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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 475, कुल 668 में से

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पृष्ठ 475

३६४ नाट्यशास्त्रम्
१भावेष्वेतेषु नित्यं हि नानारससमाश्रया ।
उच्चा दीप्ता द्रुता चैव काकुः कार्या प्रयोक्तृभिः ॥ ४८ ॥
इस विषय में ये आनुवंश्य श्लोक हैं—
विभिन्न रस और भावों को उपयुक्त (योग्य) बनाने के लिए काकु
स्वर को उच्च, दीप्त तथा द्रुत रखना चाहिए जब कि प्रश्न और उत्तर की
झड़ी लग रही हो, कठोर वचनों में आरोप-प्रत्यारोप होते हों, तीखी और
रूखी बात चलने में, आवेग, विलाप (क्रन्दन); अप्रत्यक्ष व्यक्ति को युद्ध के
लिए ललकारने, किसी को भयभीत करने या कष्ट देने में दूर स्थित व्यक्ति
को बुलाने में तथा (किसी को) धौंस देने की अवस्था दिखलाई जा रही
हो ॥ ४६-४८ ॥
व्याधिते च ज्वरार्ते च २भयार्ते शीतविप्लुते ।
३नियमस्थे वितर्के च गाढशस्त्रक्षतेषु४ च ॥ ४९ ॥
५गुह्यार्थवचने चैव चिन्तायां तपसि स्थिते ।
मन्द्रा नीचा६ च कर्तव्या ७काकुर्नाट्यप्रयोक्तृभिः ॥ ५० ॥
जब व्याधि दशा, ज्वर, भूख, प्यास, तुच्छ व्यक्ति को देखने, नियमन,
वितर्क, शस्त्रों के गहरे घाव हो जाने, गोप्य शब्दों को वहन करने, औत्सुक्य
तथा किसी उग्र कथा के बतलाने के अवसर हो तो ऐसे अवसर पर मन्द्र
और नीच काकु स्वर को रखना चाहिए ॥ ४९-५० ॥
८लल्ले च मन्मने चैव भयार्ते शीतविप्लुते ।
मन्द्रा द्रुता च कर्तव्या काकुर्नाट्यप्रयोक्तृभिः ॥ ५१ ॥
मन्द्र और द्रुत काकु स्वर तब रखना चाहिए जब कि स्त्रियों के द्वारा
बच्चों को बहलाने पुचकारने की, प्रणय प्रस्ताव की अस्वीकृति, भय तथा
शीत के द्वारा कष्ट पाने की दशा दिखलायी जा रही हो ॥ ५१ ॥
१. एषु नानारसोपेता नित्यमर्थप्रदर्शिका—क०, सर्वेष्वेतेषु—चैव—
ख०; ग० ।
२. शोके च क्षुत्पिपासिते—क०, क्षोभे च क्षुत्पिपासिते—घ० ।
३. विषम—क० । ४. क्षते तथा—क०।
५. गूढार्थ—क० ।
६. स्थिता—क०; द्रुता—ख०; ग० ।
७. काकुः कार्या प्रयो—क० ।
८. मल्ले च मदने चैव—क० ।