नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः ३६३
द्रुतो¹ नाम कण्ठगतः²। स च त्वरितः लल्लनमन्मन्भयशीतज्वर-³
त्रासायस्तात्ययिककार्यवेदनादिषु ।
द्रुत स्वर कंठ स्थान से शीघ्रतापूर्वक उच्चारित किया जाता है। इसकी
योजना स्त्रियों के द्वारा बालकों को सान्त्वना देने या चुप करने तथा प्रिय
के प्रस्ताव को अस्वीकृत करने में और भय, शीत, ज्वर, त्रास, आवेग, गुप्त
एवं आवश्यक या शीघ्र किये जाने वाले ( आत्ययिक ) कार्य के बतलाने
आदि में करनी चाहिए ।
विलम्बितो नाम ⁴कण्ठगतस्थानगतस्तनुमन्द्रः, स च ⁵शृङ्गार-
करुणवितर्कितविचारामर्षासूयिता⁶व्यक्तार्थप्रवादलज्जाचिन्तातर्जन⁷
विस्मयदोषानु⁸कीर्तनदीर्घरोग⁹ निपीडनादिषु ।
विलम्बित स्वर कण्ठ स्थान से उच्चारित होता है तथा थोड़ा मन्द्र
स्वरूप वाला होता है। इसका प्रयोग प्रणय (शृंगार), वितर्क, विचार,
अमर्ष, असूया, अटपटी बात कहने ( अव्यक्तार्थ-प्रवाद ), लज्जा, चिन्ता,
तर्जन, आश्चर्य ( विस्मय ), दोष कथन या निन्दा, लम्बी बीमारी तथा पीड़ा
आदि में करना चाहिए ।
अत्रानुवंश्या श्लोका भवन्ति-
¹⁰उत्तरोत्तरसञ्जल्पपरुषाक्षेपणेपु¹¹ च।
तीक्ष्णरूक्षाभिनयने ¹²आवेगे क्रन्दिते तथा ॥ ४६ ॥
¹³परोक्षस्य समाह्वाने तर्जने त्रासने तथा ।
दूरस्थाभाषणे चैव तथा निर्भर्त्सनेषु च ॥ ४७ ॥
१. ह्रस्वो नाम—ख० ।
२. कण्ठगतस्त्वरितलज्जितमन्मथभय—ख०; कण्ठगतस्खलितवेहलनमदन-
भय—ग० ।
३. वातज्वरातंत्रस्ताकार्यवेदनादिषु—ख०; शीतज्वरत्रस्तायस्तागूढ़कार्य-
वेदनादिषु—ग० ।
४. कण्ठस्थानस्थो—ख०; कण्ठस्थानगतः मन्द्रः—ग० ।
५. शृङ्गारवितर्क—ख०; शृङ्गारवितर्कित—ग० ।
६. मर्षाश्वसित—क० । ७. विस्मित—ख० ।
८. दोषानुकीर्तनेन—ख० । ९. दीर्घरोष—ग० ।
१०. संजल्पे—ख०; ग० । ११. क्षेपणे तथा—ख०; ग० ।
१२. तथाऽऽक्रन्दे च नित्यशः—क० ।
१३. परोक्षाह्वयने चैव तर्जनत्रासनेषु च—क० ।