नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः २४९
यथा— स्नानैश्चूर्णैः सुखसुरभिभिर्गन्धवासैश्च धूपैः¹
पुष्पैश्चान्यैः² शिरसि रचितैर्वस्त्रयोगैश्च तैस्तैः ।
नाना रत्नैः³ कनकखचितैरङ्गसम्भोगसंस्थै-
र्व्यक्तं कान्ते कमलनिलया ⁴श्रीधरेवातिभासि ॥८६॥
हे प्रिये, (कान्ते) तुम अपने स्नान, चूर्ण, लेपन, आनन्ददायी सुवास
के द्वारा (जो शरीर (कपोल से आशय है) पर लगाई गई है) (इसी प्रकार
तुम्हारे) केशों में स्थित सुगन्धित पुष्पों तथा विविध धूप गन्धों के द्वारा
और अपने शरीर पर धारण किये हुए अनेक रत्नजटित सुवर्णालंकारों के द्वारा
तुम सचमुच कमल में निवास करने वाली सुन्दरता की देवी श्री (लक्ष्मी)
सी लग रहो ॥ ८६ ॥
आद्यं चतुर्थं षष्ठञ्च दशमं नैधनं गुरु ।
⁵तद्वंशपत्रपतितं दशभिः सप्तभिर्यतिः ॥ ८७ ॥
यदि प्रथम, चतुर्थ, षष्ठ, दशम तथा अन्तिम वर्ण गुरु हो तथा दस
और सात अक्षरों पर क्रमशः यति हो तो उसे 'वंशपत्रपतित' वृत्त समझना
चाहिये ॥ ८७ ॥
यथा—एष गजोऽद्रिमस्तकतटे ⁶कलभपरिवृतः
क्रीडति वृक्षगुल्मगहने कुसुमभरनते ।
मेघरवं निशम्य मुदितः ⁷पवनजवसमः
सुन्दरि वंशपत्रपतितं पुनरपि कुरुते ॥ ८८ ॥
हे सुन्दरि, यह हाथी कुछ छोटे-छोटे हस्तिशावकों से घिरकर वृक्ष तथा
लताओं से घने और पुष्पों के भार से नमने वाले पर्वत के शिखर पर क्रीड़ा
कर रहा है। अब यह मेघ के गर्जन को सुन हर्षविभोर हो यह फिर वायु
के वेग से बाँस के वृक्षों के पत्तों को पृथ्वी पर गिराने लगा है ॥ ८८ ॥
द्वितीयमन्त्यं षष्ठं चाप्यष्टमं द्वादशं तथा।
चतुर्दशं पञ्चदशं पादे सप्तदशाक्षरे ॥ ८९ ॥
१. गन्धवाहैः सधूपैः—क.; गन्धसारैश्च धूपैः—ख.; गण्डलेपैः सुधूपैः—ग०।
२. पुष्पैर्माल्यै—ख०।
३. कनकरचितै—ग०।
४. श्रीधरेवावभासि—क०, श्रीधरा त्वं विभासि—ख०।
५. यत्र सप्तदशे पादे वंशपत्राह्वयं तु तत्—क०।
६. युवति-परिवृतः—क०। ७. पवनजववशात्—ग०।