नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
एकोनविंशोऽध्यायः ३५३
सभी स्त्रियों को यौवन में अपने पति को 'आर्यपुत्र' शब्द से सम्बोधित
करना चाहिए। परन्तु कुछ अवस्थाओं में पति को केवल 'आर्य' शब्द से भी
सम्बोधित किया जा सकता है। यदि पति राजा हो तो उसे महारानी द्वारा
'महाराज' शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ १९ ॥
आर्येति पूर्वजो भ्राता वाच्यः पुत्र इवानुजः¹।
पुरुषाभाषणं ह्येवं कार्यं नाट्ये प्रयोक्तृभिः ॥ २० ॥
बड़े भाई को 'आर्य' शब्द से तथा छोटे भाई को अपने पुत्र के समान
उपयुक्त शब्द द्वारा सम्बोधित करना चाहिए । पुरुष पात्रों के द्वारा नाटकों
में सम्बोधन का यही विधान है ॥ २० ॥
पुनः स्त्रीणां ²प्रवक्ष्यामि यथाभाष्यास्तु नाटके ।
तपस्विन्यो देवताश्च वाच्या भगवतीति च ॥ २१ ॥
अब मैं स्त्रियों के द्वारा स्त्रियों के प्रति नाटक में किये जाने वाले
सम्बोधन शब्द बतलाता हूँ। तपस्वी स्त्रियाँ तथा देवी को 'भगवती' शब्द से
सम्बोधित किया जाए ॥ २१ ॥
³गुरुभार्या तु वक्तव्या स्थानीया भवतीति च ।
पूज्य गुरुजन की पत्नियों या अन्य ज्येष्ठावस्था की स्त्रियों ( स्थानीय )
को 'भवती' शब्द से सम्बोधित किया जाए ।
ग्राम्या⁴ च भद्रेति वाच्या⁵ वै ⁶वृद्धाम्बेति च नाटके ॥ २२ ॥
पहुंच या भेंट के उपयुक्त ग्रामीण स्त्री ( ग्राम्या ) को 'भद्रे' तथा बूढ़ी
स्त्री को 'अम्बा' ( माता शब्द से भी ) शब्द से सम्बोधित करना
चाहिए ॥ २२ ॥
महारानी के प्रति सम्बोधन शब्द—
⁷राजपत्नस्तु सम्भाष्याः सर्वाः परिजनेन वै ।
भट्टिनी स्वामिनी ⁸देवीत्येवं वै नाटके बुधैः ॥ २३ ॥
१. अस्मादनन्तरं—योषिद्भिरथ काम्येति राजपुत्रेति योधनैः । इति
पद्यार्धमधिकं क—पुस्तके दृश्यते ।
२. स्त्रीणाञ्च वक्ष्यामि संभाषां नाटकाश्रयाम्—ग० ।
३. गुरुरायेति—क० । ४. गम्या—क० ।
५. वक्तव्या—ख०; ग० । ६. वृद्धा वाच्येति नाटके—ग० ।
७. राजपुत्र्यस्तु—क०; राजपत्न्यश्च—ग० ।
८. स्वामिनीत्येवं सर्वदा—क०; देवी इत्येवं—ख०; ग० ।
२३ ना० शा० द्वि०
३५४ नाट्यशास्त्रम्
नाटक में राज पत्नियों को सेवक तथा परिचारिकाओं के द्वारा भट्टिनी,
स्वामिनी तथा देवी शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ २३ ॥
देवीति महिषी वाच्या राज्ञा परिजनेन वा ।
भोगिन्यः १परिशिष्टास्तु स्वामिन्य इति वा पुनः ॥ २४ ॥
इनमें पटरानी को 'देवी' शब्द से परिजन तथा राजा के द्वारा भी
सम्बोधित किया जाए । राजा की शेष पत्नियों को परिजन 'भट्टिनी' या
'स्वामिनी' शब्द से सम्बोधित करे ॥ २४ ॥
राजकुमारियों के लिये सम्बोधन—
२कुमार्य्यश्चैव वक्तव्याः प्रेष्याभिर्भर्तृदारिकाः ।
अविवाहित राजकुमारियों को (उनकी) दासियां 'भर्तृदारिका' शब्द से
सम्बोधित करें ।
स्वसेति भगिनी वाच्या ३वत्सेति च यवीयसी ॥ २५ ॥
बड़ी बहिन को 'भगिनी' तथा छोटी बहिन को 'वत्से' शब्द से
सम्बोधित करना चाहिए ॥ २५ ॥
ब्राह्मणी, भिक्षुणी, आदि के सम्बोधन शब्द—
ब्राह्मण्यार्येति वक्तव्या लिङ्गस्था व्रतिनी च या ।
ब्राह्मणी, साधुनी या व्रतधारिणी स्त्री को 'आर्या' शब्द से सम्बोधित
करना चाहिए ।
पत्नी के प्रति सम्बोधन शब्द—
पत्नी चार्येति सम्भाष्या ४पितृनाम्ना सुतस्य वा५ ॥ २६ ॥
अपनी धर्मपत्नी को 'आर्या' शब्द से या पिता और पुत्र के नाम से
सम्बद्ध करते हुए शब्दों से सम्बोधित किया जाए ॥ २६ ॥
स्त्रियों के अपनी सखियों के प्रति सम्बोधन—
समानाभिस्तथा सख्यः६ हलेति स्यात् परस्परम् ।
१. भट्टिन्यः इति शेषास्तु— ख०; ग० ।
२. पद्यार्धमेतत् ख० ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।
३. ज्येष्ठा वत्सेति चानुजा—ख०; ग० ।
४. पितुर्नाम्ना—ख०; ग० । ५. सा—ख०; ग० ।
६. सख्यो हला भाष्याः परस्परम्—ख०; ग० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३५५
स्त्रियों की जो हमजोल या समवयस्का सखियाँ हों उन्हें वे परस्पर
'हला' शब्द से सम्बोधित करें।
स्त्रियों के दासी के प्रति सम्बोधन शब्द—
प्रेष्या हञ्जेति वक्तव्या स्त्रिया¹ यत्तूत्तमा भवेत् ॥ २७ ॥
उत्तम स्त्रियों के द्वारा सेविका या दासी को 'हंजे' शब्द से सम्बोधित
करना चाहिए ॥ २७ ॥
वेश्या के प्रति सम्बोधन शब्द—
अज्जुकेति च² वक्तव्या वेश्या परिजनेन च ।
³अत्तेति गणिकामाता वाच्या ⁴परिजनेन हि ॥ २८ ॥
वेश्या को उसके परिचारक, सेवक आदि के द्वारा 'अज्जुका' शब्द से
सम्बोधित किया जाए और जब यही वृद्धा हो तो 'अत्ता' शब्द से सम्बोधित
करना चाहिए ॥ २८ ॥
प्रणयावस्था में पत्नी के लिये सम्बोधन शब्द—
प्रियेति भार्या शृङ्गारे वाच्या राज्ञेतरेण वा ।
पुरोधः सार्थवाहानां ⁵भार्यास्त्वार्येति सर्वदा ॥ २९ ॥
प्रणयावस्था में राजा के अतिरिक्त सभी पुरुष पत्नी को 'प्रिये' शब्द से
सम्बोधित करें परन्तु पुरोहित और सार्थवाह की पत्नी को सदा 'आर्ये'
शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ २९ ॥
नाटक में पात्रों के नाम एवं उनकी विधि—
