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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 473, कुल 668 में से

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पृष्ठ 473

३६२ नाट्यशास्त्रम्
दीप्तो नाम—शिरःस्थानगतस्तारतरः,$^१$ स चाक्षेपकलह$^२$
$^३$विवादामर्षकुष्टाधर्षणक्रोधशौर्यदर्पतीक्ष्णरूक्षाभिधाननिर्भर्त्सनाक्रन्दि-
तादिषु$^४$।
दीप्त स्वर उसे कहते हैं जो मूर्धा स्थान से उत्पन्न हो और तारतर
अर्थात् कुछ अधिक ऊंची आवाज से उच्चारित किया जाता हो । इसका
संयोजन आक्षेप, युद्ध, कलह, विवाद ( झड़प ), अमर्ष, जोर से खींचना
( आधर्षण ), क्रोध, शौर्य, अहंकार ( दर्प ), तेज या रूखा उत्तर देना,
डांटना तथा रोना आदि के प्रसंगों में किया जाता है ।
मन्द्रो नाम—$^५$उरःस्थानगतो $^६$निर्वेदग्लानिचिन्तौत्सुक्य दैन्य-
$^७$व्याधि क्रीडागाढशस्त्रक्षतमूर्च्छामदगुह्यार्थवचनादिषु$^८$।
मन्द्रस्वर वक्षः स्थल से उत्पन्न होता है। इसकी योजना निर्वेद,
ग्लानि, शंका, चिन्ता, औत्सुक्य, दैन्य, ( आवेग ) व्याधि, ( क्रीड़ा ) शस्त्रों
के गहरे घाव, मूर्च्छा, मद तथा गूढ़ार्थक शब्दों के कहने आदि में की
जाती है ।
नीचो नाम $^९$उरःस्थानस्थो मन्द्रतरः, स च स्वभावाभाषणव्याधि-$^{१०}$
शमभ्रमार्त-त्रस्त-पतितमूर्च्छितादिषु ।
नीच स्वर वक्षःस्थल से उत्पन्न होने वाला और अत्यन्त मन्द्र (मन्द्रतर)
स्वर होता है । इसकी योजना स्वाभाविक संभाषण, व्याधि, मार्ग चलने से
थके, त्रस्त तथा व्यक्ति के गिरने, मूर्च्छित होने आदि दशा में की जाती है ।
१. शिरस्थानातिरस्कारः सच—क० ।
२. वाद—क० ।
३. दामर्षोत्कृष्टाधर्षण—ख०; ग० ।
४. दाक्रन्दनादिषु—क० ।
५. उरसि मद्रस्वरः—क० ।
६. ग्लानि शङ्काचिन्तो--क० ।
७. दैन्यव्याधिगाढ—ख०; ग० ।
८. मूर्च्छामदादिषु—ख०; ग० ।
९. तत्रैव मन्द्रतरः—क० ।
१०. भयशान्तत्रस्तपतितमूर्च्छितादिपु—क०; स्वभाषाभाषणव्याधितपथि-
श्रान्तत्रस्त—ख०; ग० ।