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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 359

२४८ नाट्यशास्त्रम्
वृषभचेष्टित—यदि सत्रह अक्षरों के पाद में आदि के पांच, ग्यारहवां,
तेरहवां, चौदहवां, तथा सत्रहवां अक्षर लघु हो तो उसे 'वृषभचेष्टित' वृत्त
कहते हैं ॥ ८२ ॥
यथा—जलधररवं¹ श्रुत्वा श्रुत्वा² मदोच्छ्रयदर्पितो
विलिखति महीं ³शृङ्गाक्षेपैर्वृषः प्रतिनर्च च ।
स्वयुवतिवृत्तो गोष्ठाद् गोष्ठं प्रयाति च निर्भयो
वृषभललितं चित्रं वृत्तं करोति च शाद्वले ॥ ८३ ॥
( यह ) वृषभ मेघों की गर्जना को सुनकर एवं अहंकार से पूर्ण होकर
मदमत्त हो गया है और अपने सींगों से पृथ्वी को खोदकर गर्जन के उत्तर में
डकारता है। अपनी सजातीय ( अनुगामिनी ) गौओं के साथ एक गोष्ठ से
दूसरे गोष्ठ में निर्भय होकर विचरता है तथा हरे घास पर विभिन्न अचरज
भरी क्रीडाओं को कर रहा है ॥ ८३ ॥
चत्वार्यादौ च दशमं गुरुं⁴ यत्र त्रयोदशम् ।
चतुर्दशं तथान्त्ये⁵ द्वे चैकादशमथापि च ॥ ८४ ॥
यदा सप्तदशे पादे शेषाणि च लघून्यथ ।
भवन्ति यस्मिन्⁶ सा ज्ञेया श्रीधरा नामतो यथा⁷ ॥ ८५ ॥
श्रीधरा—यदि सत्रह अक्षर के पाद में आदि के चार, दसवां, ग्यारहवां,
तेरहवां, चौदहवां तथा अन्तिमवर्ण गुरु हो तो 'श्रीधरा'² नामक वृत्त
होता है ॥ ८४-८५ ॥
१. वृषभचेष्टित को पिंगलाचार्य ने 'हरिणी' माना है।
२. 'श्रीधरा' का ही पिङ्गलादिसम्मत नाम 'मन्दाक्रान्ता' है ।
१. जलदनिनदं—ग० ।
२. गर्जन्मदोच्चयदर्पितो—ग० ।
३. दर्पाच्छृङ्गैर्मृगंः प्रतिनन्द्य च—क० ।
४. गुरूण्यथ—ख० ।
५. तथा पञ्च एकादश—ख० । ६. यत्र—क० ।
७. लक्षणमिदं—क—ग—पुस्तकस्थमेवम्—
मो श्रौ च स्युश्चरणरचितास्तो गरू च प्रविष्टा—( गश्च गोन्त्यप्रतिष्ठ—ग० )
श्छेदः श्लिष्टो (इचेष्टो—ग०) यदि च दशभिः स्यात्तथान्यै (द्यै—ग०) श्चतुर्भिः ।
अत्यष्टौ च प्रतिनियमिता वर्णतः स्पष्टरूपा
सा विज्ञेया द्विजमुनिगणैः श्रीधरा नामतस्तु ॥—( क०; ग० )