⁶तल्लिङ्गार्थानि नामानि कार्याणि कविभिः सदा⁷।
औत्पत्तिकानि यानि ⁸स्युरप्रख्यातानि नाटके ॥ ३० ॥
नाट्यकार को नाटक में अप्रख्यात पात्रों के ऐसे नाम जो कल्पित हों तो
वे उनके गुण आदि से सम्बद्ध यौगिक रूप में ही रखना चाहिए ॥ ३० ॥
१. स्त्रियो या तूत्तमा—ख०; ग० ।
२. भवेद्वाच्या—ख०; भवेद्वेश्या वाच्या परिजनेन तु—ग० ।
३. या त्वत्र वृद्धा सा त्वत्ता भाष्या परिजनेन तु—क० ग० ।
४. नाट्यजनेन—ख०; ग० । ५. नार्यस्त्वार्येति—ग० ।
६. तच्चिप्सार्थानि—क०; तल्लिङ्गस्थानि—ग० ।
७. द्विजाः—क०; ख० ।
८. स्युनं प्रत्याख्याति क; न प्रत्याख्यानि—ख०; ग० ।
३५६ नाट्यशास्त्रम्
ब्राह्मण तथा क्षत्रिय पात्र के नाम—
'ब्रह्मक्षत्रस्य नामानि 'गोत्रकर्मानुरूपतः ।
काव्ये कार्याणि कविभिः 'शर्मवर्मकृतानि हि ॥ ३१ ॥
इनमें भी ब्राह्मण तथा क्षत्रिय पात्रों के नाम उनके गोत्र तथा कर्म के
अनुरूप रखे जाएँ तथा उनके अन्त में शर्मन् या वर्मन् शब्द को रखा
जाए ॥ ३१ ॥
वैश्य तथा शूरों के नाम—
दत्तप्रायाणि नामानि वणिजां 'सम्प्रयोजयेत् ।
शौर्योदात्तानि नामानि तथा शूरेषु ' योजयेत् ॥ ३२ ॥
वैश्य पात्र के नाम 'दत्त' शब्द से युक्त और शूरों के नाम उनके शौर्य,
औदार्य आदि गुणों के सूचक रहने चाहिए ॥ ३२ ॥
रानियों तथा वेश्या के नाम—
विजयार्थानि नामानि 'राजस्त्रीणाञ्च नित्यशः ।
दत्ता' मित्रा च सेना च वेश्यानामानि' योजयेत् ॥ ३३ ॥
राज-पत्नियों के नाम विजय परक अर्थ के सूचक रखने चाहिए तथा
वेश्याओं के नाम दत्ता, मित्रा तथा सेना शब्दान्त रखे जाएं ॥ ३३ ॥
दासी (प्रेष्या) के नाम—
नाना कुसुमनामानः प्रेष्याः कार्यास्तु नाटके ।
नाटक में प्रेष्याओं (दासियों) के नाम विविध पुष्पों पर रखे जाएं ।
चेट के नाम—
मङ्गलार्थानि नामानि चेटानामपि योजयेत् ' ॥ ३४ ॥
'चेट' (आदि) के नाम मंगलार्थ को लिए हुए रखे जाएं ॥ ३४ ॥
१. ब्राह्मक्षत्रस्य—ग० । २. धर्मकर्मा—क० ।
३. शमंवर्मेति तानि हि—क० । ४. शर्मवर्मेति तानि हि—क० ।
५. अस्मादनन्तरं—कापालिकास्तु घण्टान्तनामानः समुदाहृताः ।' इति
पद्यार्धमधिकं प्रक्षिप्तञ्च क—पुस्तके वर्तते ।
६. शूरै प्रयोजयेत्—क० ।
७. राजस्त्रीणाञ्च कारयेत्—ख; राज्ञां स्त्रीणाञ्च कारयेत्—ग० ।
८. दत्तां मित्राञ्च सेनाञ्च—क० ।
९. वेश्यामित्राणि कारयेत्—क० । १०. कारयेत्—ग० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३५७
उत्तम पात्रों के नाम—
गम्भीरार्थानि नामानि १ह्युत्तमानां प्रयोजयेत् ।
२यस्मान्नामानुसदृशं कर्म तेषां भविष्यति ॥ ३५ ॥
उत्तम पात्रों के नाम किसी गम्भीर अर्थ के सूचक रखे जाए क्योंकि
उनके कार्य उनके नाम के अनुरूप ही नाटकादि में रहते हैं ॥ ३५ ॥
अन्य पात्रों के नाम—
जातिचेष्टानुरूपाणि शेषाणामपि ३योजयेत् ।
नामानि पुरुषाणाञ्च ४ स्त्रीणाञ्चोक्तानि तत्त्वतः ॥ ३६ ॥
एवं ५नामविधानन्तु कर्तव्यं कविभिः६ सदा ।
( इसके अतिरिक्त ) शेष पात्रों के नाम उनके जन्म, जाति तथा कार्य
के अनुसार रखना चाहिए ।
इस प्रकार स्त्री तथा पुरुषों के नाटक में रहने वाले नामों का मैंने
औचित्यपूर्ण वर्णन कर दिया ।
नाट्यकार को अपनी रचना में इसी विधान के अनुसार पात्रों के नाम१
रखने चाहिए ॥ ३६-३७ ॥
एवं ७भाषाविधानन्तु ज्ञात्वा कर्माण्यशेषतः८ ॥ ३७ ॥
ततः पाठ्यं प्रयुञ्जीत ९षडलङ्कारसंयुतम्१० ।
१. यद्यपि नाट्य शास्त्र में सम्बोधन एवं नाम रखने के विविध नियम
बतलाए परन्तु इनके अनुसार सम्बोधन वर्तमान नाट्यरचनाओं में
उपलब्ध नहीं होते । इससे प्रतीत होता है कि नाट्यशास्त्रीय अध्ययन
या प्राचीन शास्त्रीय परिपाटी की शिथिलता ही इसमें मूलभूत कारण
हुई । यह भी हो सकता है कि इन नियमों की अधिक अपेक्षा न रहने
के कारण ही शायद उपेक्षा की गई हो ।
१. योजयेदुत्तमेषु च—ख०; ग० । २. कस्मान्नामानु—क० ।
३. कारयेत्—ख०; ग० । ४. पुरुषाणान्तु—ख०; ग० ।
५. नामाभिधानन्तु—ग० । ६. कविभिस्त्वथ—ग० ।
७. भाषाविधानानि-क०; भाषाविधानादि ज्ञात्वा सर्वमशेषतः — ख०; ग० ।
८. पद्यार्धस्यास्य पाठान्तरं क—( भ. ) पुस्तके—'भाषाविधानं विज्ञेयं
ततः प्रकृतिसम्भवम् ।' इति ।
९. संश्रयम् — क० ।
१०. ततः पाठचस्य वक्ष्यामि गुणांश्च द्विजसत्तमाः । स्वरै षड्जादिभिर्युक्तं
नानारससमन्वितम् । क० ( ? )
३५८ नाट्यशास्त्रम्
इस प्रकार विस्तारपूर्वक भाषा विधान आदि को ठीक तरह से
जानकर नाट्यकार को छः अलंकारों से युक्त 'पाठ्य' की योजना करनी
चाहिए ॥ ३७-३८ ॥
पाठ्य के गुण एवं स्वरूप—
पाठ्यगुणानिदानीं वक्ष्यामः । तद्यथा—सप्तस्वराः, त्रीणि
स्थानानि, चत्वारो वर्णाः, द्विविधा काकुः, षडलङ्काराः षडङ्गानीति ।
एषामिदानीं १लक्षणमभिव्याख्यास्यामः । तत्र सप्तस्वराः नाम-षड्ज-
र्षभ गान्धार मध्यमपञ्चम धैवत निषादाः । त एते रसेषूपपाद्याः । यथा—
अब मैं 'पाठ्य' के गुणों का वर्णन करता हूँ। इसमें सात स्वर, तीन
स्थान, चार वर्ण, दो प्रकार की काकु, छः अलंकार तथा पांच अंग होते हैं।
अब मैं क्रमशः उनके लक्षण बतलाता हूँ !
