नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय २ ३८३
जल से भरे मेघ, वन, वस्तु के निषेध, कुचस्थल, रात्रि, नदी, स्वर्गलोक,
अश्व, वस्तु के विभाजन, वायु की गति, शयन, जाने के लिये प्रयत्न करना,
साहस, प्रसन्नता, चाँदनी, कड़ीधूप, दरवाजा खोलना, लहरें, सातों
विभक्तियों का संकेत, मार्गगमन, समानता, अंगराग का सेवन या रचना करना,
आत्म-प्रकाश, शपथ-ग्रहण, चित्त को शान्तरूप में रखना, तालयन्त्र, ढाल,
तरल वस्तु का स्पर्श करना, आशीर्वाद, राजरुचि का प्रदर्शन, 'यहाँ' 'वहाँ'
का कथन, समुद्र, दान या पुण्य करना, सम्बोधन, आगे बढ़ना, तलवार
रखना, सम्मार्जनी से सफाई करना तथा मास, दिन और वर्ष को दर्शाने
जैसे भावों में भी 'पताक' हस्त का प्रयोग किया जाता है (अभि० द० ९४-
१००)। 'नाट्यशास्त्रसंग्रह' में पताक हस्त की योजना इस प्रकार है—
किसी वस्तु के स्पर्श करने, किसी को चाँटा लगाने, ध्वज जैसी वस्तु को
दिखलाने या ताली बजाकर (गीतादि की) ताल देने, ऊपर उठनेवाली
ज्वालाओं को दिखलाने के लिये अंगुलियों को हिलाते हुए ऊपर उठा कर तथा
इसी प्रकार उँगलियों को नीचे की ओर रख कर 'पताक' हस्त को आन्दोलित
कर जलधारा या पानी की लहर या तरल पदार्थ को दिखलाया जाता है।
कटिप्रदेश पर 'पताक' हस्त रख कर पक्षियों के पक्षों को दिखलाया जाता
है, 'पताक' हस्त को ऊपर उठाकर किसी पदार्थ की ऊँचाई पर स्थिति
दिखलाई जाती है तथा नीचे कर (एक दूसरे के सम्मुख) आन्दोलित करते
हुए 'मृदंगवादन' दिखलाया जाता है, किसी पदार्थ के ऊपर उठाने या फेंकने
को दर्शाने के लिये कटि प्रदेश से 'पताक' हस्त को ऊपर उठाया जाता
है। अपने मुख के सामने पताक हस्त को सामने की बाजू से उठाकर रखते
हुए किसी मनुष्य या पदार्थ को जो वक्ता का सामना कर रहा हो दिखलाया
जाता है तथा पताक को एक ओर रखकर हिलाते हुए किसी वस्तु या कार्य
का निषेध दिखलाया जाता है। पताक हस्त को एक दूसरे से शीघ्रता
से रगड़ते हुए रख कर तथा एक दूसरे के ऊपर रख कर किसी वस्तु का
प्रक्षालन या धोना दर्शाया जाता है तथा सामने की ओर धीरे-धीरे घर्षण
कर इसी मुद्रा के द्वारा किसी वस्तु का साफ करना या पीटना बतलाया
जाता है। इसी प्रकार पताक हस्त को एक दूसरे के ठीक सामने रख कर
फिर उन्हें दूर हटाकर किसी शिला के उखाड़ने या किसी भारी (वजनदार)
वस्तु को उठाने का कार्य दिखलाया जाता है। इसी प्रकार पताक हस्त को
ऊपर उठा कर अंगुलियों को हिलाते हुए रखकर इसके द्वारा वायु तथा लहरों
के वेग को दिखलाया जाता है (द्रष्ट ना० शा० सं०-का० ६६-१०५)।