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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

२८६ नाट्यशास्त्रम्
अनुक्तसिद्धि—
प्रस्तावेनैव शेषोऽर्थः कृत्स्नो यत्र प्रतीयते¹।
वचनेन विनानुक्तसिद्धिः² सा परिकीर्तिता ॥ ४० ॥
जहां बिना अभिहित किये ही प्रस्ताव मात्र से किसी विषय के शेष भाग
की प्रतीति हो जाए उसे 'अनुक्तसिद्धि' समझना चाहिए ॥ ४० ॥
प्रियोक्ति—
यत् प्रसन्नेन मनसा पूज्यं पूजयितुं वचः ।
हर्षप्रकाशनार्थन्तु सा प्रियोक्तिरुदाहृता ॥ ४१ ॥
जब प्रसन्न चित्त हो पूज्यजन के सम्मान और अपने हर्ष को प्रकट करने
के लिए उपयुक्त शब्दों को उच्चारित किया जाए तो उसे 'प्रियोक्ति' समझना
चाहिए ॥ ४१ ॥
एतानि ³काव्यस्य च लक्षणानि षट्त्रिंशदुद्देशनिदर्शकानि⁴ ।
⁵प्रबन्धशोभाकरणानि तज्ज्ञैः सम्यक्प्रयोज्यानि ⁶यथारसानि ॥ ४२ ॥
नाट्यरचना में प्रयुक्त किये जाने वाले ये ही वे छत्तीस लक्षण हैं जिन्हें
नाट्यरचना के अवसर पर दृष्टि में रखा जाए और नाट्यरचना के शोभा
धायक इन लक्षणों को उपयुक्त रसों के अनुकूल रखते हुए सदा प्रयुक्त करना
चाहिए ॥ ४२ ॥
अलंकार ( तथा उनके लक्षण )—
उपमा ⁷रूपकञ्चैव दीपकं यमकं तथा ।
⁸काव्यस्यैते ह्यलङ्काराश्चत्वारः परिकीर्तिताः ॥ ४३ ॥
१. अनुक्तसिद्धि के स्थान पर ही अभिनवगुप्त ने अन्य पाठ में 'परिदेवन'
भी माना है तथा इसके स्थान पर 'क्षोभ' को भी संकेतित किया है ।
२. प्रियोक्ति का अन्य पाठ में लक्षण भिन्न है । अभिनवगुप्तपाद ने इसे 'अंश'
के स्थान पर भी उल्लिखित किया है ।
१. प्रदीयते—क० ।
२. जातु सिद्धिः—क०; विजानाति सिद्धिः—ख; विजानातु सिद्धिः—ग० ।
३. एतानि काव्यस्य विभूषणानि—क०; एतानि वा काव्यविभूषणानि—ख० ।
४. दुद्देश्यनिदर्शनानि ख०; ग० । ५. काव्येषु सोदाहरणानि—ख; ग० ।
६. रसानुरूपम्—क०; बलानुरूपम् ख० ।
७. दीपकञ्चैव रूपकं—ख०; ग० ।
८. अलङ्कारास्तु विज्ञेयाश्चत्वारो नाटकाश्रयाः—क० ।

सप्तदशोऽध्यायः २८७
नाटक आदि में सम्प्राप्त तथा प्रयोग किये जाने वाले अलंकार चार हैं ।
वे हैं—उपमा, रूपक, दीपक तथा यमक ॥ ४३ ॥
उपमा—
यत्किञ्चित् काव्यबन्धेषु सादृश्येनोपमीयते ।
उपमा नाम सा¹ ज्ञेया गुणाकृतिसमाश्रया ॥ ४४ ॥
काव्यरचना में जब दो पदार्थों की गुण या प्रकृति पर आश्रित होकर
सादृश्य द्वारा तुलना की जाए तो उसे 'उपमा' समझना चाहिए ॥ ४४ ॥
एकस्यैकेन सा कार्या² ह्यनेकेनाथवा पुनः ।
अनेकस्य तथैकेन बहूनां बहुभिस्तथा ॥ ४५ ॥
यह तुलना एक पदार्थ की एक से या अनेक से, या अनेकों की एक से,
या अनेकों की अनेकों से की जाती है ॥ ४५ ॥
तुल्यन्ते शशिनः वक्त्रमित्येकेनेकसंश्रया³ ।
⁴शशाङ्कवत्प्रकाशन्ते ज्योतींषीति भवेत्तु⁵ या ॥ ४६ ॥
⁶एकस्यानेकविषया सोपमा परिकीर्तिता ।
श्येनबर्हिणभासानां⁷ तुल्यार्थं⁸ इति या भवेत् ॥ ४७ ॥
एकस्य बहुभिः सा स्यादुपमा नाटकाश्रया⁹ ।
¹⁰बहूनां बहुभिर्ज्ञेया घना इव गजा इति ॥ ४८ ॥
(इनके क्रमशः उदाहरण इस प्रकार हैं ) 'तेरा मुख चन्द्र के समान है'
में एक की उपमा एक से दी गई है । 'नक्षत्र चन्द्रमा की तरह प्रकाशित हैं',
में अनेकों की उपमा एक से है । 'बाज, मयूर ( तथा गिद्ध ) के समान नेत्र'
१. यहाँ 'उपमीयते' पद से उपमेय का, सादृश्य पद से साधारण धर्म का
गुणाकृति के द्वारा इवादि वाचक का तथा समाश्रय शब्द से उसी का
आश्रय ग्रहण निदर्शित किया गया है ।
१. विज्ञेया—क० ।
२. कार्यानेकेनाप्यथवा पुनः—ख०; ग० ।
३. इति ह्येककृता भवेत्—क०, ख० ।
४. चन्द्रवत्सम्प्रकाशन्ते ज्योतींषीति द्विजोत्तमाः—क० ।
५. भवेद्धि या—क० । ६. एकेन सा त्वनेकेषामुपमा—क० ।
७. गृध्राणां—क० । ८. तुल्याक्ष—क० ।
९. नाटकाश्रये—क० ।
१०. घना इव गजा यत्र बहूनां बहुभिस्तथा—क० ।

