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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 479, कुल 668 में से

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पृष्ठ 479

३६८ नाट्यशास्त्रम्
सुरसा प्रयोजयेत् पाठ्यमिति । १मन्द्रात्तारं न गच्छेत् ताराद्वा
मन्द्रमिति ।
इन सभी अंगों का मन्द्र, मध्य एवं तार स्वरों के—जिनकी तीन स्थान
से उत्पत्ति हुई है—माध्यम से प्रयोग होता है । किसी दूरस्थ पात्र को
पुकारने में तार स्वर का—जो मूर्ध स्थान से उत्पन्न होता है—प्रयोग करना
चाहिए । जो पात्र अधिक दूर पर न हो उसे बुलाने में—कण्ठ स्थान से
उत्पन्न होने वाले, मध्य स्वर का प्रयोग करना चाहिए । तथा किसी समीप
स्थित पात्र से वार्तालाप करने में वक्षःस्थल से उत्पन्न होने वाले मन्द्र स्वर
का प्रयोग करना चाहिए । ( कभी भी ) मन्द्र स्वर से ( एकदम ) तार स्वर
या तार स्वर से मन्द्र स्वर पर नहीं पहुँच जाना चाहिए ।
एषाञ्च२ द्रुतमध्यविलम्बितास्त्रयो लया ३रसेषूपपाद्याः । तत्र
हास्यशृङ्गारयोर्मध्यलयः, ४करुणे विलम्बितो, वीररौद्राद्भुतबीभत्स-५
भयानकेषु द्रुत इति ।
इन स्वरों की तीन प्रकार की लय का भी विभिन्न रसों में उपयोग
किया जाता है । हास्य तथा शृङ्गार रस में मध्यलय, करुण में विलम्बित
लय तथा वीर, रौद्र, अद्भुत, बीभत्स और भयानक रस में द्रुत लय का
प्रयोग करना चाहिए ।
विराम और उसका लक्षण—
अथ विरामः—अर्थसमाप्तौ कार्यवशाच्च छन्दोवशात् । कस्मात् ?
दृश्यन्ते ह्येकद्वित्रिचतुरक्षरा विरामाः । यथा—
अब 'विराम' बतलाता हूँ । जिसका 'पाठ्य' में उपयोग होता है । यह
(विराम) अर्थ की समाप्ति ( या वाक्य के पूर्ण हो जाने ) के कारण या
फिर परिस्थिति पर निर्भर करता है । केवल छन्द के लक्षण पर ही विराम
नहीं किया जाता है । क्योंकि व्यवहार में यह पाया जाता है कि एक, दो,
तीन या चार अक्षरों पर भी विराम होता है—जैसे निम्न पद्य में—
किं, गच्छ, मा विश, सुदुर्जन, वारितोऽसि६
कार्यं, त्वया न, मम सर्वजनोपभुक्तम्७ ।
१. मन्द्रात्तारं गच्छेत्—ख०; मन्द्रात्तारं गच्छेत्ताराद्वा मन्द्रमिति—ग० ।
२. अत्र च—क० । ३. पूपयोज्याः—क० ।
४. करुणे च—क० । ५. बीभत्सकरुणयोर्विलम्बितः—क० ।
६. कारितोऽसि—क० । ७. युक्तम्—क० ।