सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 371

स्फुटितकलशशुक्तिनिगीर्णमुक्ता-१
फलैरूर्मिहस्तैर्नमस्यन्ति वः सागराः
मुदितजलचराकुलाः सम्प्रकीर्णामलाः
कीर्तयन्तीव२ कीर्तिं महानिम्नगाः३ ॥ ]
प्रसन्न जनपद से व्याप्त, समृद्ध धान्य की खानि होकर यह पृथिवी
आपकी अर्चना कर रही है, मद मत्त हाथियों की सूंडों से विध्वस्त तालवनों
के समूहवाले विन्ध्य आदि पर्वत भी आपके प्रति आनत हैं, विदीर्ण होने
वाली शुक्तियों के कलशों से बाहर निकलते मौक्तिक वाले तरंग हस्तों द्वारा
सागर भी आपके प्रति प्रणत है तथा ये महानदियाँ भी अपने सानन्द जल-
चरों से व्याप्त हो निर्मलता को विस्तीर्ण करती हुई आपकी शुभ्र कीर्ति का
मानों आख्यान गा रही हैं । ]
विषम तथा अर्धसमवृत्त—
एतानि समवृत्तानि मयोक्तानि द्विजोत्तमाः ।
विषमार्द्धसमानान्तु४ पुनर्वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ ११९ ॥
हे मुनिजन, मैंने अभी समवृत्त बतलाये हैं। अब मैं अर्धसमवृत्त तथा
विषमवृत्तों के लक्षण बतलाता हूँ ॥ ११९ ॥
यत्र पादास्तु विषमा नानावृत्तसमुद्भवाः ।
ग्रथिताः पादयोगेन तद्वृत्तं विषमं स्मृतम् ॥ १२० ॥
जिसमें अनेक वृत्तों के असमान पाद हों तथा उनसे एक पूर्ण छन्द
का निर्माण किया गया हो तो विषमवृत्त होता है ॥ १२० ॥
द्वौ५ समौ द्वौ च विषमौ वृत्तेऽर्धविषमे तथा ।
सर्वपादैश्च विषमैर्वृत्तं विषममुच्यते ॥ १२१ ॥
जिस छन्द में दो पाद (पहले व तीसरे) सम और दो (दूसरे व चौथे)
पाद विषम हों तो उसे अर्धविषम (अर्धसमवृत्त) वृत्त, तथा दो पादों के

१. विमब—क० ।
२. कीर्तयिष्यन्ति वर्णं—क० ।
३. उदाहरणमेतत् जनाश्रयां विद्यते । तद् ग्रन्थकारेण रुद्रस्वामिना कुतः
उद्धृतमिति निर्णैतुं न शक्यते । अयं दण्डकश्चण्डवृष्टिप्रयोग इति नाम्ना
भासते । इति क० पु० टिप्पणां रामकृष्णकविमहाभागः ।
४. युग्मोजविषमाणाञ्च सम्प्रवक्ष्यामि—क० ।
५. समावेकान्तरी पादौ द्वौ द्वावर्द्धसमौ स्मृतौ —क० ।