नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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सुन्दरि, तुम कमल के समान विशाल नेत्रों वाली हो, तुम (इस)
चन्द्रमा के बादलों से ढक जाने पर, अन्धेरी हो जाने वाली इस रात में
प्रारंभ होने वाली (अभिनव) वर्षा और बिजली की परवाह किये बिना और
प्रभावती (सूर्यपत्नी) के समान मेरे घर कैसे चली आई ? ॥ ६३ ॥
त्रीण्यादावष्टमञ्चैव दशमं नैधनद्वयम् ।
१गुरुण्यतिजगत्यां तु त्रिभिश्चेदैः प्रहर्षिणी ॥ ६४ ॥
प्रहर्षिणी—यदि तेरह अक्षरों के पाद में पहिले तीन, आंठवां,
दसवां, बारहवां तथा अन्तिमवर्ण गुरू हो तो प्रहर्षिणी वृत्त होता है। इसमें
तीन स्थान पर यति रहती है ॥ ६४ ॥
यथा—भावस्थैर्मधुरकथैः२ सुभाषितैस्त्वं
साटोपस्खलितविलम्बितैर्गतैश्च ।
३शोभाढ्यैर्हरसि मनांसि कामुकानां४
सुव्यक्तं हासि५ जगति प्रहर्षिणी६ च ॥ ६५ ॥
हे सुन्दरि, तुम प्रेमभाव से पूर्ण तथा मीठे शब्दों वाले सुभाषितों
के एवं लड़खड़ाने वाले मन्द मन्द पदसंचालन के द्वारा कामिजन के
चित्त हर लेती हो। इससे यही प्रकट होता है कि इस संसार में तुम
परम आह्लादक (प्रहर्षिणी) हो ॥ ६५ ॥
षष्ठञ्च सप्तमञ्चैव दशमैकादशे७ लघु ।
त्रयोदशाक्षरे पादे ज्ञेयं मत्तमयूरकम् ॥ ६६ ॥
मत्तमयूर—यदि तेरह अक्षरों के पाद में छठा, सातवां, दसवां तथा
ग्यारहवां अक्षर लघु हो तो 'मत्तमयूर' नामक वृत्त होता है ॥ ६६ ॥
यथा—विद्युन्नद्धाः ८सेन्द्रधनूरजितदेहा
वातोद्भूताः श्वेतबलाकाकृतशोभाः९ ।
१. गुरूणि पादे ह्यत्रैव यस्याः सा वै प्रहर्षिणी—क० ।
२. मधुरसकैः, मधुरतरैः—क० । ३. नानाङ्गै—ख०; ग० ।
४. मानवानां—क० । ५. ह्यतिजगती—क० ।
६. प्रहर्षिणीव—ख०; ग० ।
७. दशे तथा । लघूनि यस्य पादे तु गच्छेन्मत्तमयूरताम्—क० ।
८. सेन्द्रधनुद्योतितदेहा—ख०; ग० ।
९. कृतचिह्नाः—क० ।