२८८ :नाट्यशास्त्रम्:
में एक की (नेत्र की) अनेकों से उपमा है तथा 'हाथी बादलों की तरह है'
में अनेकों की अनेकों से उपमा है ॥ ४६-४८ ॥
उपमा के पांच प्रकार (विभेद)
प्रशंसा चैव निन्दा च कल्पिता सदृशी तथा ।
किञ्चिच्च सदृशी ज्ञेया ह्युपमा पञ्चधा पुनः ॥ ४९ ॥
उपमा के पांच प्रकार हैं। जो (१) प्रशंसा, (२) निन्दा, (३)
कल्पिता, (४) सदृशी तथा (५) किञ्चित् सदृशी ॥ ४९ ॥
प्रशंसा¹ यथा—
दृष्ट्वा² तु तां विशालाक्षीं तुतोष मनुजाधिपः ।
मुनिभिः साधितां कृच्छ्रात्³ सिद्धिं मूर्त्तिमतीमिव ॥ ५० ॥
प्रशंसा का उदाहरण—मुनिजन द्वारा कष्ट से अर्जित सिद्धि के समान
उस विशालाक्षी रमणी को देखकर वह राजा प्रसन्न हुआ ॥ ५० ॥
निन्दा यथा—
सा तं सर्वगुणैर्हीनं ⁴सस्वजे कर्कशच्छविम् ।
वने कण्टकिनं वल्ली ⁵दावदग्धमिव द्रुमम् ॥ ५१ ॥
निन्दा का उदाहरण—उस रमणी ने सब गुणों से हीन बेढंगी शक्ल
वाले (कर्कशच्छवि) उस पुरुष का—दावाग्नि से दग्ध कांटे वाले वृक्ष का
लता के समान आलिंगन किया ॥ ५१ ॥
कल्पिता यथा—
क्षरन्तो⁶ दानसलिलं लीलामन्थरगामिनः ।
मतङ्गजा विराजन्ते जङ्गमा इव पर्वताः ॥ ५२ ॥
कल्पिता का उदाहरण—मदजल के वर्षण करने वाले, लीला से मन्द-
मन्द गति शाली ये गजराज जंगम पर्वतों के समान दिखाई देते हैं ॥ ५२ ॥
सदृशी यथा—
यत्त्वयाद्य कृतं कर्म परचित्तानुरोधिना ।
सदृशं तत्तवैव स्यादिति मानुषकर्मणः⁷ ॥ ५३ ॥
सदृशी का उदाहरण—दूसरों के (मन के) अनुरोध से आपने जो


१. प्रशंसया यथा—ख०। २. आलप्य तां—क०।
३. कृत्वा—क०। ४. संश्रिता पुरुषाधमम्—क०।
५. वह्निदग्ध—क०; दवदाघमिव—ख०।
६. मदवारिनिषिक्ताङ्गा—क०। ७. कर्मणा—क०।

सप्तदशोऽध्यायः २८९
कार्य किया वह अतिमानुषकर्मा (मनुष्यों से भी बढ़कर कार्य कर लेने वाला)
पुरुष आपके ही समान है ॥ ५३ ॥
किञ्चित्सदृशी यथा—
सम्पूर्णचन्द्रवदना नीलोत्पलदलेक्षणा¹।
²मत्तमातङ्गगमना सम्प्राप्तेयं ³सखी मम ॥ ५४ ॥
किञ्चित् सदृशी का उदाहरण—यह मेरी सखी आ गई, जो पूर्णचन्द्र के
समान मुखवाली, नीलकमल के सदृश नेत्रों वाली तथा मदमत्त हाथी के
समान चालवाली है ॥ ५४ ॥
उपमायाः बुधैरेते ज्ञेया भेदाः समासतः ।
⁴ये शेषा लक्षणैर्नोक्तास्ते ग्राह्या लोककाव्यतः ॥ ५५ ॥
उपमा अलङ्कार के संक्षेप में ये ही भेद होते हैं। इसके जिन अन्य
प्रकारों को यहां लक्षणों द्वारा नहीं कहा गया उन्हें लोक प्रचलित काव्यों के
द्वारा समझा जाए ॥ ५५ ॥
दीपक—
⁵नानाधिकरणार्थानां शब्दानां सम्प्रदीपकम्⁶ ।
एकवाक्येन संयुक्तं⁷ तद्दीपकमिहोच्यते ॥ ५६ ॥
भिन्न विषयों वाले शब्दों का एक वाक्य में दीपक के समान संयोग होने
पर दीपक¹ ( अलंकार ) होता है ॥ ५६ ॥
१. एक अवान्तर वाक्य से बिना संयुक्त हुए ही 'दीपक' की तरह वाक्य का
प्रकाशक होने के कारण इसे 'दीपक' समझा जाए यही कारिका का आशय है।
'दीपक' का आशय आचार्य अभिनवगुप्त ने 'आकांक्षापूरक' माना है जो क्रिया,
गुण तथा जात्यादि से होते हों ।
१. निभेक्षणा—क० । २. मत्तनागेन्द्र—क० । ३. प्रिया—क० ।
४. शेषा ये लक्षणे नोक्ताः संसाध्यास्तेऽपि लोकतः—क०, ये शेषा लक्षणे
नोक्ताः—ख०; ग० ।
५. नानाविकरण—क०; नानाधिकरणस्थानां—क०; ग० ।
६. सम्प्रदीपनः—क०; सम्प्रकीर्तितम्—ख०; सम्प्रदीपतः—ग० ।
७. संयोगो यस्तु—क०; संयोगो यस्तद्दीपकमुच्यते—क०; ग० ।
८. अस्मादनन्तरमेकमधिकं प्रक्षिप्तञ्च पद्यं क—पुस्तके । तद्यथा—
प्रसृतं मधुरं वापि गुणैः सर्वैरलङ्कृतम् ।
काव्ये यन्नाटके विप्रास्तद्दीपकमिति स्मृतम् ॥ इति ।
१६ ना० शा० द्वि०

२४० नाट्यशास्त्रम्
यथा—
सरांसि हंसैः कुसुमैश्च वृक्षाः मत्तैर्द्विरेफैश्च सरोरुहाणि ।
गोष्ठीभिरुद्यानवनानि चैव तस्मिन्नशून्यानि सदा क्रियन्ते ॥ ५७ ॥
उदाहरण :—वहां हंसी से सरोवर, पुष्पों से वृक्ष, मत्त भंवरों से कमल
तथा गोष्ठियों से उपवन ( सदा ) ( शोभा ) युक्त रहते हैं ॥ ५७ ॥
रूपक—
स्वविकल्पेन¹ रचितं तुल्यावयवलक्षणम् ।
किञ्चित्सा दृश्यसम्पन्नं यद् रूपं रूपकन्तु तत् ॥ ५८ ॥
जो अपने विकल्प से निर्मित 'तुल्य अवयवों वाला तथा थोड़ा सादृश्य
गुण युक्त ( अभिन्न ) रूप हो वह 'रूपक' कहलाता है ॥ ५८ ॥
[ ²नानाद्रव्यानुरागाद्यैर्यदौपम्यगुणाश्रयम् ।
रूपनिर्वर्णनायुक्तं तद्रूपकमिति स्मृतम् ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—अनेक द्रव्यों के सम्बन्ध से उपमा के गुणों का आश्रय लेकर
जिसके स्वरूप का सम्यक्