सात स्वर हैं—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत तथा
निषाद । इन स्वरों को विभिन्न रसों के अनुसार उपयुक्त एवं अनुकूल स्थिति
में रखना चाहिए ।
विभिन्न रसों के अनुकूल सात स्वर—
हास्य शृङ्गारयोः कार्यों स्वरौ मध्यमपञ्चमौ ॥ ३८ ॥
षड्जर्षभौ २तथा चैव वीररौद्राद्भुतेष्वथ ।
गान्धारश्च३ निषादश्च कर्तव्यौ करुणे रसे ॥ ३९ ॥
धैवतश्चैव कर्तव्यो बीभत्से सभयानके ।
हास्य तथा शृंगार रस में मध्यम तथा पंचम स्वर तथा वीर, रौद्र और
अद्भुत रस में षड्ज और ऋषभ स्वर रखना चाहिए। करुणरस में
गान्धार तथा निषाद और बीभत्स और भयानक रस में धैवत स्वर रखा
जाए ॥ ३८-४० ॥
स्वरों के तीन स्थान तथा उनका उपयोग—
त्रीणि४ स्थानानि—उरः कण्ठ शिरः इति । भवत्यपि५ च—
शारीर्यामथ वीणायां त्रिभ्यः स्थानेभ्य एव च ॥ ४० ॥
१. लक्षणान्यभिधास्यामः क०, स्तेषामिदानीं लक्षणान्यभिव्याख्यास्यामः ग० ।
२. च कर्तव्यो—क० ।
३. निषादश्चैव गान्धारः करुणे संविधीयते । क० ।
४. त्रीणि स्थानान्युरःकण्ठशिरांसीति भवन्त्यपि ।- ख०; ग० ।
५. भवति चात्र श्लोकः—क० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३५९
१उरसः शिरसः कण्ठात् स्वरः काकुः प्रवर्तते ।
स्वरों के तीन स्थान हैं उरस्थल, कण्ठ तथा शीर्ष । जैसे—मानव
ये शरीर में हैं उसी प्रकार वीणा में स्वर के तीन स्थान नियत होते हैं । वे
हैं—छाती, कण्ठ तथा मस्तक१ ॥ ४०-४१ ॥
आभाषणञ्च२ दूरस्थे शिरसा सम्प्रयोजयेत् ॥ ४१ ॥
३नातिदूरे च कण्ठेन ह्युरसा चैव पार्श्वतः ।
बहुत दूरी पर स्थित किसी व्यक्ति को बुलाने में शीर्षस्वर को उच्चारित
किया जाए । जो थोड़ी दूरी पर स्थित हो उसे कण्ठ-स्वर से तथा जो समीप
हो उसे छाती के स्थान से निस्सृत स्वर से बुलाया जाए ॥ ४१-४२ ॥
४उरसोदाहृतं वाक्यं शिरसा५ दीपयेद् बुधः ॥ ४२ ॥
६कण्ठेन शमनं कुर्यात् पाठ्ययोगेषु७ सर्वदा ।
पाठ्य स्वर के पाठ के समय जब किसी वाक्य को छाती के स्थान से
सस्वर प्रारंभ किया जाए तो उसे शीर्ष स्थान तक खींचना चाहिए तथा
कण्ठ स्थान पर उतारना चाहिए ॥ ४२-४३ ॥
१. स्वरों की उत्पत्ति नाद से हुई । जीवात्मा जब बोलने की इच्छा करता
करता है तो सर्व प्रथम उसे मानसिक प्रेरणा होती है । मन शरीर में
स्थित अग्नि को प्रेरित करता है अग्नि पवन को और पवन नाभि
स्थान से उठकर क्रमशः हृदय, कंठ और सिर ( शीर्ष ) में गति उत्पन्न
करते हुए अन्त में मुख द्वारा ध्वनिरूप में प्रकट होता है । इस नाभि
स्थान से उत्पन्न ध्वनि को सूक्ष्म रूप में 'नाद' कहा जाता है । इस नाद
के तीन प्रकार हैं । हृदय से उत्पन्न नाद को मन्द्र, कंठ से उत्पन्न नाद
को मध्य तथा शीर्ष में उत्पन्न नाद को तार कहते हैं । यहां इसी आशय
से स्वरों के स्थानों का शास्त्रकार द्वारा निर्देश किया गया है ।
१. उरसा शिरसा—क० ।
२. आभाषणं तु दूरस्थं शिरस्थेन स्वरेण हि । कण्ठेन नातिदूरे स्यादुरसा
चैव—क० ।
३. नातिदूरे च कण्ठे च ह्युरसा च समीपतः ।—ख०; नातिदूरेऽपि कण्ठना-
ध्युरसा चापि पार्श्वतः—ग० ।
४. उरसोदाहरेद्—क० । ५. शिरसोद्दीपयेद्—ख० ।
६. कण्ठेन शमयेच्चैव—क० । ७. योगे तु नित्यशः—क० ।
३६० नाट्यशास्त्रम्
चार वर्ण तथा उनका व्यवहार—
उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितः कम्पितस्तथा।
वर्णाश्चत्वार एव स्युः पाठ्ययोगे तपोधनाः ॥ ४३ ॥
पाठ्य पाठ में चार स्वर ( उच्चारण स्थान ) होते हैं। यथा—उदात्त,
अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित ॥ ४३ ॥
तत्र हास्यशृङ्गारयोः स्वरितोदात्तैः,१ वीररौद्राद्भुतेषूदात्तकम्पितैः,२
करुणबीभत्सभयानकेष्वनुदात्तस्वरितकम्पितैरिति ३।
हास्य तथा शृङ्गार रस में स्वरित और उदात्त स्वर, वीर, रौद्र तथा
अद्भुत रसों में उदात्त तथा कम्पित स्वर, करुण, वात्सल्य और भयानक
रस में अनुदात्त, स्वरित और कम्पित स्वर रहने चाहिए ।
काकु के दो प्रकार—
द्विविधा काकुः—साकाङ्क्षा निराकाङ्क्षा४ चेति । वाक्यस्य साकाङ्क्ष-
निराकाङ्क्षत्वात् ।
काकु के दो प्रकार हैं—एक साकांक्ष तथा दूसरा निराकांक्ष । क्योंकि
वाक्य का आशय इन्हीं दो बातों से सम्बद्ध या इन्हीं पर निर्भर
रहता है ।
“अनियुक्तार्थकं वाक्यं साकाङ्क्षमिति संज्ञितम् ।
नियुक्तार्थन्तु यद्वाक्यं निराकाङ्क्षं तदुच्यते ॥ ४४ ॥
वह वाक्य जिसमें अपना पूर्ण रूप से अर्थ प्रकट (निर्णीत) नहीं
होता 'साकांक्ष' तथा जिसमें अपना अर्थ पूर्ण रूप से प्रकट होता हो
'निराकांक्ष' कहलाता है ॥ ४४ ॥
तत्र साकाङ्क्षं नाम—‘तारादिमन्द्रान्तमनियुक्तार्थमनिर्यार्तित-
वर्णालङ्कारं कण्ठोरःस्थलस्थानगतम् । निराकाङ्क्षं नामनियुक्तार्थं
निर्यार्तितवर्णालङ्कारं ‘शिरस्थानगतं मन्द्रादितारान्तमिति’ ।
१. स्वरितोदात्तैर्वर्णैः पाठ्यमुपपाद्यं—क० ।
२. उदात्तं कम्पितं—क० । ३. कम्पितैर्वर्णैः पाठ्यमुपाद्यम्—क० ।
४. निराकाङ्क्षेति—ख० । ५. अनियुक्तकमेकं—क० ।
