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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 486, कुल 668 में से

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पृष्ठ 486

परिशिष्ट
( नाट्यशास्त्र : अध्याय ८-१९ )
अतिरिक्त टिप्पणियाँ
अष्टम अध्याय
( उपाङ्गविधान )
( संकेत—टिप्पणियों के आरम्भ में दी गयी संख्या अध्यायगत
श्लोकों की है । )
१-३. यहाँ ऋषिगण ने रस तथा भावों के विवरण के प्राप्त हो जाने
पर रसानुभूति के साधन एवं काव्यार्थ को हृदय तक ले जाने वाले 'अभिनय'
के विषय में भरतमुनि से प्रश्न किया जो इस अध्याय की संगति को
दिखलाते हुए 'अभिनय' के विवरण को आरम्भ करने के लिये ( प्रश्न रूप
में आधार बनाकर उपस्थापित ) किया गया है। प्रेक्षकों के लिये नाट्य-
प्रयोग का उपस्थापन 'अभिनय' ही करता है जो दृश्यमानता के साथ नाट्यगत
पात्रों की शारीरिक एवं मानसी स्थितियों का अनुकरण होकर दृश्यमान
होता हो ।
४-५. महामुनि ने ऋषियों को आरम्भ में अभिनय के चारों प्रभेदों को
बतला कर फिर अभिनय के स्वरूपादि का विवरण देना आरम्भ किया।
इस प्रकार प्रश्न के अनुरूप ही समग्र एवं साङ्ग अभिनय का स्वरूप दिखलाने
की प्रतिज्ञा के साथ साथ अभिनय शब्द की यौगिकी व्याख्या तथा स्वरूप
को भी मुनि ने दर्शाया।
६. अभिनय का उपयोग नाट्यप्रयोग के लिये होता है इसी कारण इस
प्रयोगात्मा विज्ञान को 'अभिनय' संज्ञा प्रदान की गयी है। अभिनय काव्यार्थ
को दृश्यमानता देता है या यह उन्हें रूपायित करने का एक प्रकार है जिससे
सामाजिक रसानुभव प्राप्त कर सकें। इस प्रकार इस अनुकृतिपरक तत्व
के साथ सौन्दर्यवत्ता भी लगी हुई है, क्योंकि इसके बिना परमध्येय 'रसवत्ता'
सम्भव नहीं है। इसी कारण रस भाव को व्यञ्जित करने वाली शरीरादि
चेष्टाओं को अभिनय संज्ञा दी गयी है। संगीत रत्नाकर ने अभिनय का
स्वरूप इस प्रकार दिया है :—