नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः ३७३
१वर्जितं काव्यदोषैस्तु लक्षणाढ्यं गुणान्वितम् ।
स्वरालङ्कारसंयुक्तं पठेत् २पाठ्यं यथाविधिः ॥ ७५ ॥
जिस काव्य रचना का अभिनेता द्वारा मंच पर पाठ किया जाए वह
काव्य के दोषों से युक्त नहीं रहना चाहिए, वह लक्षण तथा गुणों से और
स्वर तथा अलंकारों से युक्त ही होना चाहिए ॥ ७५ ॥
३अलङ्कारा विरामाश्च ये पाठ्ये संस्कृते मताः ।
त४ एव सर्वे कर्तव्याः स्त्रीणां पाठ्ये त्वसंस्कृते ॥ ७६ ॥
संस्कृत पाठ्य के लिए जिन अलंकार तथा विरामों को हमने बतलाया
स्त्री पात्रों के द्वारा कहे जाने वाले प्राकृत पाठ्य में भी उन्हीं का अनुसरण
किया जाए ॥ ७६ ॥
एवमेतत्स्वरकृतं५ कलाकाललयान्वितम् ।
दशरूपविधाने तु पाठ्यं योज्यं प्रयोक्तृभिः ॥ ७७ ॥
नाट्यप्रयोक्ता या निर्देशक दश रूपकों को मंच पर प्रदर्शित करने के
अवसर पर इन पाठ्य संवादों को उचित प्रकार से स्वर, कला, ताल और
लय से युक्त रखकर विचारपूर्वक प्रस्तुत करे ॥ ७७ ॥
६उक्तं काकुविधानन्तु यथावदनुपूर्वशः ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दशरूपविकल्पनम् ॥ ७८ ॥
॥ इति भारतीये नाट्यशास्त्रे वागभिनये काकुस्वरव्यञ्जनो नाम
७एकोनविंशोऽध्यायः ॥
इस प्रकार मैंने उचित प्रकार से क्रमशः काकु स्वर आदि के विषय में
१. व्यपेतं वाक्यशेषैस्तु—ग० । २. काव्यं—ख० ।
३. अलङ्कारविशेषा ये पाठ्यसंस्कृतसंश्रयाः—ख०; ग० ।
४. ते सर्वे सम्प्रकर्त्तव्याः स्त्रीणां पाठघे तु संस्कृते ।—ख०; ग० ।
५. युतं—ख०; ग० । ६. ताल—ख०; ग० ।
७. यथा—ख० ।
८. सप्तदशोऽध्यायः—क०; ख० ।