६. तत्र साकाङ्क्षा नाम वाक्यं—क० । ७. अनियुक्तार्थं—क० ।
८. निराकाङ्क्षा नाम नियुक्तार्थ—क० । ९. कण्ठोरःस्थान—क० ।
१०. तारान्तं पाठ्यमिति—क; तारागतमिति—ग० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३६१
यदि किसी वाक्य के उच्चारण के समय—जिसका अर्थ पूर्ण रूप से
प्रकट न होता हो और जिसमें कंठ और वक्षःस्थल के प्रदेश से स्वर उत्पन्न
हो रहा हो, जो तार स्वर से प्रारम्भ होकर मन्द्र स्वर में समाप्त हो जाता
हो तथा वर्ण और अलंकारों की पूर्णता जिसमें न रहे तो उसे 'साकांक्ष'
काकु कहते हैं।
'निराकांक्ष' उसे कहते हैं जिसमें किसी वाक्य की उच्चारण दशा में
जिसका अर्थ पूर्ण रूप से प्रकट होता हो तथा जिसमें तार (मूर्धन्य) स्वर
से प्रारम्भ होकर मन्द्र स्वर में समाप्ति हो जाती हो और जिसमें वर्ण और
अलंकार पूर्ण रूप में विद्यमान हों। (इन वाक्यों का आश्रय लेने के कारण
'काकु' भी दो प्रकार की हो जाती है।)
छः अलंकार—
अथ षडलङ्कारा¹ नाम—
उच्चो दीप्तश्च² मन्द्रश्च नीचो³ द्रुतविलम्बितौ।
⁴पाठ्यस्यैते ह्यलङ्कारा लक्षणञ्च⁵ निबोधत॥ ४५॥
स्वरों के छः अलंकार जो पाठ्य में रहते हैं। वे हैं—(१) उच्च,
(२) दीप्त, (३) मन्द्र, (४) नीच, (५) द्रुत तथा (६) विलम्बित ॥ ४५ ॥
अलंकारों का विनियोग—
उच्चो नाम—शिरःस्थानगतस्तारस्वरः, स च दूरस्था ⁶भाषण-
विस्मयोत्तरोत्तरसञ्जल्पदूराह्वानत्रासनाबाधाद्येषु⁷।
'उच्च' स्वर उसे कहते हैं जो मूर्धस्थान से उत्पन्न हो (मूर्धन्य) और
'तार' स्वर उसे जो थोड़ी ऊँची आवाज में बोला जाता हो। इसका उपयोग
दूरस्थ व्यक्ति से संभाषण, विस्मय, परस्पर उत्तर-प्रत्युत्तर, दूरस्थ व्यक्ति को
पुकारना, त्रास तथा बाधा आदि में किया जाता है।
१. षडलङ्काराः—ख०; ग०।
२. दीप्तोऽथ,—क०।
३ नीचद्रुतविलम्बिताः—क०।
४. पाठस्यैते—क०।
५. विनिबोधत—क०।
६. विस्मयोत्तरसंजल्पनदूराह्वानबाधाद्येषु—क०।
७. बाधाक्रुष्टकलहाभिधानेषु भावेषु—क०; त्रासनार्थं वाच्येषु—ख०; ग०।
३६२ नाट्यशास्त्रम्
दीप्तो नाम—शिरःस्थानगतस्तारतरः,$^१$ स चाक्षेपकलह$^२$
$^३$विवादामर्षकुष्टाधर्षणक्रोधशौर्यदर्पतीक्ष्णरूक्षाभिधाननिर्भर्त्सनाक्रन्दि-
तादिषु$^४$।
दीप्त स्वर उसे कहते हैं जो मूर्धा स्थान से उत्पन्न हो और तारतर
अर्थात् कुछ अधिक ऊंची आवाज से उच्चारित किया जाता हो । इसका
संयोजन आक्षेप, युद्ध, कलह, विवाद ( झड़प ), अमर्ष, जोर से खींचना
( आधर्षण ), क्रोध, शौर्य, अहंकार ( दर्प ), तेज या रूखा उत्तर देना,
डांटना तथा रोना आदि के प्रसंगों में किया जाता है ।
मन्द्रो नाम—$^५$उरःस्थानगतो $^६$निर्वेदग्लानिचिन्तौत्सुक्य दैन्य-
$^७$व्याधि क्रीडागाढशस्त्रक्षतमूर्च्छामदगुह्यार्थवचनादिषु$^८$।
मन्द्रस्वर वक्षः स्थल से उत्पन्न होता है। इसकी योजना निर्वेद,
ग्लानि, शंका, चिन्ता, औत्सुक्य, दैन्य, ( आवेग ) व्याधि, ( क्रीड़ा ) शस्त्रों
के गहरे घाव, मूर्च्छा, मद तथा गूढ़ार्थक शब्दों के कहने आदि में की
जाती है ।
नीचो नाम $^९$उरःस्थानस्थो मन्द्रतरः, स च स्वभावाभाषणव्याधि-$^{१०}$
शमभ्रमार्त-त्रस्त-पतितमूर्च्छितादिषु ।
नीच स्वर वक्षःस्थल से उत्पन्न होने वाला और अत्यन्त मन्द्र (मन्द्रतर)
स्वर होता है । इसकी योजना स्वाभाविक संभाषण, व्याधि, मार्ग चलने से
थके, त्रस्त तथा व्यक्ति के गिरने, मूर्च्छित होने आदि दशा में की जाती है ।
१. शिरस्थानातिरस्कारः सच—क० ।
२. वाद—क० ।
३. दामर्षोत्कृष्टाधर्षण—ख०; ग० ।
४. दाक्रन्दनादिषु—क० ।
५. उरसि मद्रस्वरः—क० ।
६. ग्लानि शङ्काचिन्तो--क० ।
७. दैन्यव्याधिगाढ—ख०; ग० ।
८. मूर्च्छामदादिषु—ख०; ग० ।
९. तत्रैव मन्द्रतरः—क० ।
१०. भयशान्तत्रस्तपतितमूर्च्छितादिपु—क०; स्वभाषाभाषणव्याधितपथि-
श्रान्तत्रस्त—ख०; ग० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३६३
द्रुतो¹ नाम कण्ठगतः²। स च त्वरितः लल्लनमन्मन्भयशीतज्वर-³
त्रासायस्तात्ययिककार्यवेदनादिषु ।
द्रुत स्वर कंठ स्थान से शीघ्रतापूर्वक उच्चारित किया जाता है। इसकी
योजना स्त्रियों के द्वारा बालकों को सान्त्वना देने या चुप करने तथा प्रिय
के प्रस्ताव को अस्वीकृत करने में और भय, शीत, ज्वर, त्रास, आवेग, गुप्त
एवं आवश्यक या शीघ्र किये जाने वाले ( आत्ययिक ) कार्य के बतलाने
आदि में करनी चाहिए ।
विलम्बितो नाम ⁴कण्ठगतस्थानगतस्तनुमन्द्रः, स च ⁵शृङ्गार-
करुणवितर्कितविचारामर्षासूयिता⁶व्यक्तार्थप्रवादलज्जाचिन्तातर्जन⁷
विस्मयदोषानु⁸कीर्तनदीर्घरोग⁹ निपीडनादिषु ।
विलम्बित स्वर कण्ठ स्थान से उच्चारित होता है तथा थोड़ा मन्द्र
स्वरूप वाला होता है। इसका प्रयोग प्रणय (शृंगार), वितर्क, विचार,
अमर्ष, असूया, अटपटी बात कहने ( अव्यक्तार्थ-प्रवाद ), लज्जा, चिन्ता,
तर्जन, आश्चर्य ( विस्मय ), दोष कथन या निन्दा, लम्बी बीमारी तथा पीड़ा
आदि में करना चाहिए ।
अत्रानुवंश्या श्लोका भवन्ति-
¹⁰उत्तरोत्तरसञ्जल्पपरुषाक्षेपणेपु¹¹ च।
