नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ नाट्यशास्त्रम्
कार्मुकमुक्तेनाशु चकार व्यपगतसुरगणपितृगणमिषुणा¹
नित्यमसौ² ते दैत्यगणारिः प्रदहतु³ मखमिव रिपुगणमखिलम्⁴ ॥११५॥
जिन भगवान् शिव ने अपने बाण से सोमपात्र को शीघ्र लुढ़का दिया,
कलश को फोड़ दिया और चमस को फेंक दिया, यूप को गिरा दिया,
चषाल को फेंक डाला, ( आग में जलती हुई ) समिधाओं को विच्छिन्न कर
दिया, यज्ञीय पशुओं को दूर कर चरु को लुढ़का दिया, देवता और पितरों
को भगा दिया और इस प्रकार दक्ष के महायज्ञ का विध्वंस कर दिया वे ही
भगवान इस यज्ञ के समान तुम्हारे शत्रुओं का सदा विनाश करें ॥ ११५ ॥
अष्टावादौ गुरूणि स्युस्तथा चैकोनविंशकम् ।
एकविंशञ्च⁵ विज्ञेयं चतुर्विंशं सनैधनम् ॥ ११६ ॥
एतानि गुरुसंख्यानि शेषाणि⁶ च लघून्यथ ।
षड्विंशत्यक्षरं⁷ पादे तद्भुजङ्गविजृम्भितम् ॥ ११७ ॥
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