नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवम अध्याय
( हस्ताभिनय )
१-२ हस्त आदि शरीर अवयवों का कर्म इस अध्याय का प्रतिपाद्य
है। यहाँ ( २ ) कारिका अर्थ होगा इन अंगों का उपयोग या योजना जिससे
हो वह 'विनियोग' कहलाता है। जैसे पताक हस्त का अग्निधारा ( ज्वाला )
के दर्शनार्थ प्रयोग करना। इसी प्रकार 'तत्वतः' शब्द का आशय है नाट्य-
वस्तु के अनुसार या अनुरूप ।
३. हस्त आदि कर्मों की पीठिका बतलाते हुए उनके ठीक उपयुक्त
अभिनयादि का विवरण देने की मुनि उद्देश्य कथनार्थ सूचना देते हैं।
अभिनवगुप्तपाद ने कारिकास्थ अभिनय की इति कर्तव्यता पर विचार
किया। अभिनय की इस इतिकर्तव्यता के आरम्भ में दो प्रभेद होते हैं—
लोकधर्मी तथा नाट्यधर्मी। इनमें प्रथम ( लोकधर्मी ) इतिकर्तव्यता के भी
दो प्रभेद हो जाते हैं। जैसे निर्वेद प्रभृति चित्तवृत्तियों ( भावों ) को व्यक्त
करने वाले अनुभावों की इतिकर्तव्यता—जैसे गर्व के अभिनय में पताक
हस्त को ललाट पर उठाते हुए स्थित करना। दूसरी है केवल बाह्य-अवयव-
गत इतिकर्तव्यता—जैसे पद्मकोश हस्त के द्वारा किसी पदार्थ को दिखलाने
का कार्य। इन सभी का नाट्य में प्रयोग होता है। हस्तमुद्राओं के विषय
में विस्तार से भरतमुनि ने सभी तथ्यों को दिखलाया है जिनका यथावसर
आगे आशय स्पष्ट किया जाएगा ।
४-७. आङ्गिक अभिनय में हस्ताभिनय का महत्व अतिशय एवं सर्वोपरि
है। इसी कारण इस पर नाट्यशास्त्र में एक स्वतन्त्र अध्याय ही रखा गया है।
यही वह माध्यम है जो आन्तरिक भावों को स्वरूप प्रदान कर उन्हें रसभूमि
तक पहुँचाता है। अतएव प्रत्येक मुद्रा अपने मूल में भाव तथा रस की प्रेरणा
लिये रहती है तथा हस्ताभिनय का विशिष्ट आधार लेकर प्रस्तुत नाट्य-
प्रयोग को सफल बनाती है। इसी कारण भरतमुनि ने हस्तमुद्राओं का विशद
विवरण दिया है। असंयुत हस्तों के चौबीस प्रभेद होते हैं जिनका भरतमुनि
ने यहाँ उल्लेख किया। आचार्य नन्दिकेश्वर ने अभिनय दर्पण में असंयुत
हस्त मुद्राएँ २८ बतलाई हैं। इनके स्वरूप तथा इनकी योजना आदि के
विशिष्ट तत्वों को यथास्थान हम यहाँ संक्षेप में देने का उद्योग करेंगे जहाँ