तीक्ष्णरूक्षाभिनयने ¹²आवेगे क्रन्दिते तथा ॥ ४६ ॥
¹³परोक्षस्य समाह्वाने तर्जने त्रासने तथा ।
दूरस्थाभाषणे चैव तथा निर्भर्त्सनेषु च ॥ ४७ ॥
१. ह्रस्वो नाम—ख० ।
२. कण्ठगतस्त्वरितलज्जितमन्मथभय—ख०; कण्ठगतस्खलितवेहलनमदन-
भय—ग० ।
३. वातज्वरातंत्रस्ताकार्यवेदनादिषु—ख०; शीतज्वरत्रस्तायस्तागूढ़कार्य-
वेदनादिषु—ग० ।
४. कण्ठस्थानस्थो—ख०; कण्ठस्थानगतः मन्द्रः—ग० ।
५. शृङ्गारवितर्क—ख०; शृङ्गारवितर्कित—ग० ।
६. मर्षाश्वसित—क० । ७. विस्मित—ख० ।
८. दोषानुकीर्तनेन—ख० । ९. दीर्घरोष—ग० ।
१०. संजल्पे—ख०; ग० । ११. क्षेपणे तथा—ख०; ग० ।
१२. तथाऽऽक्रन्दे च नित्यशः—क० ।
१३. परोक्षाह्वयने चैव तर्जनत्रासनेषु च—क० ।
३६४ नाट्यशास्त्रम्
१भावेष्वेतेषु नित्यं हि नानारससमाश्रया ।
उच्चा दीप्ता द्रुता चैव काकुः कार्या प्रयोक्तृभिः ॥ ४८ ॥
इस विषय में ये आनुवंश्य श्लोक हैं—
विभिन्न रस और भावों को उपयुक्त (योग्य) बनाने के लिए काकु
स्वर को उच्च, दीप्त तथा द्रुत रखना चाहिए जब कि प्रश्न और उत्तर की
झड़ी लग रही हो, कठोर वचनों में आरोप-प्रत्यारोप होते हों, तीखी और
रूखी बात चलने में, आवेग, विलाप (क्रन्दन); अप्रत्यक्ष व्यक्ति को युद्ध के
लिए ललकारने, किसी को भयभीत करने या कष्ट देने में दूर स्थित व्यक्ति
को बुलाने में तथा (किसी को) धौंस देने की अवस्था दिखलाई जा रही
हो ॥ ४६-४८ ॥
व्याधिते च ज्वरार्ते च २भयार्ते शीतविप्लुते ।
३नियमस्थे वितर्के च गाढशस्त्रक्षतेषु४ च ॥ ४९ ॥
५गुह्यार्थवचने चैव चिन्तायां तपसि स्थिते ।
मन्द्रा नीचा६ च कर्तव्या ७काकुर्नाट्यप्रयोक्तृभिः ॥ ५० ॥
जब व्याधि दशा, ज्वर, भूख, प्यास, तुच्छ व्यक्ति को देखने, नियमन,
वितर्क, शस्त्रों के गहरे घाव हो जाने, गोप्य शब्दों को वहन करने, औत्सुक्य
तथा किसी उग्र कथा के बतलाने के अवसर हो तो ऐसे अवसर पर मन्द्र
और नीच काकु स्वर को रखना चाहिए ॥ ४९-५० ॥
८लल्ले च मन्मने चैव भयार्ते शीतविप्लुते ।
मन्द्रा द्रुता च कर्तव्या काकुर्नाट्यप्रयोक्तृभिः ॥ ५१ ॥
मन्द्र और द्रुत काकु स्वर तब रखना चाहिए जब कि स्त्रियों के द्वारा
बच्चों को बहलाने पुचकारने की, प्रणय प्रस्ताव की अस्वीकृति, भय तथा
शीत के द्वारा कष्ट पाने की दशा दिखलायी जा रही हो ॥ ५१ ॥
१. एषु नानारसोपेता नित्यमर्थप्रदर्शिका—क०, सर्वेष्वेतेषु—चैव—
ख०; ग० ।
२. शोके च क्षुत्पिपासिते—क०, क्षोभे च क्षुत्पिपासिते—घ० ।
३. विषम—क० । ४. क्षते तथा—क०।
५. गूढार्थ—क० ।
६. स्थिता—क०; द्रुता—ख०; ग० ।
७. काकुः कार्या प्रयो—क० ।
८. मल्ले च मदने चैव—क० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३६५
दृष्टनष्टानुसरणे १ इष्टानिष्टश्रुते २ तथा।
३ इष्टार्थख्यापने चैव ४ चिन्ताध्याने तथैव च ॥ ५२ ॥
उन्मादेऽसूयिते ५ चैव उपालम्भे तथैव हि।
६ अव्यक्तार्थप्रवादे च कथायोगे तथैव च ॥ ५३ ॥
उत्तरोत्तरसञ्जल्पे कार्येऽतिशयसंयुते।
७ विक्षते व्याधिते क्रोधे दुःखे ८ शोके तथैव च ॥ ५४ ॥
९ विस्मयामर्षयोश्चैव प्रहर्षे १० परिदेविते।
विलम्बिता च दीप्ता च काकुर्मन्द्रा ११ च वै भवेत् १२ ॥ ५५ ॥
विलम्बित, दीप्त तथा मन्द्र काकु स्वर तब रखना चाहिए जब कि कोई
खोई हुई वस्तु दिखाई पड़े तो उसका पीछा करने, किसी अनचाहे व्यक्ति या
बात को सुनने, किसी इष्ट वस्तु को बतलाने या प्रकट करने, चिन्ताग्रस्त
होने, उन्माद, असूया, उपालम्भ जैसे कार्य अत्यन्त गुप्त बात कहने, किसी
कहानी के कहने, उत्तरोत्तर भाषण करने, अत्यन्त कार्य व्यस्त होने, किसी
शरीर के अवयव के क्षत-विक्षत हो जाने या शरीर के किसी भाग में व्याधि
उत्पन्न हो जाने और दुःख तथा शोक की दशा उत्पन्न हो, तथा विस्मय,
क्रोध, हर्ष या रुदन होता हो ॥ ५२-५५ ॥
यानि सौम्यार्थयुक्तानि १३ सुखभावकृतानि च।
मन्द्रा विलम्बिता चैव तत्र काकुर्विधीयते ॥ ५६ ॥
मन्द्र और विलम्बित काकु स्वर तब रखे जाएं जब कि शब्दावली किसी
हर्षप्रद बात को या सुखकारी वृत्त को बतलाने वाली हो ॥ ५६ ॥
१. नुसारेण — ख०; ग० । २. श्रुतो — ख०; ग० ।
३. दृष्टार्थं — क०। ४. चिन्ताग्रस्ते — ख०; चिन्तायाने — ग० ।
५. सूयने — ख० । ६. अव्यक्तार्थप्रदाने च तथा लोके — क०; ख० ।
७ विक्षते व्याधिते त्वङ्गे — ख०; ग० ।
८. दुःखशोके — ख०; ग० ।
९. अमर्षे विस्मये चैव — क० । १०. हर्षे च — ख०; ग० ।
११. मन्दा — क० । १२. अस्मादनन्तरं क—पुस्तके च—
लघ्वक्षरप्रायकृते गुर्वक्षरकृते तथा।
उच्चा दीप्ता च कर्त्तव्या काकुस्तत्र प्रयोक्तृभिः ॥
इति अधिकं लभ्यते ।
१३. सुखनादकृतानि वै — क०; सुस्वभावकृतानि च — ग० ।
३६६ नाट्यशास्त्रम्
यानि स्युस्तीक्ष्णरूक्षाणि दीप्ता चोच्चा¹ च तेष्वपि ।
एवं नानाश्रयोपेतं पाठ्यं योज्यं प्रयोक्तृभिः ॥ ५७ ॥
दीप्त तथा उच्च काकु स्वर तब रखे जाए जब कि उच्चारित शब्दों में
कुछ तीखापन या खुरदरापन (प्रकट होता) हों। इस प्रकार नाट्य निर्देशक
विविध आश्रयों से युक्त काकु-स्वरों का 'पाठ्य' में प्रयोग करें ॥ ५७ ॥