सप्तदशोऽध्यायः २९१
यमक—
शब्दाभ्यासस्तु¹ यमकं पादादिषु विकल्पितम् ।
विशेषदर्शनञ्चास्य गदतो मे निबोधत ॥ ६० ॥
शब्दों की आवृत्ति 'यमक' कहलाती है । जो कि पादों से प्रारंभ होकर
अनेक विधाओं को धारण करती हैं । अब इनके विशेष स्वरूप को बतलाता
हूँ । आप ध्यान पूर्वक सुनें ॥ ६० ॥
यमकों के दस प्रकार—
²पादान्तयमकञ्चैव काञ्चीयमकमेव च ।
³समुद्गयमकञ्चैव विक्रान्तयमकन्तथा ॥ ६१ ॥
यमकं चक्रवालञ्च संदष्टयमकं तथा ।
पादादियमकञ्चैव ⁴तथाम्रेडितमेव च ॥ ६२ ॥
चतुर्व्यवसितञ्चैव मालायमकमेव च ।
एतद्दशविधं ज्ञेयं यमकं नाटकाश्रयम् ॥ ६३ ॥
दृश्य काव्य (नाटक) में होनेवाले यमक के दस प्रकार होते हैं।
यथा—(१) पादान्तयमक, (२) काञ्ची-यमक, (३) समुद्ग-यमक,
(४) विक्रान्त-यमक, (५) चक्रवाल-यमक, (६) संदष्ट-यमक,
(७) पादादि-यमक, (८) आम्रेडित-यमक, (९) चतुर्व्यवसित-यमक
तथा (१०) माला-यमक ॥ ६१–६३ ॥
पादान्तयमक—
चतुर्णां यत्र पादानान्ते स्यात् सममक्षरम्⁵ ।
तद्धि पादान्तयमकं विज्ञेयं नामतो यथा ॥ ६४ ॥
(लक्षण) यदि चारों पादों के अन्त में समान पद (अक्षर) हो तो
उसे 'पादान्तयमक' समझना चाहिये ॥ ६४ ॥
यथा—दिनक्षयात् संहतरश्मिमण्डलं
दिवीव लग्नं तपनीयमण्डलम् ।
१. 'यमक' के भरतमुनि ने १० प्रभेद किये हैं । आचार्य भामह ने इसके
५ भेद माने हैं तथा भरतमुनि के १० प्रभेदों का अपने भेदों में अन्तर्भाव
भी निर्दिष्ट किया है । (द्र० भाम० काव्या० २।९०)
१. शब्दाभ्यासं—कं० । २. पदान्त—क० ।
३. सामुद्ग—क० । ४. आम्रेडितमथापि च—क० ।
५. स्याद् यमकाक्षरम्—क० ।

२९२ नाट्यशास्त्रम्
विभाति ताम्रं दिवि सूर्यमण्डलं
यथा तरुण्याः स्तनभारमण्डलम्¹ ॥ ६५ ॥
दिन की समाप्ति पर (सायंकाल) सूर्य का रक्ताभ मण्डल अपने
रश्मिमण्डल को समेटते हुए, आकाश में स्वर्णिमवृत्त जैसा चमकते हुए
तरुणियों के उरोजमण्डलों जैसा प्रतीत हो रहा है ॥ ६५ ॥
काञ्चीयमक—
पादस्यादौ तथान्ते² च यत्र³ स्यातां पदे समे ।
तत् काञ्चीयमकं नाम⁴ विज्ञेयं सूरिभिर्यथा ॥ ६६ ॥
यदि पाद के आदि तथा अन्त में समान पद हों तो उसे 'काञ्ची-
यमक' जानें ॥ ६६ ॥
यथा—⁵यामं यामं चन्द्रवतीनां द्रवतीनां
व्यक्ताव्यक्ता सा⁶ रजनीनां रजनीनाम् ।
फुल्ले फुल्ले सभ्रमरे वा भ्रमरे वा
रामा रामा विस्मयते च स्मयते च ॥ ६७ ॥
चन्द्र से पूर्ण रात्रियों के लम्बे प्रहर (याम) का—जो सुन्दरियों के
सान्निध्य में बीत रहे हैं—ज्ञान कभी रहता है और कभी बिखर जाता है
तथा पुष्प भ्रमरों से युक्त तथा विहीन हो रहे हैं तथा अनिन्द्य ललना गण
कहीं उसके कारण मुस्करा रही हैं और विस्मित हो रही हैं ॥ ६७ ॥
समुद्ग यमक—
⁷अर्धेनैकेन यद्वृत्तं सर्वमेव⁸ समाप्यते ।
⁹समुद्गयमकं तत्तु¹⁰ विज्ञेयं नामतो यथा ॥ ६८ ॥
लक्षण वृत्त के अर्ध भाग की आवृत्ति द्वारा सम्पूर्ण वृत्त की पूर्ति 'समुद्ग
यमक' कहलाती है ॥ ६८ ॥
१. क० पुस्तके तु—
लोकानां प्रभविष्णुर्दैत्येन्द्रगदानिपातनसहिष्णुः ।
जयति सुरदैत्यजिष्णुर्भगवानसुरवरमथनकारि विष्णुः ॥
इति पद्यम् अधिकं प्रक्षिप्तञ्च ।
२. तथा चादौ—क०, ग० तथा चान्ते—ख० ।
३. स्यातां यत्र—ख०; स्यातां तत्र—ग० । ४. चैव—ग० ।
५. माया माया—ख०; ग० । ६. सारजनी सा रजनी सा—क० ।
७. सार्धेनैकेन—क० । ८. सर्वमेवं—क० ।
९. सामुद्ग—क० । १०. नाम तज्ज्ञेयं पण्डितैर्यथा—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः २९३
यथा—केतकीकुसुमपाण्डुरदन्तः१ शोभते प्रवरकाननहस्ती ।
केतकीकुसुमपाण्डुरदन्तः२ शोभते प्रवरकाननहस्ती ॥ ६९ ॥
इस विशाल वन-गज के दांत केतकी के पुष्पों जैसे श्वेत पीत दिखाई
दे रहे हैं। तथा हाथी-रूपी विशालवन अपने केतकी के पुष्पों के पीले नीले
रंग के दांतों से और अधिक सुन्दर दिखलाई पड़ता है ॥ ६९ ॥
विक्रान्त यमक—
एकैकं पादमुत्क्रम्य३ द्वौ पादौ सदृशौ यदा४।
विक्रान्तयमकं नाम ५विज्ञेयं नामतो यथा ॥ ७० ॥
यदि एक पाद को छोड़कर दूसरा पाद समान हो (अर्थात् द्वितीय और
चतुर्थ पाद की रचना समान हो) तो उसे 'विक्रान्त यमक' जानें ॥ ७० ॥
यथा—स६ पूर्वं वारणो भूत्वा द्विशृङ्ग इव पर्वतः।
अभवद्दन्तवैकल्याद्विशृङ्ग इव पर्वतः ॥ ७१ ॥
यह हाथी पहिले अपने दो अंगों (दांत, चोटी) वाले पर्वत से तुलनीय
रहता था अब इसके दोनों दांत टूट जाने से यही शृङ्गहीन पर्वत जैसा हो
रहा है ॥ ७१ ॥
चक्रवाल यमक—
पूर्वस्यान्तेन पादस्य ७परस्यादिर्यदा समः।
चक्रवच्चक्रवालं तद् विज्ञेयं नामतो यथा८ ॥ ७२ ॥
यदि पादान्त शब्द की दूसरे पाद के प्रारंभ में आवृत्ति की जाए तो उसे
'चक्रवाल यमक' कहते हैं ॥ ७२ ॥
यथा—शैलास्तथा९ शत्रुभिराहताहता
हताश्च १०भूयस्त्वनुपुङ्गगैः खगैः।
१. मुकुल—ख०; ग० । २. मुकुल—ख०; ग० ।
३. मुत्क्षिप्य—ख० । ४. यदि—ग० । ५. तद्विज्ञेयमिदं—क० ।
६. सम्पूर्णवारणो—ख०; स पूर्वं वानरो—ग० ।
७. पादस्या—क० ।
८. चक्रवालयमकस्य लक्षणान्तरं क—पुस्तके तु —
तुल्यात् पादद्वयादन्त्यादेकेनादिर्यदा समः ।
सर्वत्र चक्रवालं तद्विज्ञेयं नामतो यथा ॥ इति अधिकं प्रक्षिप्तञ्च ।
९. तलैस्तथा—क०; शैला यथा—ख० ग० ।
१०. भूयोऽप्यनु—ख०; बाणैरनुपुङ्गगै—ग० ।

