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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 487

३७६ नाट्यशास्त्र
"सर्वत्राभिनयो भवेत् ।
काव्यबद्धं विभावादि व्यञ्जयन् यो नटे स्थितः ।
सामाजिकानां जनयन्निर्विघ्नां रससंविदम् ॥" (सं. र. ७।१८, १६)
[ अर्थात् जो काव्य में निबद्ध विभावादि को अभिव्यंजित करते हुए
सामाजिकों में बिना किसी विघ्न या रुकावट के रससंविद् की उत्पत्ति करते
हुए अवस्थित हो जाता है—वही अभिनय कहलाता है ]
७. दर्शकों के सम्मुख होने वाला नाट्यगत पात्रों की मानसिक तथा
शारीरिक स्थितियों का अनुकरण 'अभिनय' कहलाता है। यहाँ शाखा, अङ्ग
तथा उपाङ्ग शब्द से आगे व्याख्यान में शरीर के विभिन्न अङ्गों के द्वारा
सम्पन्न होने वाले अभिनय का विवरण देने का संकेत भी किया गया है।
क्योंकि दर्शकों के समक्ष नाट्य प्रयोगगत रंजक तत्वों को प्रकट कर रसानुभूति
का साधक हो जाता है !
८-९. भरतमुनि ने नाट्याश्रित अभिनय के (इस कारिका में)
उद्देश्य क्रम द्वारा चारों भेद दिखलाकर उनको नाट्य का साधन उसी के
सहारे नाट्य की स्थिति (होनी) दिखलायी है । अभिनय कला की रसाभि-
व्यञ्जकता को पूर्णरूप से हृदयंगम करने के लिये अभिनय के भेदोपभेदों
का समग्ररूप में ज्ञान अपेक्षित होता है । प्राचीन नाट्य एक अतिशय उन्नत
ललितकलाओं का रूप था जिसकी आङ्गिक चेष्टाएँ नृत्य के सन्निकट तर
होती थी । अभिनेतृगण के अंग संचालन लयात्मकता के साथ होते थे तथा
इसी कारण उनसे सौन्दर्य की भी पर्याप्त अभिव्यञ्जना हो जाती थी और
रस की भी ।
१०. भावों के अध्याय (ना० शा० अध्याय ७) में सात्विक भावों का
विवरण दिया जा चुका है अतः उनके साथ रखा जाने वाला अभिनय
सात्विक अभिनय कहलाता है। स्वरभेदादि अनुभावों का प्रदर्शन ही सात्विक
अभिनय कहलाता है । जिसका लक्षण है—'सात्विकः स्वरभेदादेः अनुभावस्य
दर्शनम्' । (इसका आवश्यक विवेचन प्रस्तावना में तथा नाट्यशास्त्र तृतीय
भाग अध्याय २२ तथा २३ पर दृष्टव्य ) ।
११. अंगाभिनय के तीन प्रभेद मुनि ने बतला कर अभिनय निरूपण
का विवरण विस्तार से देना आरम्भ किया । सर्वप्रथम मुनि ने शारीर ( या
आङ्गिक ) अभिनय के तीन भेद किये । 'शारीर' अभिनय शाखा, अंग,