विभिन्न रसों में नियत काकु स्वर—
हास्य शृङ्गारकरुणेष्विष्टा काकुर्विलम्बिता ।
वीररौद्राद्भुतेषूच्चा दीप्ता ²वापि प्रशस्यते ॥ ५८ ॥
भयानके स बीभत्से द्रुता नीचा च कीर्तिता ।
एवं भावरसोपेता काकुः³ कार्या प्रयोक्तृभिः ॥ ५९ ॥
हास्य, शृङ्गार तथा करुण रस में 'विलम्बित' काकु स्वर और वीर,
रौद्र तथा अद्भुत रसों में 'दीप्त' काकु स्वर प्रशस्त होता है ॥ ५८ ॥
तथा भयानक और बीभत्सरस में द्रुत और नीच काकु स्वर उत्तम
होता है। इस प्रकार भाव तथा रसों के अनुकूल काकु स्वरों की उचित
प्रदेशों में योजना की जाए ॥ ५९ ॥
उच्चारण के छः अंग—
⁴अथाङ्गानि षट् —विच्छेदोऽर्पणं विसर्गोऽनुबन्धो दीपनं प्रशमन-
⁵मिति । तत्र विच्छेदो नाम ⁶विरामकृतः । अर्पणं नाम ⁷लीलायमान-
मधुरवल्गुना स्वरेण पूरयतेव रङ्गं⁸ यत् पठ्यते तदर्पणम् । विसर्गो
नाम ⁹वाक्यन्यासः । अनुबन्धो नाम ¹⁰पदान्तरेष्वपि विच्छेदः
¹¹अनुच्छ्वसनं वा । दीपनं नाम त्रिस्थानशोभि वर्धमानस्वरञ्चेति ।
प्रशमनं नाम तारगतानां स्वराणां¹² प्रशाम्यतामवैस्वर्येणावतारण-
मिति¹³ ।
१. वोच्चा—ख० । २. चापि—ग० ।
३. काकुर्योज्या—ख०; ग० । ४. अथ षडङ्गानि—क० ।
५. इति षडङ्गानि—ख०; ग० । ६. विरामः—क० ।
७. लीलावर्णस्वरूपेणापूरयदि—ख०; ग० ।
८. रसं—क० । ९. वाक्योपन्यासः—क० ।
१०. पदस्य विच्छेदमन्तरेणातुच्छ्वासनं—क०; पदान्तरेष्वविच्छेद—ग० ।
११. अनुच्छ्वननं वा—ख०; अनुइच्छ्वासनं वा—ग० ।
१२. स्वराणामेकस्वर्येण—क०; णावरोहण—ख०; णावतरणमिति—ग० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३६७
अब (उच्चारण के) छः अंग बतलाते हैं—ये हैं—(१) विच्छेद,
(२) अर्पण, (३) विसर्ग, (४) अनुबन्ध, (५) दीपन तथा (६) प्रशमन।
इनमें विराम के कारण होने वाला (अंग) 'विच्छेद' कहलाता है।
(जिसका आगे विशद विवेचन दिया जा रहा है)।
लीला या सौकुमार्य से पूर्ण स्वरों में प्रेक्षागृह को भरते हुए जिस
शब्दावली का पाठ किया जाए उसे 'अर्पण' कहते हैं। वाक्य का पूर्ण करना
'विसर्ग' कहलाता है। दो अथवा अधिक पदों (शब्दों) के बीच विच्छेद
न करना या उनके उच्चारण की दशा में सांस का न टूटना 'अनुबन्ध'
कहलाता है। जो स्वर तीनों (उरः, कंठ, मस्तक) स्थान से उच्चारित
होकर क्रमशः बढ़ता जाए तो 'दीपन' कहलाता है। ऊंचे चढ़ाए हुए स्वरों
को धीरे-धीरे नीचे की ओर बिना वैस्वर्य के लाना 'प्रशमन' कहलाता है।
^१एषाञ्च रसगतः प्रयोगः— तत्र हास्यशृङ्गारयोराकाङ्क्षायामर्पण-
विच्छेददीपनप्रशमनयुक्तं पाठ्यं^२ कार्यम्। दीपनप्रशमनयुक्तं करुणे^३।
विच्छेदप्रशमनदीपनानुबन्धबहुलं वीररौद्राद्भुतेषु, ^४विसर्गविच्छेद-
युक्तं बीभत्सभयानकयोरिति।
अब उनके विभिन्न रसों में होने वाले प्रयोग बतलाता हूं। हास्य और
शृङ्गार रस में पाठ्य को अर्पण, विच्छेद, दीपन और प्रशमन नामक अंगों
से युक्त रखना चाहिए। करुण रस में दीपन और प्रशमन (अंगों) से युक्त
रखा जाए। वीर, रौद्र तथा अद्भुत रसों में विच्छेद, प्रशमन, अर्पण, दीपन
तथा अनुबन्ध युक्त पाठ्य रहना चाहिए। बीभत्स और भयानक रस में
विसर्ग, विच्छेद (अर्पण) युक्त पाठ्य रखना चाहिए।
सर्वेषामप्येषां^५ ^६मन्द्रमध्यतारकृतः प्रयोगस्त्रिस्थानगतः। तत्र
दूरस्थाभाषणे तारं^७ शिरसा, नातिदूरं मध्यं कण्ठेन, पार्श्वतो मन्द्र-
१. एषां रस—क०। २. वाक्यं—ग०।
३. करुणवीराद्भुतेषु समाकाङ्क्षविच्छेदप्रशमनार्पणदीपनानुबन्धबहुलं पाठ्यं
प्रयोज्यम्—ख०; ग०।
४. बीभत्सभयानकयोर्विच्छेदार्पणयुक्तमिति—ख०; ग०।
५. चैतेषां—ख०; ग०।
६. मध्यतारव्यवस्थया त्रिस्थानगतः प्रयोगः—ख०; ग०।
७. तारशिरसो—ग०।
३६८ नाट्यशास्त्रम्
सुरसा प्रयोजयेत् पाठ्यमिति । १मन्द्रात्तारं न गच्छेत् ताराद्वा
मन्द्रमिति ।
इन सभी अंगों का मन्द्र, मध्य एवं तार स्वरों के—जिनकी तीन स्थान
से उत्पत्ति हुई है—माध्यम से प्रयोग होता है । किसी दूरस्थ पात्र को
पुकारने में तार स्वर का—जो मूर्ध स्थान से उत्पन्न होता है—प्रयोग करना
चाहिए । जो पात्र अधिक दूर पर न हो उसे बुलाने में—कण्ठ स्थान से
उत्पन्न होने वाले, मध्य स्वर का प्रयोग करना चाहिए । तथा किसी समीप
स्थित पात्र से वार्तालाप करने में वक्षःस्थल से उत्पन्न होने वाले मन्द्र स्वर
का प्रयोग करना चाहिए । ( कभी भी ) मन्द्र स्वर से ( एकदम ) तार स्वर
या तार स्वर से मन्द्र स्वर पर नहीं पहुँच जाना चाहिए ।
एषाञ्च२ द्रुतमध्यविलम्बितास्त्रयो लया ३रसेषूपपाद्याः । तत्र
हास्यशृङ्गारयोर्मध्यलयः, ४करुणे विलम्बितो, वीररौद्राद्भुतबीभत्स-५
भयानकेषु द्रुत इति ।
इन स्वरों की तीन प्रकार की लय का भी विभिन्न रसों में उपयोग
किया जाता है । हास्य तथा शृङ्गार रस में मध्यलय, करुण में विलम्बित
लय तथा वीर, रौद्र, अद्भुत, बीभत्स और भयानक रस में द्रुत लय का
प्रयोग करना चाहिए ।
विराम और उसका लक्षण—
अथ विरामः—अर्थसमाप्तौ कार्यवशाच्च छन्दोवशात् । कस्मात् ?