२९४ नाट्यशास्त्रम्
खगैश्च सर्वैर्य्युधिसञ्चिताश्रिता-१
श्रिताधिरूढ़ा २निहतास्तलैस्तलैः ॥ ७३ ॥
जैसे ये पर्वत शत्रुओं के बाणों और उनके पीछे आने वाले शिकारी
पक्षियों से आहत होकर मर गए वैसी ही यह युद्ध भूमि भी ऐसे 'खों वाले'
पक्षियों की तरह बाणों से आच्छादित हो गई है और चिता पर रखे हुए शव
इन पक्षियों की चोंचों से और नखों से क्षतविक्षत हो गए हैं ॥ ७३ ॥
सन्दष्ट-यमक—
आदौ द्वे यत्र पादे तु भवेतामक्षरे समे ।
३सन्दष्टयमकं नाम विज्ञेयं ४नामतो यथा ॥ ७४ ॥
यदि पाद के प्रारंभ में दो समान शब्दों की आवृत्ति हो तो 'सन्दष्ट-
यमक' होता है ॥ ७४ ॥
यथा—
पश्य५ पश्य रमणस्य मे गुणान्६ येन येन वशगां करोति माम् ।
येन येन हि ममैति दर्शनं७ तेन तेन वशगां करोति माम् ॥ ७५ ॥
देखो देखो, मेरे प्रिय की विशेषताएं; जिनसे वह मुझे आकृष्ट कर रहा है,
यह जब भी मेरी दृष्टि में आता है तभी मुझे अपनी ओर झुका लेता है ॥७५॥
पादादियमक—
आदौ पादे ८तु यत्र स्यात् समावेशसमाक्षरः९ ।
पादादियमकं नाम विज्ञेयं१० नामतो यथा ॥ ७६ ॥
यदि प्रत्येक पाद के प्रारंभ में आनेवाले शब्द की आगे के सभी पादों में
आवृत्ति हो तो 'पादादियमक' होता है ॥ ७६ ॥
यथा—विष्णुः सृजति भूतानि विष्णुः संहरते प्रजाः ।
विष्णुः ११प्रसूते त्रैलोक्यं १२विष्णुर्लोकाधिदैवतम् १३ ॥७७॥
१. सञ्चिताञ्चिता—ग० ।
२. निहताः फलैः फलैः—ख; हि हता हता नराः—ग० ।
३. सन्दंशं—क० । ४. तद् बुधैः—ख०; ग० ।
५. यस्य यस्य—ग० । ६. गुणाः—क०; ग० ।
७. दिनमेति—ख०; हि समैति—ग० । ८. पादस्य—ख०; ग० ।
९. समावेशः समाक्षरः—ख०; ग० ।
१०. तद्विज्ञेयं बुधैर्यंथा—ख०; ग० । ११. विष्णुप्रसूतं—क० ।
१२. यच्च—क० । १३. लोकादिदैवतम्—ख० ।

सप्तदशोऽध्यायः ३९५
विष्णु समस्त प्राणियों की रक्षा करते हैं, वे ही संहार करते हैं तथा वे
ही त्रिलोकी का निर्माण भी करते हैं। ये श्री विष्णु भगवान् सभी लोकों के
स्वामी हैं ॥ ७७ ॥
आम्रेडित यमक—
पादस्यान्त्यं पदं १यत्र द्विर्द्विरेकमिहोच्यते ।
२ज्ञेयमाम्रेडितं नाम यमकं तत्तु सूरिभिः ॥ ७८ ॥
यदि पाद का अन्तिम पद दो बार आवृत्त हो तो उसे आम्रेडित यमक
जानो ॥ ७८ ॥
यथा—
विजृम्भितं निःश्वसितं मुहुर्मुहुः ३कथं विधेय स्मरणं पदे पदे ।
यथा च ते ध्यानमिदं पुनः पुनः ४ध्रुवं गता ते रजनी विना विना ॥७९॥
लम्बी उसासें लेते हुए जैसे ही तुमने उसका नाम लिया उसका मुझे
तुरन्त स्मरण हो आया और फिर निश्चल हो उसी के ध्यान में ( मेरी )
उदास होते हुए मेरी सारी रात बीत गई ॥ ७९ ॥
चतुर्व्यवसित यमक—
सर्वे पादाः समा यत्र भवन्ति नियताक्षराः ।
चतुर्व्यवसितं नाम तद्विज्ञेयं बुधैर्यथा ॥ ८० ॥
यदि चारों पाद समान अक्षर वाले हों तो 'चतुर्व्यवसित यमक'
होता है ॥ ८० ॥
यथा— ५वारणानामयमेव कालो वारणानामयमेव कालः ।
वारणानामयमेव कालो वारणानामयमेव कालः ॥ ८१ ॥
यह समय पुष्पों ( वारण ) ( की बहार ) का है, यही वह ऋतु है जब
हाथी ( वारण ) व्याधिरहित होता है । यह शत्रुओं के ( आक्रमण हेतु )
आने का समय और उनके प्रतीकारार्थ वीरों के युद्धभूमि में कूदने का भी
यही समय है ॥ ८१ ॥
१. यच्च—ग० ।
२. पादान्ताम्रेडितं नाम विज्ञेयं निपुणैर्यथा—ख०; ग० ।
३. यथाभिधानं—क०; ग०; कथाभिधानं—ख० ।
४. तथागता ते—ख०; ग० ।
५. सावारणानामिति सर्वत्र पाठः । ख० पुस्तके; ग० पुस्तके तु 'सावारणा-
नामसमेव' इति पाठः समुपलभ्यते ।

