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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 668 में से

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पृष्ठ 364

षोडशोऽध्यायः २५३
चौदहवां, पन्द्रहवां, सोलहवां तथा अन्तिम वर्ण गुरू हो तो 'सुवदना'
नामक वृत्त होता है ॥ ९७-९८ ॥
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यथा—नेत्रे लीलालालसान्ते कमलदलनिभे भ्रूचाप१ रुचिरे
गण्डोष्ठं पीनमध्यं समसहितघनाः२ स्निग्धाश्च दशनाः ।
३कर्णावंसप्रलम्बौ चिबुकमपि ४नतं घोणा सुरुचिरा
५व्यक्तं त्वं मर्त्यलोके वरतनु ६विहितास्येका सुवदना ॥९९॥
हे सुन्दरि, तुम्हारी आंखें कमल दल के समान हैं जिसके साथ भौंहें
धनुष के समान सुन्दर दिखाई दे रही हैं, आंखों की नोकें लीलापूर्ण और
अलस दिखाई दे रही हैं, तुम्हारे ओठ और कपोल अपने मध्य भाग में भरे
हुए, दांतों की पांत चमकीली समान और घनी है, कान तथा कन्धे झुके
हुए (झूलते हुए) हैं, ठुड्डी झुकी हुई और नासिका अत्यन्त सुन्दर दिखाई
दे रही है । हे सुगात्रि, इस मनुष्यलोक में तुम ही एक ऐसी सुन्दरी हो जिसे
इतने शोभन स्वरूप में बनाया गया है ॥ ९९ ॥
चत्वार्यादौ तथा षष्ठं सप्तमञ्च चतुर्दशम् ।
अष्टादशं सप्तदशं तथा पञ्चदशं पुनः ॥ १०० ॥
७अन्त्योपान्त्ये गुरुण्यत्र लघून्यन्यानि सर्वदा ।
एकविंशतिके पादे स्रग्धरा नाम सा यथा ॥ १०१ ॥
स्रग्धरा—यदि इक्कीस अक्षरों के पाद में आदि के चार, छठा, सातवां,
चौदहवां, पन्द्रहवां, सत्रहवां, अठारहवां, बीसवां तथा अन्तिम वर्ण गुरु हों
तो 'स्रग्धरा' नामक वृत्त होता है ॥ १००-१०१ ॥
१. विनते—क०; निहिते—ख०; ग० । २. घनं—ख०; ग० ।
३. कर्णौ ह्रस्वप्रलम्बौ—क०; कर्णौ पार्श्वविलम्बौ—ख०; ग० ।
४. तटन्नता—क०; मपि नतो—ग० ।
५. सर्वस्वं—क०; सर्वस्मिन्—ख०; ग० ।
६. विदितास्येका—ख०; ग० ।
७. अन्त्यञ्च विंशकञ्चैव गुरुसंज्ञानि यत्र तु—क० ।
८. क—पुस्तके स्रग्धराया लक्षणन्त्वेवं पठ्यते—
म्रौ भ्नौ यौ यश्च सम्यग्यदि हि विरचिताः स्युस्त्रिकाः पादयोगे
वर्णैः पूर्वापदिष्टैर्यतिरपि च पुनः सप्तभिः सप्तभिः स्यात् ।
वृत्तं सम्यग्यदि स्यात् प्रकृतिमनुगतं तत्त्वविद्भिः प्रदिष्टं
विज्ञेयं वृत्तजातौ कविजनदयिता स्रग्धरा नामतस्तु ॥