दृश्यन्ते ह्येकद्वित्रिचतुरक्षरा विरामाः । यथा—
अब 'विराम' बतलाता हूँ । जिसका 'पाठ्य' में उपयोग होता है । यह
(विराम) अर्थ की समाप्ति ( या वाक्य के पूर्ण हो जाने ) के कारण या
फिर परिस्थिति पर निर्भर करता है । केवल छन्द के लक्षण पर ही विराम
नहीं किया जाता है । क्योंकि व्यवहार में यह पाया जाता है कि एक, दो,
तीन या चार अक्षरों पर भी विराम होता है—जैसे निम्न पद्य में—
किं, गच्छ, मा विश, सुदुर्जन, वारितोऽसि६
कार्यं, त्वया न, मम सर्वजनोपभुक्तम्७ ।
१. मन्द्रात्तारं गच्छेत्—ख०; मन्द्रात्तारं गच्छेत्ताराद्वा मन्द्रमिति—ग० ।
२. अत्र च—क० । ३. पूपयोज्याः—क० ।
४. करुणे च—क० । ५. बीभत्सकरुणयोर्विलम्बितः—क० ।
६. कारितोऽसि—क० । ७. युक्तम्—क० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३६९
१सूचासु चाङ्कुरगते च तथोपचारे
स्वल्पाक्षराणि हि पदानि भवन्ति काव्ये२ ॥ ६० ॥
रे दुष्ट, क्या है, दूर हट, आगे मत बढ़, तू रोक दिया गया है। अरे
निर्बल पुरुष ! तू सभी से उपहास किया जा रहा है। मुझे तुम से कुछ भी
काम नहीं।
इस प्रकार जिनमें थोड़े अक्षर भी हों पर काव्य में १सूचा तथा अंकुर२
(अभिनय) से युक्त होने और 'विराम' की सम्बद्धता से ऐसे समय स्वतः
उनमें गुणशालिता आ जाती है ॥ ६०॥
एवं विरामे प्रयत्नोऽनुष्ठेयः । कस्मात् ? विरामो ह्यर्थानुदर्शकः ।
अतएव 'विराम' के प्रयोग के विषय में ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि
विराम अर्थों की स्पष्टता में सहायक होते हैं।
३अत्र श्लोकः—
४विरामेषु प्रयत्नो हि नित्यं कार्यः प्रयोक्तृभिः ।
५कस्मादभिनयो ह्यस्मिन्नर्थापेक्षी यतः६ स्मृतः ॥ ६१ ॥
इस विषय में प्राचीन अनुवंश्य श्लोक भी हैं :—
वाचिक अभिनय में 'विरामों' पर सदा नाट्य निर्देशक को ध्यान देना
चाहिए क्योंकि अभिनय उच्चारित शब्दों के अर्थ पर निर्भर होता है ॥६१॥
अलंकार तथा विरामों में हस्त संचालन-विधि—
यत्र व्यग्रावुभौ हस्तौ तत्र दृष्टिसमन्वितः७ ।
वाचिकाभिनयः८ कार्यो विरामैरर्थदर्शकैः९ ॥ ६२ ॥
( नृत्य के समय ) आंखों को वहीं रखे जहां हाथ अपनी मुद्राओं को
प्रदर्शित करते हों तो ऐसी स्थिति में अर्थ को स्पष्ट करने के लिए विरामों
के साथ वाचिकाभिनय अवश्य रख देना चाहिए ॥ ६२ ॥
१. सूचा तथा अङ्कुराभिनय के लक्षण नाट्यशास्त्र के अध्याय २४।४३ तथा
२४।४४ पर ( भाग ३ में ) अवलोकन करें ।
१. सूचाङ्कुराभिनयनेषु—क०; शोकं शुचं कुरु गते च—ख० ।
२. कार्ये—ख० । ३. भवत्यपि च—क० ।
४. विरामे तु प्रयत्नस्तु—ग० । ५. तस्माद—ग० ।
६. यतः स्थितः—ख०; ग० । ७. समन्वितैः—क० ।
८. वाचिकोऽभिनयः—क० । ९. दर्शभिः—क० ।
२४ ना० शा० द्वि०
३७० नाट्यशास्त्रम्
प्रायो वीरे च रौद्रे च करौ प्रहरणाकुलौ ।
बीभत्से १कुत्सितत्वाच्च भवतः कुञ्चितौ करौ ॥ ६३ ॥
हास्ये चोद्देशमात्रेण करुणे च प्रलम्बितौ ।
अद्भुते विस्मयात् स्तब्धौ २भयाच्चैव भयानके ॥ ६४ ॥
इसी प्रकार रौद्र और वीर रस में हाथ शस्त्र प्रहार में व्यस्त रहते हैं।
बीभत्स रस में कुत्सित वस्तु के अवलोकन आदि के कारण हाथ सिकुड़े
रहते हैं। हास्य रस में हाथ किसी व्यक्ति या वस्तु की ओर लटकाए हुए
या ढीले रखे जाते हैं और अद्भुत रस में आश्चर्य के कारण हाथ स्तब्ध
(निष्क्रिय) हो जाते हैं ॥ ६३-६४ ॥
एवमादिषु चान्येषु३ प्रविचारेऽथ४ हस्तयोः ।
अलङ्कारविरामाभ्यां साध्यते ह्यर्थनिश्चयः ॥ ६५ ॥
इसी प्रकार के अन्य अवसरों पर भी अलंकार और विरामों के द्वारा ही
प्रदर्शित अर्थ स्पष्ट होता है ॥ ६५ ॥
ये विरामाः स्मृता वृत्ते५ तेष्वलङ्कार दूष्यते ।
समाप्तेऽर्थे पदे वापि तथा प्राणवशेन वा ॥ ६६ ॥
पदवर्णसमासे च द्रुते बह्वर्थसङ्कटे ।
कार्यो विरामः पादान्ते तथा प्राणवशेन वा ॥ ६७ ॥
शेषमर्थवशेनैव विरामं सम्प्रयोजयेत् ।
पद्यों में जो विराम रखे गए हैं उनमें अलंकारों की भी अपेक्षा रहती है।
शब्द की अर्थ समाप्ति पर या सांस लेने के कारण जैसी भी स्थिति हो—