२९६ नाट्यशास्त्रम्
मालायमक—
नानारूपैः स्वरैर्युक्तं१ यत्रैकं व्यञ्जनं भवेत् ।
तन्मालायमकं नाम विज्ञेयं काव्यकोविदैः२ ॥ ८२ ॥
जब अनेक व्यञ्जनों से युक्त एक ही स्वर विभिन्न शब्दों में आता हो तो
उसे मालायमक कहते हैं ॥ ८२ ॥
यथा—हली बली हली३ माली खेली४ माली सली जली ।
५खलो बलो बलो मालो मुसली त्वभिरक्षतु६ ॥ ८३ ॥
जो वीर, मालाओं से विभूषित, हाथ में अनाज की बाली रखे हुए,
खिलाड़ी, लड़खड़ा कर चलने वाले, भावों से ओतप्रोत, शक्तिशाली, चंचल
नेत्रों वाले और हाथ में गदा धरने वाले हैं वे भगवान् बलराम तुम्हारी
रक्षा करें ॥ ८३ ॥
असौ हि रामा रतिविग्रहप्रिया७ रहः प्रगल्भा रमणं मनोगतम्८ ।
रतेन रात्रौ९ रमयेत् परेण वा न चेदुदेष्यत्यरुणः पुरो रिपुः ॥८४॥
प्रणय द्वन्द्व में रुचि लेने वाली यह सुन्दरी रमणी रात में अपने
प्रगाढ़ आलिंगन से अपने प्रियतम को बिना लज्जा किये हुए तब तक
रिझाती रहेगी जब तक उसका शत्रु सूर्य सम्मुखवर्ती पूर्व दिशा में उदय
नहीं हो जाता ॥ ८४ ॥
स पुष्कराक्षः क्षतजोक्षिताक्षः१० क्षरत्क्षतेभ्यः क्षतजं दुरीक्ष्यम्११ ।
क्षतैर्गवाक्षैरिव संवृताङ्गः१२ साक्षात् सहस्राक्ष इवावभाति ॥८५॥
यह वीर जो कमल के समान नेत्र वाला है, जिसके नेत्र क्रोध से भरे
होने से रक्त से नहाए हुए से लगते हैं, जिसके घावों से रक्त बह रहा है और
जिसके शरीर के घाव वातायन के समान मोटे और खुले हुए हैं, अतएव
यह सम्प्रति सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र जैसा लग रहा है ॥ ८५ ॥
१. यत्र—ग० । २. पाठकैर्यथा—ख०; पण्डितैर्यथा—ग० ।
३. लली—ख०; ग० । ४. शूली जाली लली जली—ख०; ग० ।
५. बलो बलोच्चलोलाक्षो—ख०; ग० ।
६. त्वाभिरक्षतु—ग० । ७. विग्रहः—ख० ।
८. मनोद्गतम्—क०; रहोगतम्—ख०; ग० ।
९. रात्रि—ख०; ग० । १०. क्षतजीक्षिताक्षः—ख०; ग० ।
११. दुरीक्ष्यः—ख० । १२. संवृताक्षः—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः २१७
एभिरर्थक्रियायुक्तैः¹ काव्यं कुर्यात्तु² लक्षणैः।
अतः परं³ प्रवक्ष्यामि काव्यदोषान् गुणाँस्तथा⁴ ॥ ८६ ॥
नाटकों की रचना (उनके) विषय तथा कार्य (अवस्था) आदि का
विचार करते हुए इन अलङ्कारों की योजना काव्य में करनी चाहिए। अब मैं
काव्य रचनाओं में होने वाले दोषों को बतलाता हूँ ॥ ८६ ॥
काव्यदोष—
⁵गूढार्थमर्थान्तरमर्थहीनं भिन्नार्थमेकार्थमभिप्लुतार्थम्।
न्यायादपेतं विषमं विसन्धि शब्दच्युतं⁶ वै दश काव्यदोषाः ॥८७॥
काव्यगत दोष दस (प्रकार के) हैं। यथा—(१) गूढार्थ,
(२) अर्थान्तर, (३) अर्थहीन, (४) भिन्नार्थ, (५) एकार्थ,
(६) अभिप्लुतार्थ, (७) न्यायादपेत, (८) विषम, (९) विसन्धि
तथा (१०) शब्दच्युत ॥ ८७ ॥
⁷पर्यायशब्दाभिहितं गूढार्थमिति⁸ संज्ञितम्।
गूढार्थः—जहां पर्यायवाचक (अप्रसिद्ध) शब्दों द्वारा वर्ण्य या विषय
को कह दिया जाय तो उसे 'गूढार्थ' समझना चाहिए।¹
अवर्ण्यं वर्ण्यते यत्र⁹ तदर्थान्तरमिष्यते ॥ ८८ ॥
अर्थान्तर—जहाँ अवर्णनीय विषय का वर्णन किया जाय उसे अर्थान्तर²
दोष कहा जाता है ॥ ८८ ॥
१. 'गूढार्थ' में क्लिष्ट शब्द का प्रयोग करने से अर्थ-ज्ञान में कठिनाई आ
जाती है। जैसे—दशरथ के लिये 'एकाधिकनवविमान' पद का प्रयोग।
परवर्ति आचार्योंके 'निहतार्थत्व' दोष से इसकी तुलना की जा सकती है।
२. वर्णनीय अर्थ के साथ किसी अनभीष्ट या अवर्णनीय अर्थ की भी जब साथ-
साथ प्रतीति हो तो 'अर्थान्तर' होता है। जैसे—'चिन्तामोहमनङ्गमङ्ग
तनुते विप्रेक्षितं सुभ्रुवः' यहाँ काम का बतलाना इष्ट है पर इसी के साथ
बुद्धि में चिन्ता और मोह की भी बिना वर्णन के प्राप्ति हो जाती है।
इसे मम्मटादि सम्मत 'अमतपरार्थता' दोष मानना चाहिए।
१. क्रियापेक्षं—ख०; क्रियापेक्षैः—ग०।
२. कार्यं तु—ख०। ३. ऊर्ध्वं तु वक्ष्यामि—ग०।
४. समासतः—ख०; दोषाँस्तथाविधान्—ग०।
५. अगूढ—ग०। ६. च्युतञ्च शब्दात्—शब्दात् च्युतं—क०।
७. इतः आरभ्य सार्धश्लोकपञ्चकं केषुचिदादर्श पुस्तकेषु नास्ति।
८. मभिसंज्ञितम्—क०; ग०। ९. यत्तु—क०।

