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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 478

एकोनविंशोऽध्यायः ३६७
अब (उच्चारण के) छः अंग बतलाते हैं—ये हैं—(१) विच्छेद,
(२) अर्पण, (३) विसर्ग, (४) अनुबन्ध, (५) दीपन तथा (६) प्रशमन।
इनमें विराम के कारण होने वाला (अंग) 'विच्छेद' कहलाता है।
(जिसका आगे विशद विवेचन दिया जा रहा है)।
लीला या सौकुमार्य से पूर्ण स्वरों में प्रेक्षागृह को भरते हुए जिस
शब्दावली का पाठ किया जाए उसे 'अर्पण' कहते हैं। वाक्य का पूर्ण करना
'विसर्ग' कहलाता है। दो अथवा अधिक पदों (शब्दों) के बीच विच्छेद
न करना या उनके उच्चारण की दशा में सांस का न टूटना 'अनुबन्ध'
कहलाता है। जो स्वर तीनों (उरः, कंठ, मस्तक) स्थान से उच्चारित
होकर क्रमशः बढ़ता जाए तो 'दीपन' कहलाता है। ऊंचे चढ़ाए हुए स्वरों
को धीरे-धीरे नीचे की ओर बिना वैस्वर्य के लाना 'प्रशमन' कहलाता है।
^१एषाञ्च रसगतः प्रयोगः— तत्र हास्यशृङ्गारयोराकाङ्क्षायामर्पण-
विच्छेददीपनप्रशमनयुक्तं पाठ्यं^२ कार्यम्। दीपनप्रशमनयुक्तं करुणे^३।
विच्छेदप्रशमनदीपनानुबन्धबहुलं वीररौद्राद्भुतेषु, ^४विसर्गविच्छेद-
युक्तं बीभत्सभयानकयोरिति।
अब उनके विभिन्न रसों में होने वाले प्रयोग बतलाता हूं। हास्य और
शृङ्गार रस में पाठ्य को अर्पण, विच्छेद, दीपन और प्रशमन नामक अंगों
से युक्त रखना चाहिए। करुण रस में दीपन और प्रशमन (अंगों) से युक्त
रखा जाए। वीर, रौद्र तथा अद्भुत रसों में विच्छेद, प्रशमन, अर्पण, दीपन
तथा अनुबन्ध युक्त पाठ्य रहना चाहिए। बीभत्स और भयानक रस में
विसर्ग, विच्छेद (अर्पण) युक्त पाठ्य रखना चाहिए।
सर्वेषामप्येषां^५ ^६मन्द्रमध्यतारकृतः प्रयोगस्त्रिस्थानगतः। तत्र
दूरस्थाभाषणे तारं^७ शिरसा, नातिदूरं मध्यं कण्ठेन, पार्श्वतो मन्द्र-
१. एषां रस—क०। २. वाक्यं—ग०।
३. करुणवीराद्भुतेषु समाकाङ्क्षविच्छेदप्रशमनार्पणदीपनानुबन्धबहुलं पाठ्यं
प्रयोज्यम्—ख०; ग०।
४. बीभत्सभयानकयोर्विच्छेदार्पणयुक्तमिति—ख०; ग०।
५. चैतेषां—ख०; ग०।
६. मध्यतारव्यवस्थया त्रिस्थानगतः प्रयोगः—ख०; ग०।
७. तारशिरसो—ग०।