उसमें विराम अवश्य किया जाना चाहिए। इसी प्रकार जहाँ अक्षर और शब्द
दीर्घ समासावली में समाविष्ट हों, या उनका उच्चारण शीघ्र गति से किया
जा रहा हो, या उनसे अनेक अर्थ प्रकट हो रहे हों तो इन सभी अवस्थाओं
में पाद की समाप्ति या फिर सांस लेने के लिये जहाँ भी आवश्यक रूप में
रुकना होता हो तो वहाँ 'विराम' रखे जाएँ। (इसके अतिरिक्त) शेष
स्थानों पर अर्थ के अनुसार 'विराम' की योजना की जाए ॥ ६६-६८ ॥
१. कुञ्चितत्वाच्च—क० ।
२. विस्मयाविष्टे स्तब्धौ कार्यो—क० ।
३. सर्वेषु—ग० । ४. प्रविचारेषु—ख०; अधिकारेषु—ग० ।
५. नृत्ते—क०; एते—ग० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३७१
अत्र१ च भावगतानि २रसगतानि च ३कृष्याक्षराणि बोद्धव्यानि ।
तद्यथा—
( वृत्ति )—इसी प्रसंग में भाव तथा रस में होने वाले कृष्याक्षरों को भी
जान लेना चाहिए।
‘कृष्याक्षर और उनका व्यवहार—
४आकारैकारसंयुक्तमेकारौकारसंयुतम् ।
व्यञ्जनं यद्भवेद्दीर्घं कृष्यं तत्तु विधीयते ॥ ६८ ॥
जो व्यंजन आकार से युक्त या ए, ऐ, औ जैसे दीर्घाक्षर वाले स्वरूप के
हों उन्हें कृष्याक्षर समझना चाहिए ॥ ६८ ॥
विषादे च वितर्के च प्रश्नेऽथामर्ष६ एव च ।
कलाकालप्रमाणे पाठ्यं कार्यं७ प्रयोक्तृभिः ॥ ६९ ॥
विषाद, वितर्क, प्रश्न और क्रोध की अवस्था में ऐसे वर्णों के (संवाद
में) आने पर उन पर एक कला का विराम (प्रमाणानुसार) रखा
जाए ॥ ६९ ॥
शेषाणामर्थयोगेन विरामे विरमेदिह८ ।
एकद्वित्रिचतुःपञ्च-षट्कलञ्च विलम्बितम् ॥ ७० ॥
(इसके अतिरिक्त) शेष (अक्षरों के होने पर) उनके अर्थों के
१. कृष्यतीति कृष्यो=विलम्बितो लयः तत्र साधूनि कृष्याक्षराणि
सन्ध्यक्षराणीत्यर्थः । (अभि० भार० voll II. पृ० ४०२) अर्थात्
विलम्बित लय के उपयुक्त सन्ध्यक्षर कृष्याक्षर समझना चाहिए।
(जैसे आ ई ऊ जैसे दीर्घ अक्षर एवं सन्ध्यक्षर कृष्याक्षर हैं) ।
१. अथ—क०, ख०; अत्रानुगतानि चत्वार्यक्षराणि रसभावानुगतानि
निकृष्टाण्यक्षराणि चोद्बोध्यानि—ग० ।
२. रसजातानि—ख० । ३. कृष्याण्यक्षराणि—ख० ।
४. एकारैकारसंयुक्तमोकारौकारसंयुतम्—ख०; आकारे कारसंयुक्तमेकारे
कारसंयुतम्—ग० ।
५. भवेदिह—ख०; ग० ।
६. चामर्षणे—ख०; वामर्षणे—ग० ।
७. योज्यं—क० । ८. विरमेद्बुधः—क० ।
३७२ नाट्यशास्त्रम्
अनुसार जो विराम रखे जाएं वे एक, दो, तीन, चार या पांच कलाओं के
समय के प्रमाण वाले हों ॥ ७० ॥
'विलम्बिते विरामे हि सदा गुर्वक्षरं भवेत् ।
षष्णां कलानां परतो विलम्बो² न विधीयते ॥ ७१ ॥
जो सबसे अधिक समय लेने वाले ( अर्थात् लम्बे ) विराम हों वहाँ गुरु
अक्षर रहने चाहिए किन्तु छः कला से अधिक समय तक होने वाले विराम
नहीं हो ॥ ७१ ॥
अथवा ³कारणोपेतं प्रयोगं कार्यमेव च ।
समीक्ष्य वृत्ते कर्तव्यो विरामो रसभावतः⁴ ॥ ७२ ॥
या फिर किसी कार्य या अन्य आवश्यकता आ जाने पर और अधिक
समय लेने वाले 'विराम' रखे जा सकते हैं पर इन्हें रस तथा भावों की
स्थिति को देखते हुए ही रखना चाहिए ॥ ७२ ॥
ये विरामाः स्मृताः पाठ्ये⁵ ⁶वृत्तपादसमुद्भवाः ।
उत्क्रम्यापि क्रमं तज्ज्ञैः कार्यास्तेऽर्थवशानुगाः⁷ ॥ ७३ ॥
काव्य रचना में 'पादों' के विभाजन से ही 'विरामों' की सृष्टि होती है
पर रंगमंच पर उनके अर्थ को प्रकट करने के लिये चतुर जन निर्दिष्ट क्रम में
परिवर्तन कर विरामों को रख सकते हैं ॥ ७३ ॥
नापशब्दं पठेत्तज्ज्ञो ⁸भिन्नवृत्तं तथैव हि ।
विश्रमेन्नाविरामेषु⁹ दैन्ये¹⁰ काकुं न दीपयेत् ॥ ७४ ॥
कोई भी पात्र अशुद्ध शब्द और लक्षणहीन छन्दों का पाठ न करें।
निर्दिष्ट विराम स्थल के अलावा अन्य स्थानों पर देर तक न रुके और दैन्य
पूर्ण अवस्था में संवादों को बोलते हुए काकु को दीप्त न करे ॥ ७४ ॥
१. विरामे च विलम्बे च यदा—ख०; ग० ।
२. लम्बनं—ख०; ग० । ३. करणोपेतं—ग० ।
४. कर्त्तव्या विरामा रसभावतः—क० ।
५. काव्ये—ख०; ग० । ६. वृत्ते—क० ।
७. रसाश्रयाः—क०; तेऽर्थवशास्तदा—ग० ।
८. भिन्नवृत्तेन चैव हि—ख०; ग० ।
९. विश्रमेणाविरामेषु—ख०; ग० ।
१०. न काकुरसहीनकम्—ख०; ग० ।