२९८ :नाट्यशास्त्रम्
अर्थहीनं त्वसम्बद्धं ¹सावशेषार्थमेव च ।
अर्थहीन—जो असम्बद्ध अर्थ हो या जो अर्थ असमाप्त ( अधूरा ) हो
तो उसे 'अर्थहीन' दोष कहा जाता है ।
भिन्नार्थमभिविज्ञेयमसम्य² ग्राम्यमेव च ॥ ८९ ॥
भिन्नार्थ—असभ्य या ग्राम्य अर्थ के सूचक अर्थ को भिन्नार्थ² दोष
जानो ॥ ८९ ॥
विवक्षितोऽन्य³ एवार्थो ⁴यत्रान्यार्थेन विद्यते ।
भिन्नार्थं तदपि⁵ प्राहुः काव्यं काव्यविचक्षणाः⁶ ॥ ९० ॥
अथवा जहाँ विविक्षित अर्थ के स्थान पर अविवक्षित अर्थ का कथन
किया जाय तो उसे भी विद्वान् 'भिन्नार्थ' दोष कहते हैं ॥ ९० ॥
⁷अविशेषाभिधानं यत्तदेकार्थमिति स्मृतम् ।
१. पूर्व कथन से उत्तर कथन के विरोध होने पर अर्थ के असम्बद्ध हो जाने
से यह दोष हो जाता है । जैसे—'अद्यापि स्मरति रसालसं मनो मे
मुग्धायाः स्मरचतुराणि' इत्यादि । ( मेरा रस या आनन्द से मन्थर मन
अभी भी उस स्मरचतुरा मुग्धा ( भोली ) का स्मरण करता है ) यहाँ
मुग्धा कहकर स्मरचतुरा बतलाना पूर्वकथन से उत्तरकथन का विरोध
है । इसी प्रकार असमाप्त या अधूरे कथन के रहने पर यह उदाहरण—
'स महात्माभाग्यवशान्महापदमुपागतः ।' ( वह महामना भाग्यवश महान्
पद या महती आपत्ति को प्राप्त कर गया । ) प्रस्तुत उदाहरण में
प्रकरण के अनुसार अन्य सम्बद्ध शब्द की न्यूनता या वक्तव्य शेष होने से
'अर्थहीन' दोष हो गया है ।
२. भिन्नार्थ दोष की तीन अवस्था में उपलब्धि होगी । ( १ ) जहाँ व्यवधान
के कारण अर्थ का अन्वय करने में कठिनाई आए, ( २ ) जहाँ असभ्य
या ग्राम्य अर्थ का अभिधान हो तथा ( ३ ) विवक्षित या उद्दिष्ट अर्थ के
विपरीत कथन या उद्दिष्टार्थ का अन्यथाकरण हो ।
१. सा त्वशेषार्थमेव च—ख०; ग० ।
२. मपि—क० । ३. विवक्षितान्य—क० ।
४. यत्वन्यार्थेन भिद्यते—क०; ग० । ५. तत्तु ते—क० ।
६. काव्यविदो जनाः—क०; काव्यविचक्षणाः—ख०; ग० ।
७. एकार्थस्याभिधानं यत्—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः २९९
एकार्थ—जहां अनेक शब्दों का एक ही अर्थ के लिए प्रयोग किया जाय
तो 'एकार्थ' नामक दोष होता है।
१अभिप्लुतार्थं विज्ञेयं यत् पदेन समस्यते ॥ ९१ ॥
अभिप्लुतार्थ—जिसके प्रत्येक पाद में संक्षेप में वाक्यार्थ (पूर्णरूप से)
स्थापित किया जाय उसे 'अभिप्लुतार्थ'२ नामक दोष जानो ॥ ९१ ॥
न्यायादपेतं विज्ञेयं २प्रमाणपरिवर्जितम् ।
न्यायादपेत—प्रमाण रहित विषय का कथन 'न्यायादपेत'३ नामक
काव्य दोष कहलाता है।
वृत्तभेदो३ भवेद्यत्र विषमं नाम तद्भवेत् ॥ ९२ ॥
विषम—छन्दों भंग होने पर 'विषम'४ नामक काव्य-दोष हो जाता है।
४अनुपश्लिष्टशब्दं यत् तद्विसन्धीति कीर्तितम् ।
१. एकार्थ दोष का उदाहरण है :—'कुन्देन्दुहारहरहाससितम्' यहाँ वर्ण्य की
शुभ्रता के लिये कुन्द, चन्द्र, पुष्पमाला, शिवजी का हास आदि अनेक
उपमाएँ दी जाने से यह कथन एक ही अर्थ की पूर्ति करता है।
२. प्रत्येक पाद में अर्थ समाप्त हो जाने के कारण एकवाक्यता न आने से
अभिप्लुतार्थ दोष हो जाता है। जैसे :—
स राजा नीतिकुशलः सरः कुमुदशोभितम् ।
सर्वाप्रिया वसन्तश्री ग्रीष्मे मालतिकागमः ॥
यहाँ प्रत्येक पाद का अर्थ दूसरे किसी पाद के विषय से सम्बद्ध नहीं है।
३. प्रमाणरहित विषय का आशय है कि देश तथा काल के या कला एवं
शास्त्रादि के विपरीत अभिधान करना न्यायादपेत दोष है।
जैसे—सुबीरेष्वस्ति नगरी मथुरा नाम विश्रुता ।
अक्षोटनारिकेलाढ्या यस्याः पर्यन्तभूमयः ॥ इति ।
४. यति भंग के या छन्द के लक्षण का व्यवस्थित अनुगमन न करने के
कारण 'विषम' नामक काव्यदोष होगा। इसे ही उत्तरवर्ती आचार्यों ने
'हतवृत्तता' दोष कहा है।
१. अविप्लुतार्थ—क० ।
२. नोपपन्नं भवेत्तु यत्—क०; प्रमाणपरिवर्तितम्—ग०।
३. वृत्तभेदे—क०; वृत्तदोषो—ख०; ग०।
४. अनुपारूढ़शब्दश्च विसन्धिः परिवर्जितः—क०; अनुप्रतिष्ठाशब्दं यत्
तद्विसन्धीति काशितम्—ख०; ग० ।

यहाँ पृष्ठ की सामग्री का पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:

३०० नाट्यशास्त्रम्
विसन्धि—यदि शब्दों को परस्पर सन्धि हीन दशा में रखा जाय तो
वहाँ 'विसन्धि' नामक दोष होता है।
'शब्दच्युतश्च विज्ञेयमवर्णस्वरयोजनात्' ॥ ९३ ॥
शब्दच्युत—जहां एक वर्ण या स्वर का लोप कर दिया जाय तो वहाँ
'शब्दच्युत'² दोष होता है ॥ ९३ ॥
³एते दोषा हि काव्यस्य मया सम्यक् प्रकीर्तिताः ।
गुणा विपर्ययादेषां माधुर्यौदार्यलक्षणाः ॥ ९४ ॥
काव्य के ये ही दोष हैं जो मैंने आपको बतलाए। इन्हीं दोषों का
विपरीत स्वरूप में रहना 'गुण' कहलाता है जो उनके लक्षणानुसार माधुर्य,
औदार्य आदि अर्थों को वहन करते हो ॥ ९४ ॥
काव्य-गुण—
श्लेषः प्रसादः समता समाधिः माधुर्यमोजः पदसौकुमार्यम् ।
अर्थस्य च व्यक्तिरुदारता च कान्तिश्च ⁴काव्यस्य गुणा दशैते ॥ ९५ ॥
१. सन्धि के नियमों की उपेक्षा करने से काव्य में विसन्धि दोष हो
जाता है।
२. शब्दच्युत नामक दोष प्राकृतिक कारणों या दैनिक आदत के कारण
किन्हीं वर्ण के लोप करने या अन्यथा-करण के कारण होता है।
आचार्य अभिनवगुप्त ने इन दोषों में स्थूल दोषों को अनित्य तथा
शेष अRequest स्थूल दोषों को नित्य माना है। उनका मत है कि गूढ़ार्थ का
पताकास्थानकादि में प्रयोग करना, अनुवाद में अर्थान्तर दोष का प्रयोग
करना, हास्य में अर्थहीन दोष का प्रयोग, श्रोत्रियादि वक्ता के समक्ष
भिन्नार्थ दोष का प्रयोग, दूसरे को समझाने में एकार्थ दोष का प्रयोग,
उन्मादादि की दशा में अभिप्लुतार्थ दोष का प्रयोग तथा स्वयं के लिये
भिन्नवृत्त या विसन्धिदोष का प्रयोग-स्थल होने के कारण ग्राह्य या
प्रयोज्य हो सकता है अथवा ऐसी स्थिति में ये दोष नहीं भी माने जा
सकते हैं।
१. शब्दाच्च्युतं—क०; शब्दहीनं—ख०; ग० ।
२, मशब्दस्य च योजनात्—ख०; ग० ।
३. एते दोषास्तु विज्ञेयाः सूरिभिर्नाटकाश्रयाः ।
एत एव विपर्यस्ताः गुणाः काव्येषु कीर्तिताः ॥—ख०; ग० ।
४. काव्यार्थगुणा दशैते—ख० ।

