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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 368, कुल 668 में से

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पृष्ठ 368

सुरपतिधनुरुज्ज्वलाबद्धकक्ष्या¹ तडिद्द्योतसन्नाहपट्टोज्ज्वला²
गगनतलविसारिणी³ प्रावृषेण्या दृढं मेघमालाधिकं⁴ शोभते ॥११२॥
आकाश में व्याप्त होने वाली वर्षा के बादलों की यह पाँत जो हवा
के झोकों से आगे बढ़ती दिखाई दे रही है और इसी कारण तीव्र और
गम्भीर ध्वनि कर रही है, इसने हंसों की पाँत की मेखला धारण की है।
पर्वत के समान इसका अत्यन्त विशाल स्वरूप है। यह अत्यन्त नीले पानी
को अपने अन्दर धारण किये है जो धुएँ या काजल के समान (लग रहा)
है। इसने इन्द्रधनुष-सा उज्ज्वल या चमकीला कमर-पट्टा धारण किया है
तथा बिजली की दीप्ति-के कवच-सी भास्वत्प्रभा वाली यह मेघमाला इस
समय सचमुच बड़ी सुहावनी दिखाई दे रही है ॥११२॥
आद्यञ्चैव⁵ चतुर्थञ्च पञ्चमं षष्ठमेव च।
नवमं दशमञ्चैव नैधनञ्च⁶ भवेद्गुरु ॥११३॥
पञ्चविंशतिके पादे शेषाणि च लघून्यथ।
वृत्तज्ञैः सा तु विज्ञेया क्रौञ्चपादीति नामतः⁷ ॥११४॥
क्रौञ्चपदी—यदि पचीस अक्षरों के पाद में पहला, चौथा, पाँचवाँ, छठा,
नवाँ, दसवाँ, तथा अन्तिम अक्षर गुरू हो (तथा शेष लघु हों) तो
क्रौंचपदी नामक वृत्त होता ॥११३-११४॥
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यथा—यः किल दाक्ष्यं विद्रुतसोमं⁸ क्रतुवरमचमसमपगतकलशं⁹
पातितयूपं क्षितचषालं¹⁰ विचयनमसमिधमपशुकचरुकम्¹¹।
१. बद्धशोभा—ख०। २. बन्धोज्ज्वला—ख०।
३. विचारिणी प्रावृषि प्रोन्नता—ख०। ४. मेघमालावली—क०।
५. आद्यं चतुर्थञ्च तथा—ख०; ग०।
६. अन्त्यञ्चैव गुरुण्यथ—ख०; ग०।
७. क्रौञ्चपदालक्षणं क—पुस्तके यथा—
म्भौ यदि पादे स्मावपि चेष्टावभिकृतिरपि च हि यदि खलु विहिता
नाश्च समुद्राः स्युर्विनिविष्टा यदि च खलु गुरु भवति निधनगतम्।
पञ्चभिरादौ छेदमुपेता पुनरपि यतिरिह यदि खलु दशभिः
क्रौञ्चपदेयं वृत्तविधाने सुरगणपितृगणमुनिगणविहिता ॥
८. विद्रुमसोमं—क०। ९. मनुपममपगतकलुषं—ख०।
१०. कपालं—ख०। ११. विवसनसममिव सपशुकसहितम्—ख०।
१७ ना० शा० द्वि०