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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 472, कुल 668 में से

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पृष्ठ 472

एकोनविंशोऽध्यायः ३६१
यदि किसी वाक्य के उच्चारण के समय—जिसका अर्थ पूर्ण रूप से
प्रकट न होता हो और जिसमें कंठ और वक्षःस्थल के प्रदेश से स्वर उत्पन्न
हो रहा हो, जो तार स्वर से प्रारम्भ होकर मन्द्र स्वर में समाप्त हो जाता
हो तथा वर्ण और अलंकारों की पूर्णता जिसमें न रहे तो उसे 'साकांक्ष'
काकु कहते हैं।
'निराकांक्ष' उसे कहते हैं जिसमें किसी वाक्य की उच्चारण दशा में
जिसका अर्थ पूर्ण रूप से प्रकट होता हो तथा जिसमें तार (मूर्धन्य) स्वर
से प्रारम्भ होकर मन्द्र स्वर में समाप्ति हो जाती हो और जिसमें वर्ण और
अलंकार पूर्ण रूप में विद्यमान हों। (इन वाक्यों का आश्रय लेने के कारण
'काकु' भी दो प्रकार की हो जाती है।)
छः अलंकार—
अथ षडलङ्कारा¹ नाम—
उच्चो दीप्तश्च² मन्द्रश्च नीचो³ द्रुतविलम्बितौ।
⁴पाठ्यस्यैते ह्यलङ्कारा लक्षणञ्च⁵ निबोधत॥ ४५॥
स्वरों के छः अलंकार जो पाठ्य में रहते हैं। वे हैं—(१) उच्च,
(२) दीप्त, (३) मन्द्र, (४) नीच, (५) द्रुत तथा (६) विलम्बित ॥ ४५ ॥
अलंकारों का विनियोग—
उच्चो नाम—शिरःस्थानगतस्तारस्वरः, स च दूरस्था ⁶भाषण-
विस्मयोत्तरोत्तरसञ्जल्पदूराह्वानत्रासनाबाधाद्येषु⁷।
'उच्च' स्वर उसे कहते हैं जो मूर्धस्थान से उत्पन्न हो (मूर्धन्य) और
'तार' स्वर उसे जो थोड़ी ऊँची आवाज में बोला जाता हो। इसका उपयोग
दूरस्थ व्यक्ति से संभाषण, विस्मय, परस्पर उत्तर-प्रत्युत्तर, दूरस्थ व्यक्ति को
पुकारना, त्रास तथा बाधा आदि में किया जाता है।
१. षडलङ्काराः—ख०; ग०।
२. दीप्तोऽथ,—क०।
३ नीचद्रुतविलम्बिताः—क०।
४. पाठस्यैते—क०।
५. विनिबोधत—क०।
६. विस्मयोत्तरसंजल्पनदूराह्वानबाधाद्येषु—क०।
७. बाधाक्रुष्टकलहाभिधानेषु भावेषु—क०; त्रासनार्थं वाच्येषु—ख०; ग०।