रखे गए हैं उनमें अलंकारों की भी अपेक्षा रहती है।
शब्द की अर्थ समाप्ति पर या सांस लेने के कारण जैसी भी स्थिति हो—
उसमें विराम अवश्य किया जाना चाहिए। इसी प्रकार जहाँ अक्षर और शब्द
दीर्घ समासावली में समाविष्ट हों, या उनका उच्चारण शीघ्र गति से किया
जा रहा हो, या उनसे अनेक अर्थ प्रकट हो रहे हों तो इन सभी अवस्थाओं
में पाद की समाप्ति या फिर सांस लेने के लिये जहाँ भी आवश्यक रूप में
रुकना होता हो तो वहाँ 'विराम' रखे जाएँ। (इसके अतिरिक्त) शेष
स्थानों पर अर्थ के अनुसार 'विराम' की योजना की जाए ॥ ६६-६८ ॥
१. कुञ्चितत्वाच्च—क० ।
२. विस्मयाविष्टे स्तब्धौ कार्यो—क० ।
३. सर्वेषु—ग० । ४. प्रविचारेषु—ख०; अधिकारेषु—ग० ।
५. नृत्ते—क०; एते—ग० ।