सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 490, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 490

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १ ३७९
[ ध्वज, चक्र, आकाश, पर्वत, आकाश स्थित तारागण एवं ऊपर स्थित
वस्तु को देखने के भाव को दिखलाने के लिये 'उद्वाहित' शिर की योजना
की जाती है । ]
१६-३७. मुनि ने मस्तकाभिनय के अन्तर्गत उनके तेरह प्रभेद, लक्षण
तथा उनकी योजना या विनियोग बतलाया । यद्यपि मस्तक द्वारा की
जाने वाली क्रियाओं की कोई निश्चित संख्या या उनका अन्त नहीं है, इसी
कारण इसके विषय में विभिन्न आचार्यों के मतों में विभिन्नता भी प्राप्त
होती है । स्वयं मुनि ने भी सामान्य लोकप्रचलित क्रियाओं के अनुसार
मस्तक की अन्य गतियों को भी प्रस्तुत करने में अपनी सहमति दिखलाई ।
(द्रष्ट० च० ३६ पर)
३८-४२. यहाँ मुनि ने रस की संख्या के अनुरूप ८ रसदृष्टियाँ तथा
स्थायी भावों की संख्या के अनुरूप ८ स्थायी दृष्टियाँ बतला कर शेष बीस
संचारी दृष्टियों का विवरण किया है, जो सब मिल कर (८ + ८ + २० =
३६) छत्तीस होती हैं । इन सभी दृष्टियों के स्वरूप तथा उनकी योजना
(या प्रयोगविधि) भी साथ साथ दिखलाई गयी है । अभिनयदर्पण में दृष्टियों
के केवल आठ प्रकार ही बतलाये हैं ।
४३-६५. रसादि दृष्टियों के साथ साथ भाव एवं सञ्चारीभाव जन्य
दृष्टियों का सलक्षण निरूपण किया गया जिसमें सभी के लक्षण तथा योजना
भी ( दिखलायी गयी ) है । अंगोपाङ्गों में दृष्टि का महत्व असाधारण होता
है इसी कारण दृष्टि का विवरण बारीकी से देकर उसकी विस्तृत पर्यालोचना
भी की गयी है । दृष्टि मनुष्य के आन्तरिक भावों की सूचक होने से भाषा
भी है तथा भावभङ्गिमाओं की अभिव्यक्ति का द्वार भी जिनसे रसाभिव्यक्ति
संभव होती है ।
६५-६६. मुनि ने दृष्टि के विवरण के साथ साथ ताराकर्म को भी
बतलाया जो पुतलियों की क्रियाएँ होती हैं । इनके नौ कार्य के उल्लेख के
साथ ( उनकी क्रियाओं के ) लक्षण तथा योजना भी दी गयी ।
६७-१०३. इस क्रम में ताराकर्म के प्रत्येक प्रभेद के स्वरूप विवरण तथा
उनकी रस एवं भावादि में अभिनय योजना भी दी गयी है ।
१०४-१०८. मुनि ने दर्शन विधान भी दिया है जिसमें नेत्रपुटों के
हलन-चलन के द्वारा अवलोकन के आठ प्रकार दिखला कर उनके स्वरूप
दिखलाये ।