सप्तदशोऽध्यायः ३०१
काव्य के दस गुण होते हैं। १ यथा - (१) श्लेष (२) प्रसाद
(३) समता (४) समाधि (५) माधुर्य (६) ओज (७) पद-
सौकुमार्य (सुकुमारता) (८) अर्थव्यक्ति (९) उदारता तथा
(१०) कान्ति ॥ ९५ ॥
श्लेष—
ईप्सितेनार्थजातेन १सम्बद्धानां परस्परम् ।
श्लिष्टता या पदानां २स श्लेष इत्यभिधीयते ॥ ९६ ॥
इष्ट अर्थों से परस्पर-सम्बद्ध पदों की श्लिष्टता (मसृणबन्धयोग) को
'श्लेष'-गुण कहा जाता है ॥ ९६ ॥
१. भामह तथा दण्डी ने काव्य के दस गुण माने हैं परन्तु उनके वर्णन
लक्षणादि भरतमुनि से भिन्न प्राप्त होते हैं। (द्र० भाम० काव्या० ३।१-४,
काव्यादर्श १।४१-९४) गुणों के लक्षण दो पाठों या तीन पाठों में मिलते हैं।
हेमचन्द्राचार्य आदि ने भरत के आधार पर गुणों का एक अलग ही पाठ
लिया जिसका वर्तमान नाट्यशास्त्र से भिन्न पाठ है। पर यह सभी गुणों
के लक्षणों में नहीं है। इसी कारण सभी लक्षणों को सम्मिलित करते
हुए तथा कुछ स्वोद्भावित गुणों को बढ़ाकर भोज तथा विद्यानाथ प्रभृति
ने चौबीस गुण प्रतिपादित किये हैं। कुछ आलङ्कारिक वामन एवं दण्डी
का अनुसरण करते हुए दस उनके सम्मत गुण मानते हैं। मम्मट तथा विश्वनाथ
कविराज ने तीन गुण ही काव्य के लिये स्वीकृत किये। गुणों के लक्षणानुसारी
विशद विवेचन का विकासपूर्ण क्रम हमने संक्षेप में परिशिष्ट में दे दिया है।
२. आचार्य अभिनवगुप्त के व्याख्यान के अनुसार कवि के द्वारा इष्ट अर्थों की
परस्पर सम्बद्ध पदों के द्वारा योजना करने पर जब पदों का परस्पर सन्धान इष्ट
अर्थ को उपपादित करता है तो 'श्लेष' नामक गुण समझना चाहिए। जैसे वामन
के द्वारा उदाहरण दिये गये निम्न पद्य में—
दृष्ट्वैकासनसंस्थिते प्रियतमे पश्चादुपैत्यादरात्
एकस्या नयने निमील्य विहितक्रीडानुबन्धच्छलः ।
ईषद्वक्रितकन्धरः सपुलकप्रेमोल्लसन्मानसा-
मन्तर्हासलसत्कपोलफलकां धूर्तोऽपरां चुम्बति ॥ (अम० श०)
(धूर्त नायक एक आसन पर बैठी हुई अपनी दोनों प्रियाओं को देखकर
आदरपूर्वक चुपचाप पीछे से आया और क्रीडा के व्याज से एक प्रिया की आँखें
१. सम्बद्धानुपस्परम्—ख०; ग० । २. हि—ख०; ग० ।

३०२ नाट्यशास्त्रम्
[ १विचारगहनं यत् स्यात् स्फुटश्चैव स्वभावतः ।
स्वतः सुप्रतिबद्धश्च श्लिष्टं तत् परिकीर्तितम्² ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—जो रचना (वृत्ति) तर्क से विचार करने के उपरान्त ग्रहण
की जाय, जो स्वभाव से स्फुट तथा स्वयं एक दूसरे से अच्छी प्रकार संग्रथित
अर्थ वाली हो तो उसे भी 'श्लेष' गुण कहते हैं । ]
प्रसाद—
अप्यनुक्तो बुधैर्यत्र शब्दोऽर्थो वा प्रतीयते ।
सुखशब्दार्थसंयोगात्³ प्रसादः स तु कीर्त्यते ॥ ९७ ॥
सरल शब्दों तथा अर्थों के प्रयोग द्वारा बिना (स्पष्टता बोधक)
व्याख्यान के ही जहां अर्थावबोध सरलता से होता हो तो उसे 'प्रसाद'
गुण जानो ॥ ९७ ॥
समता—
नातिचूर्णपदैर्युक्ता न च व्यर्थाभिधायिभिः ।
⁴दुर्बोधैर्नैश्च न कृता समत्वात् समता मता ॥ ९८ ॥
अपने हाथों से बन्द कर अपनी गर्दन टेढ़ी करके प्रेम से रोमाञ्चित एवं मुस्कराने
वाली दूसरी प्रिया का चुम्बन करने लगा ।)
उक्त उदाहरण में एक साथ तथा एक ही समय दोनों नायिका के हृदय
ग्रहण करने के उद्योग को इतनी सम्बद्ध पदावली में उपपादित किया गया है कि
जिससे किसी भी नायिका की असंभावना के लिये थोड़ा भी अवकाश नहीं रहता
और नायक का कुटिलतापूर्ण आरम्भ भी हृदय में पैठकर माधुर्य की ही सृष्टि
करता है ।
१. अनुपयुक्त पदावली के अभाव के कारण बिना क्लिष्ट कल्पना के जब
अर्थ स्वयं (निर्मलता के कारण) प्रतीत होने लगे तो 'प्रसाद' गुण होता है ।
जैसे : —'सवर्णा कन्यका रूपयौवनारम्भशालिनी ।' (रूप एवं यौवन की प्राप्ति
के आरम्भ से सुशोभित यह कन्या सजातीय अथवा इष्ट है) ।
इस उदाहरण में अर्थ की निर्मलता धूल से असम्पृक्त जल सदृश अतिस्पष्ट
दिखलाई देती है तथा इस पद्य के उच्चारण मात्र से कन्या का विवाह के योग्य
होना, सुन्दरतापूर्ण होने से हृदयाकर्षक रहना तथा गृहस्थ धर्म के उपयुक्त होना
आदि अर्थ स्वतः व्यक्त हो जाने के कारण 'प्रसाद' गुण है ।
१. विचार्य ग्रहणं वृत्या—ग० । २. परिकीर्त्यते—ग० ।
३. सम्बोधात्—ग० । ४. न दुर्बोधा तैश्च कृता—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः ३०३
जिस रचना में असमस्त पद हों, वे व्यर्थ का अर्थ प्रकट न करते हों
तथा दुर्बोध न हों तो उसे शब्दों की समानता के कारण 'समता' नामक
गुण कहते हैं ॥ ९८ ॥
[ १अन्योन्य सदृशा यत्र तथा ह्यन्योन्यभूषणाः ।
अलङ्कारा गुणाश्चैव समाः२ स्युः समता मताः ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—जहां अलंकार तथा गुण समभाव से स्थित होकर एक दूसरे
के ( परस्पर ) शोभाक हों तो 'समता' नामक गुण जानो । ]
समाधि—
अभियुक्तैर्विशेषस्तु योऽर्थस्येहोपलक्ष्यते३ ।
तेन चार्थेन सम्पन्नः समाधिः परिकीर्तितः४ ॥ ९९ ॥
प्रतिभाशाली व्यक्तियों के द्वारा विशेष अर्थ जिस रचना में देख लिया
जाय तो उसे 'समाधि' गुण जानों ॥ ९९ ॥
[ उपमाद्युपदिष्टानांमर्थानां५ यत्नतस्तथा ।
प्राप्तानाञ्चापि६ सङ्क्षेपात् समाधिर्निर्णयो७ यतः ॥ ]
१. आरम्भ किये हुए रचनाक्रम का परित्याग न करते हुए जब असमस्त
पदावली में रचना की जाए तो निष्प्रयोजन तथा दुर्बोध अर्थ के अभिधान न होने
से समता गुण कहलाता है। जैसे :—
'मनसि च गिरं गृह्णन्तीमे किरन्ति न कोकिलाः।'
प्रस्तुत उदाहरण में विप्रलम्भ के उद्दीपक कथन को बिना निरर्थक पदावली
का विस्तार करते हुए असमस्त रचना के द्वारा प्रस्तुत कर दिया गया है।
२. जिस काव्य रचना के अन्य अर्थ का अति प्रतिभाशाली पुरुष ही अपूर्वता
के कारण उल्लेख कर सकें उस एकतानता से उन्नेय या समाहित मन से प्रतीत
अर्थ विशेष के उल्लेख को 'समाधि' समझना चाहिए। यह अपूर्वता अयोनि
अथवा अपूर्वार्थ तथा अन्यच्छाया योनि अर्थ से आती है। इसके अतिरिक्त यहाँ
पदबन्ध में आरोह अवरोह के क्रम का निर्वाह भी अपेक्षित माना जाता है।
१. अन्योन्य सदृशं यत्र तथा ह्यन्योन्यभूषणम्—ख०; ग० ।
२. समासात् समता यथा—ग० ।
३. र्थस्यैबोपलभ्यते—ख०; ग० । ४. परिकीर्त्यते—ग० ।
५. उपमित्युपदिष्टानां—उपमात्यपदिष्टानां—क० ।
६. क्वातिसंयोगात्—क०; क्वातिसंयोगः—ग० ।
७. परिकीर्त्यंते—क० ।

image again very, very carefully.
Let's trace each glyph between मन्था and वाम्भः:

  1. स् + त -> स्त
  2. ा -> mātrā
  3. A circle at mid-height: ° or ं? Wait, is it an anusvāra? No, it's a hollow circle. Wait, no, is it hollow? Look at सङ्घट्ट in the line below, look at the anusvara above स: it's a solid dot.
    The circle in line 25 is hollow: ० or °.
    Wait, what does a hollow circle mean in Sanskrit texts?
    It's often an abbreviation sign ० or indicates an omission / damaged letter in the manuscript!
    When a letter is broken/missing, editors put ° or ०!
    Wait, स्तब्ध has 2 letters (स्त and ब्ध).
    If ब्ध was omitted or illegible, they might have printed मन्थास्ता०र्णवाम्भः or मन्थास्तार्णवाम्भः!
    Wait, look at the glyph:
    Is it ा then ० then र्‍ण?
    Wait, could it be: मन्थास्तार्णवाम्भः where the ा is actually an independent stroke, and

सप्तदशोऽध्यायः ३०५
[ अवगीतोऽपि¹ हीनोऽपि स्यादादुदात्तावभासकः² ।
यत्र शब्दार्थसम्पत्या³ तदोजः परिकीर्तितम् ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—जो रचना निन्दित (या हीन) होने पर भी उदात्त-अर्थ की
प्रतीति करवाने वाली हो तो शब्द और अर्थ की सम्पत्तिशालिनी ऐसी
रचना 'ओज' (गुण युक्त) कहलाती है । ]
सौकुमार्य—
⁴सुखप्रयोज्यैर्यच्छब्दैर्युक्तं सुश्लिष्टसन्धिभिः ।
सुकुमारार्थसंयुक्तं सौकुमार्यं⁵ तदुच्यते ॥ १०२ ॥
जो सुश्लिष्ट सरलता से युक्त सन्धि के कारण सरलता से व्यवहार किये
जाने वाले शब्दों तथा सुकुमार अर्थ से युक्त हो तो उसे ‘सौकुमार्य’ गुण
कहते हैं ॥ १०२ ॥
यहाँ 'र' वर्णं 'न्द' वर्णं की गुरुता की अपेक्षा से ग्रथित है । इसके अतिरिक्त
जब एक वस्तु की अनेक पदों से विस्तारपूर्वक वर्णना की जाए—जैसे
कालिदास के निम्न पद्य में—
"अथ नयनसमुत्थं ज्योतिरत्रेरेव द्योः सुरसरिदिव तेजो वह्निनिष्ठ्यूतमैशम् ।”
(रघु० २।७५)
तथा संक्षेप में अर्थभूयस्त्व को प्रकट करने पर भी 'ओज' गुण समझना
चाहिए। जैसे कुमारसंभव के निम्न पद्य में—
“ते हिमालयमामन्त्र्य पुनः प्रेक्ष्य च शूलिनम् ।
सिद्धञ्चास्मै निवेद्यार्थं तद्विसृष्टाः खमुद्ययुः ॥” (कु० सं० ६।९३)
आचार्य हेमचन्द्र ने भरत के 'अवगीतोऽपि' लक्षण के अनुसार ओजगुण
का स्वरूप माना है।
१. जब पदगत रूक्षता या अर्थ के परुष रहने पर भी सुकुमारतापूर्ण
बन्ध रचना ग्रथित हो तो सौकुमार्यगुण समझना चाहिए । जैसे—
एकाकी के लिये देवतासहाय जैसे पद का या मृत व्यक्ति के लिये
यशःशेष पद का प्रयोग करना सुकुमारता है ।
१. अवगीतविहीनोऽपि—क०; अवगीताविहीनोऽपि—ख० ।
२. वभावकः—ख०; ग० । ३. सम्पत्तिस्तदोजः—ख०; ग० ।
४. मुख्यप्रयो—ख० । ५. सुकुमारं—क० ।
२० ना० शा० द्वि०